Monday, September 16, 2013

चुगली= Backbite , Tattle ,

चुगलखोरी = Backbiting

धन्यवाद हरपाल भाई जी! बहुत बहुत धन्यवाद!

धन्यवाद प्रस्तावना ~ सन्दर्भ : -दुर्भिक्ष-

_बहुत ही तसल्ली से कह सकता हूँ कि मेरे लेखन का एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट मैंने पूरा किया! मेरा किया यह एक ऐसा 'करम' है जिससे उत्पन्न भावनाओं की अभिव्यक्ति भी उतनी ही जरूरी है जितना मेरी इस रचना -दुर्भिक्ष- का हक़ीक़तन अपने वजूद में आना! मुझे इस बात की सबसे बड़ी तसल्ली है कि मैं इस शर्मिंदगी से बच गया कि मैंने एक काम शुरू तो किया पर बीच में ही टायं टायं फिस्स हो गया! मैंने जिस करम का आगाज़ किया उसे अपनी दिन रात की मेहनत से उसे उसके अंजाम तक पहुंचाया! यह रचना २२ अध्यायों में पूर्ण किया गया! इसके लिए मैंने अपने पूरे परिवार के समस्त सदस्यों के संस्मरण - स्मरण को लिखकर या यादकर इक्कट्ठा किया! मैं कई ऐसे ऐसे लोगों से मिला जो अनेक-अनेक घटनाओं के साक्षी रहे हैं! मेरी अपनी पाँच बड़ी बहनों में से सिर्फ चार के यानि आठ जनों से सीधे संपर्क में हूँ! और वे लोग जो मेरे परिवार के करीबी रहे पर आज कहीं दूर हैं जिनसे जानकारियों का और 'खजाना' हासिल हो सकता, नहीं हो पाया! कई लोग तो इसी बीच ब्रम्हलीन हो गए! लेकिन अनेक-अनेक लोगों से मैं व्यक्तिगत रूप से मिला और उनके संस्मरण सुने, सवाल पूछे और जबाब पाया, जिनके साथ बातें करते मैंने घंटों बिताये, उसकी संख्या भी कोई कम नहीं है! कितने रोये, और कितने हँसे, सब इसमें शामिल है! इसके लिए मैं सभी का आभारी रहूँगा! १९७४ के बाद तो मैं स्वयं ही सबका साक्षी रहा हूँ, क्योंकि इससे पहले की याद गुम सी हो गई है! जिसे कुछ लोगों ने याद दिलाया, ये भी कोई मामूली सहयोग नहीं है! कई बातें मैं भूल गया था या जो नई यादों के नीचे दबा हुआ था, उसे इन लोगों ने जब अपने आख्यान में कहा तो मुझे उसका पूर्ण ज्ञान याद हो पाया! इसके लिए भी मैं सबका आभारी रहूँगा! सबसे ज्यादा मेरे बड़े जीजाजी मेरे सबसे बड़े प्रेरक और जानकारियों के श्रोत रहे! मेरी बड़ी दीदी एक स्पंज की तरह रही है, उसे हर छोटी-बड़ी बातें अभी भी जस का तस याद है! सभी बहनों से उनका बचपन पूछना उन्हें भी फिर से हरा-भरा होना बहुत पसंद आया! और सबने बड़े उत्साह से मुझे समस्त जानकारियाँ दी! ससे बड़ा आभारी मैं मेरी भांजी प्रियंका (यह facebook पर है) का हूँ जिसने मुझे यह लिखने को प्रेरित किया और बार-बार, लगातार मेरा उत्साह बढ़ाती रही!
इस रचना को मैंने लिख-लिखकर फेसबुक पर शेयर करने लगा तो कई मित्रों के शुरूआती समर्थन से मेरा उत्साह कई गुणा बढ़ गया!
इस रचना की सबसे बड़ी उपलब्धि मुझे हरपाल सिंह जी जैसे नायब दोस्त की दोस्ती का हासिल है! मेरी कहानी पढ़कर या मेरे अपने लोग और परिवार यूँ ही जानते हैं कि व्यक्तिगत जीवन में मैं एक अकेला इंसान हूँ जो अपने आप में खोया रहता हूँ! कारण मेरी रचना में विस्तार से लिख चूका हूँ! मेरी एक पोस्ट को पढ़कर हरपाल सिंह जी ने जो कमेंट दिया और जैसी प्रतिक्रिया और अपनी अभिव्यक्ति और अपना निमंत्रण मुझे दिया यह मेरी अभीतक की तमाम ज़िन्दगी का एक इकलौता उदाहरण है! अद्वितीय! आज तक किसी अपने या पराये ने मुझे इस तरह से आलिंगन में नहीं लिया जिस तरह से हरपाल भाई ने किया! मैं तहे दिल से उनका शुक्रगुजार हूँ और आजीवन उनका ऋणी और आभारी रहूँगा!
२२-वां भाग इस रचना का सबसे लम्बा लेख और इस "राम" कहानी का विश्राम है, अंत नहीं! क्योंकि जहां इस कहानी में मैंने ~इति~  लिखा है, दरअसल वहीँ से मेरे वास्तविक जीवन संघर्ष की शुरुआत हुई है! -दुर्भिक्ष- की 'इति' इसका अंजाम या समापन नहीं है बल्कि एक नए आगाज़ का आह्वान है! लेकिन इससे आगे कोई नया लेखन और इतना बड़ा प्रोजेक्ट मुझसे अब नहीं संभलेगा! मैं मेरी क्षमता जानता हूँ, और वह मैंने कर दिखाया है! इस रचना के सभी पन्नों का प्रिंटआउट निकालने से पहले एक एडिटिंग की सख्त जरूरत है, जो अपने आप में एक नया बड़ा प्रोजेक्ट है! मेरे समस्त परिवार की दिली इच्छा है कि इसे मैं एक किताब के रूप में ढालूँ! इसके लिए एडिटिंग तो सबसे पहले मैं खुद करूँगा! फिर इसे पढने वाले निःसंदेह इसमें कुछ जोड़ना या घटाना या हटाना या बदलना चाहेंगे! लेकिन मेरी अपनी खुद की एडिटिंग के बाद औरों की सुनना और उसे मानना पूरी तरह मेरी अपनी मर्जी के अनुसार ही होगा!
शुरुआत में मैं इस लेखन को कॉपी कर facebook पर पेस्ट कर देता था! बाद में मुझे स्वयं यह महसूस हुआ कि कुछ टाइपिंग मिस्टेक्स और लेख की वृहद् लम्बाई सभी को उबा देगी, फलतः मैंने सिर्फ उसके लिंक को शेयर करने लगा! और मेरी बेटी, प्रियंका, अकेले मुझे लगातार, बिना नागा अपने कमेंट्स देती रही! इसी एकमात्र "पाठक" के दम पर मैं लिखता गया, लिखता गया! और आज यह पूर्ण हुआ!
निःसंदेह यह मेरी व्यक्तिगत और मेरे अपने परिवार और मेरी अईया और बाबुजी की कहानी है, लेकिन मैंने इसे जब एक सोशल मीडिया पर डाल दिया तो इसके प्रभाव पर मेरा कोई नियंत्रण नहीं रहा! इसे कोई भी कभी भी पढ़ कर अपनी प्रतिक्रिया दे सकता था! मैंने सबको (fb friends ) को टहोक-टहोक और पोक कर के इसे पढने को विवश कर इस लेखन की मर्यादा का मज़ाक नहीं बनने दिया!
मैंने २२-सों अध्याय को कई बार पढ़ा! यह मानकर कि मैं एक आलोचक हूँ और मुझे इसमें खोट निकालना है, तब मेरी समझ में यह आया कि इसे सबसे पहले मैं स्वयं एडिट करूँगा! और काम आज से शुरू हो गया है! २२-वें अध्याय की एडिटिंग पूर्ण हो गई है, जिसका लिंक मैं प्रियंका के लौटते ही शेयर करूँगा! -दुर्भिक्ष- पठनीय है, इसमें कोई संदेह नहीं! इसे पढने वाला फट से जान जायेगा कि श्रीकांत तिवारी कौन और क्या है! मैंने इसमें खुद ही अपने व्यक्तित्व को भी उजागर किया है! पर कोई लालसा नहीं! कोई मांग नहीं! मुझे संतोष है कि अईया और बाबुजी अभी भी मेरे साथ, मेरे पास हैं!
नमस्ते।
_श्री .