Saturday, September 28, 2013

आज रपट जाएँ तो हमें ना उठाईयो

एक बार कि बात है ....
हम पति-पत्नी पटना में हैं! पटना में हमारे कई ठिकाने हैं! लेकिन शादी के बाद ससुराल को ही ज्यादा प्राथमिकता दी जाने लगी! शुरुआत में, १९८४ से १९८९ तक मेरे पूज्य गुरुदेव श्री प्रयाग पाण्डेय जी (मेरे मंझले जीजाजी) का घर ही मेरा घर था! आज भी, अभी भी मुझे इन्हीं की शरण में ज्यादा शान्ति मिलती है! मैं पटना में मच्छली की तरह तैरता हूँ, जी! मैंने इसके सभी ईलाके देखे हुए हैं! पोस्टल पार्क! हनुमान नगर! कंकड़बाग़! विजय नगर! सैदपुर! बेली रोड! बोरिंग कैनाल रोड! नाला रोड! खजांची रोड! अशोक राज-पथ! चिरैयांतांड! एक्जीविशन रोड! स्टेशन रोड! फ्रेज़र रोड! गांधी मैदान! महात्मा गांधी सेतु! करबिगहिया! बाकरगंज! पीरबहोर! राजेन्द्र नगर! अगम कुंवां! कदम कुंवां! बहादुरपुर! सब-के-सब सिनेमा घर, शानदार मॉल और रेस्टुरेंट इत्यादि-इत्यादि!
पर यह बात आज की है! आज का पटना मेरी निम्नलिखित पटना से कहीं ज्यादा भिन्न है!
मैं अपनी पत्नी के ईलाज के सिलसिले में यहाँ आया हूँ, और बोरिंग कैनाल रोड पर, अपने स्वसुर जी के आवास पर ठहरा हूँ! मेरी भांजी प्रियंका (रिम्पी) को पता है कि मामा-मामी पटना आये हैं! बस्स!_उसने मिलने की जिद्द पकड़ ली! और वो अपने बड़े पापा के यहाँ बहादुरपुर में है; जो हमारे मौजूदा मुकाम से किसी ऑटो(टेम्पु) के हिसाब से एक घंटे की दूरी पर है! पैदल, रिक्शा, और ऑटो , कुल मिलाकर डेढ़ घंटे की मुँह बिसूरने वाली सफ़र है! लेकिन हमें चूँकि कंकड़बाग़ में डॉक्टर से अपॉइंटमेंट फिक्स थी, सो उधर जाना ही था! अपॉइंटमेंट शाम की थी! हमने सबेरे ही निकले का फैसला किया कि पहले रिम्पी से मिलेंगे फिर वहीँ से डॉक्टर साहब के पास चले जायेंगे! सो हम निकल पड़े!
रिम्पी एक इकलौती बच्ची है, जो मुझे अपने सामने देखकर अतिउत्साहित हो जाती है! उसका मेरे प्रति रुझाव एक इकलौता उदाहरण है जो अभी भी कायम है! ये अभी एक एग्जाम कि तैयारी के सिलसिले में बोकारो से पटना आई हुई है! इसके बाद इसे दिल्ली में हायर-स्टडीज के लिए जाना है! हमारे पहुँचते ही ये कूदने-फांदने लगी! हमने वहीँ लंच किया! आराम किया! गप्पें कीं! फिर समयानुसार हमने विदा लिया! मौसम प्रतिकूल था! बादल भारी बारिश की धमकी दे रहे थे! गरजते बादल और चमकती बिजली से मन में शंका होती रही कि हम अब घर वापस कैसे जायेंगे? फिर घड़ी ने भी सूचना दी कि हमें निकलना चाहिये क्योंकि अभी लगभग एक किलोमीटर पैदल चलना है, रेलवे लाईन क्रॉस कर के नालंदा मेडिकल कॉलेज के सामने जा कर खड़े होना है! और देखना है कि कौन सी ऑटो खाली आती है, जिसमे हम दोनों समा सकें! मौसम की धमकी के बावजूद हम निकल पड़े! रिम्पी अपनी आदत के मुताबिक़ रूवांसी हो गई! पर वो अपने मामा को जानती है, जो किसी की भी एक पुकार पर हाज़िर होने की क्षमता रखता है! और दूरियां मेरे इस ज़ज्बात के आड़े नहीं आतीं! मैंने अपनी बेटी को प्यार किया! बिटिया ने अपनी मामी से लिपट कर, "फुईं-फुईं" कर हमें विदा किया! और अब हम इन्द्रदेव की मर्ज़ी के हवाले खर्रामा-खर्रामा, पैदल NMCH की ओर चल पड़े, कि बूँदें गिरने लगीं! हिम्मत कर के और आगे बढ़े कि शायद बारिश न हो! पर उसकी तीव्रता बढती गई जो सचमुच महाभारी मूसलाधार तेज बारिश में तब्दील हो गई! अब कहाँ आश्रय पायें? कही कोई टिन-टप्पर भी नहीं, कोई मामूली सा शेड भी नहीं, जिसके नीचे खड़े होकर बारिश की रफ़्तार थमने का इन्तजार कर सकें! वापस जाना या आगे बढ़ना एक बराबर था! मैंने पत्नी जी -वीणा- को देखा तो वह खेद से मुस्काई! हमारी नज़रों ने फैसला किया कि पानी से भीग कर तर-ब-तर हो ही चुके हैं अब छिपना क्या और बचना क्या, चलो आगे ही बढ़ते हैं! समय भी बीता जा रहा है! सो, साब जी, हमने कीमती और आवश्यक वस्तुवों को मेरी जेबों की गहराई में सुरक्षित किया, और भीगते हुए टहलते चल निकले! कई लोगों ने जो कहीं आश्रय पा चुके थे हमें -बिंदास- इस भारी बारिश में टहलते देख अजीब-अजीब भंगिमाएं बना रहे थे! हमने सावधानी से देख-सुन-समझकर वह -असुरक्षित- (आदम द्वारा ज़बरन बनाई गेटवे) रेलवे क्रासिंग को पार किया और खर्रमा-खर्रमा चलते NMCH के मुख्य द्वार के सामने खड़े किसी खाली टेम्पु का इन्तजार करने लगे! वह मिला! हम बैठे! टेम्पु चली, तब हमें हमारी दशा का ख्याल आया कि हम जैसे किसी पानी टंकी या तालाब से डुबकी लगाकर सीधे इस टेम्पु में आ बैठें हों! मैं बार-बार अपनी ऊँगली से वाईपर की तरह अपना चश्मा साफ़ करते चला! वीणा ने भी खुद को "ठीक" किया! आखिरकार हम उस मोड़ पर उतरे जहां से डॉक्टर की क्लिनिक का रास्ता था! कंकड़बाग़ रोड पर चिरियांटांड पुल की तरफ आईये जहां "बोम्बे डाईंग"(मरता हुआ बम्बई) का शोरूम दिखे ठीक उसके सामने की सड़क में घुस जाईये, वो आपको कंकड़बाग़ कॉलोनी ले जायेगा! यहाँ उतरे तो ना कोई रिक्शा था न टेम्पु! अब? वही _खर्रमा-खर्रमा!
सांझ ढले हम डॉक्टर साहब के क्लिनिक तक आये! और अन्दर गये जिसमे मरीज़ बैठकर अपनी बारी का इन्तजार करते हैं! वहां जन समुद्र की बाढ़ ने हमारा ऐसा स्वागत किया कि समझ में नहीं आया कि वापस जायें, कि जो है सो झेलें? झेलो भई! आखिर १००० कि.मी. इसीलिए तो आये हैं!! मैंने कुछ जतन कर वीणा को बिठा दिया और पता करने लगा कि हमारा नंबर कब आएगा? कौन सा नंबर चल रहा है? जो जानकारी मिली उससे हमदोनों का मूंह कद्दू जैसा लटक गया! अभी इवनिंग शिफ्ट की शुरुआत ही नहीं हुई है! और हमारा नंबर ८ आठ है! अब? इन्तजार! इन्तजार!! इन्तजार!!! ...एक हलचल से पता चला कि डॉक्टर साहाब अपने चैंबर में आ गये हैं! उनका स्टाफ मरीजों कि लिस्ट लेकर गायब हो गया! खूब कलपाने के बाद जब वो नज़र आये तो मैं उनसे पूछने लगा कि लिस्ट तो गई, डॉक्टर ने मरीजों को देखना शुरू किया या नहीं?? मेरी तरह ही सावालिया निशान बने कई लोग उसका मूंह ताकने लगे! उसने अपने चिर-परिचित भारतीय असभ्यता अनुसार उत्तर दिया और सबको उनकी औकात दिखाई: जब आपका नंबर आएगा तो अपने बुला लेवेंगे!
_"जरूर रे, मामु!! तोर बुलाहटा अईतऊ तो हमारा बुलईहे! पेंदिया में सुलगल अगरबत्ती छुवईबऊ ना रे बेट्टा, तो फट्ट से भितरा जईबे!"
हमारी बारी आई साब! आई! डॉक्टर साहब ने मुझे देखते ही कहा : "का हो तिवारी जी! अब का भलवअ?" आवअ बैठअ! बोलअ का बात बा? पेपर्स का मुआयना कर बोले : "__हमम्म्म्म! तो मलकिनी के देखावे के बा?"
मैं शरमाया! पर वीणा ने ठिठोली की : "का बोलें सर! आपका पास आनेहें में तो अईसन भींज गये कि का बतायें!!!"
_"आयें!?? बाहरे पानी बरसअ ता का?"_डॉक्टर ने हैरानी जताई!
_"जी,सर!" _उनसे ज्यादा हैरान होते मैंने उत्तर दिया कि साहब सच्चो भित्तरे थे का????"
वीणा ने भारी बारिश और हमारे गीले भीगे बदन की दुहाई देते कुछ और बातें कहीं, तब डॉक्टर साहब ने वो नायाब और वेशकीमती सुझाव दिया जो अभी भी हमदोनों को याद है, अलबत्ता मलकिनी जी को थोड़ी लाज आती है!
डॉक्टर साहब ने कहा : "बरसात में भीग गये तो क्या हुआ? शरीर गल गया? या किसी मुसीबत में पड़ गये? मुझे समझ में नहीं आता लोग बारिश से भीगने से इतना कतराते क्यों हैं, जब वे सशक्त है, नौजवान है, कोई अलामत नहीं, कोई फिक्र-फाका नहीं, _आखिर आप दोनों पति-पत्नी हैं या घर से भागे नाजायज रिश्तेदार हैं???
वीणा हकबकाई! मैं थोडा आशंकित हुआ कि कोई गुस्ताखी हो गई क्या? पर डॉक्टर ने हमारे चेहरे के भाव पढ़ लिए और स्नेह से मुस्काये! फिर थोड़े शरारती लहजे में बिदास बोले :
_"यार! जवान हो! महबूबा साथ में है! रिमझिम बरसात हो रही है! घर जाने की कोई जल्दी नहीं! कोई इमरजेंसी नहीं! इस रूमानी मौसम का मजा लेने के बदले कलपने लगे कि भीग गये! _ये क्या बात हुई? कई कवियों ने, लेखकों ने, कई कलाकारों, चिंतको और विद्वानों ने बरसात की रूमानियत की तरफदारी में बेशुमार गीत गाये हैं! कोई विरह नहीं, साथ-साथ हो! अरे, मजे लेना था बारिशा का! बेकार में एक मौका हाथ से गँवा दिया मस्ती का! क्या आदमी हो यार!!? फिल्मों में हीरो-हिरोइन को बारिश में भीग कर नाचते गाते देखने का लुत्फ़ पैसे देकर उठाते हो वही मस्ती, वही जवानी, वही रूमानी समां! और प्रेमी अपनी प्रेमिका के साथ है, लेकिन मुँह कदुवा के जईसन लटकल है, ये ठीक है!?? अरे लाईफ के इन लम्हों को एन्जॉय करो यार! क्या बारिश में भीग गये का रोना रोते हो! हम इस अवसर के लिए कलपते बूढ़े हो गये, तुम्हें अनायास मिल गया तो इसकी कोई इज्ज़त ही नहीं! मेरी अपॉइंटमेंट आज नहीं तो कल देखि जाती! यह सुहाना पल और यूँ अकेले साथ शहर कि गलियों में बारिश का मजा लेते मस्त होकर घूमने-फिरने का मौका फिर कब मिलेगा, किसे मालूम?" 
मैंने वीणा को देखा तो यह मेरी गोरी गोरिया -गोरी लाल- हो गई थी!
और ये मईयवा बरसात ख़तम हो चुका था!
और हम बुढापे की तरफ चल पड़े!
_"अबे ऐए _बुड्ढा होगा तेरा बाप!"
"आज रपट जाएँ तो हमें ना उठाईयो................!"
_श्री .