Friday, June 7, 2013

बचपन हर गम से बेगाना होता है!

मित्रों!
आज मेरी उम्र 47-वर्ष है! सन है ...ई०-२०१३! लेकिन मेरी बुद्धि, मेरी सोच, मेरे विचार, मेरे संस्कार, मेरा व्यवहार, मेरे रंग-ढंग, मेरी कार्य-प्रणाली, मेरी जीवन-शैली, मेरा रहन-सहन, मेरी पसंद-नापसंद, मेरे शौक, मेरी आदतें, मेरे गुण, मेरे अवगुण, मेरे ऐब, मेरी अभिव्यक्ति, मेरी क्रिया और मेरी प्रतिक्रिया सन १९६८ से लेकर १९८४ तक में ही सीमित हैं! इतने में ही सिमटकर रह गए हैं! यहाँ के बाद मैं बड़ा हुआ ही नहीं, ना होना चाहता हूँ! वजह थोड़ी मनोवैज्ञानिक है, और संभव है किन्हीं और प्रकार के तथ्यों से मेल भी खाता हो(मुझे नहीं पता)!
आदमी के जीवन का (जितनी कि उसकी उम्र सामान्यतः होती है।) सबसे सुहाना दौर, सबसे सुन्दर, सबसे मीठे पल, A GOLDEN LIFE कब होती है? और उसकी समय सीमा -उम्र- क्या/कितनी होती है? थोडा इस विषय पर सोच कर देखिये, प्लीज़! मैं सीधे अपनी बात की बॉटम लाइन बोलूं तो, अक्षरों में उसका नाम है : -"बचपन"-! इसकी उम्र सीमा से पहले यह सोचिये कि -यदि मैं सही हूँ-, तो इसकी वजह क्या है? मेरा उत्तर है : -"स्वाधीनता एवं संरक्षण-!" ....तब, जब किसी बात की भी जिम्मेदारी और जिम्मेवारी से मुक्त होते हैं! वह अवसर, और वह जीवन जी रहे होते हैं, जिसकी चाह में, लालसा में, निर्मल-निश्छल प्रेम में, खिलौनों में, त्योहारों की उमंगों में, फिल्म और कॉमिक्स के किरदारों में, ...खुद के सैटल करते, हिरोइज्म के ज़ज्बे से भरे, निर्भीक दोस्तों में, अपने-अपने शौक का भोग लगाते पलों में, अपनों की उसी भीड़ में, उसी हंसी में, उसी ख़ुशी में, 'निश्चिन्त और लापरवाही' जैसी उछ्रिन्खालता की तनिक और संगत और मित्र-मंडली की चाह की पुनर्प्राप्ति में, -"उस ज़माने में"- अपने दिवंगत या बिछड़ चुके रिश्तेदारों की मौजूदगी और उनकी वजह से प्राप्त "_संरक्षण_" जैसी ही एक नयी संरक्षित छाँव की तलाश में, ...वह संरक्षण, जो हरेक को 'नौनिहाल से लेकर नौजवानी' तक हासिल रहता है, ...लेकिन जो आज नहीं है! वैसी ही दुनिया के पुनर्निर्माण की और प्राप्ति की चाह में, काल का पहिया वापस/reverse घुमाने की जंग में, जो अनवरत हमें ही आगे ओर धकेलता जा रहा है! , ...और हम अकेले हैं, अकेले, नितांत अकेले, अपनी पूरी क्षमता से वापस धकेलने वाली ताक़त की लड़ाई में खोकर ख़तम-से होते जा रहे हैं! इसी हार-जीत (खुद-से) की जंग में हमारी सारी रचनात्मक और कोमल भावनाएं कुम्हला-सी गयीं हैं! बढती उम्र के साथ जीवन की सच्चाई का ज़हरीला घूट जब पहली बार किसी की हलक से नीचे उतरता है ना, _इसकी जलन वही जानता है! फिर उसे वही सुहाने दिन याद आकर सतायेंगे या रुलायेंगे ये हर एक अदद की अपनी लेख की रेखा की बात है! लेकिन आप इस बात का सर्वे कीजिये या शोध कीजिये, LIFE OF RICH & FAMOUS से लेकर एक निम्नतम जीवन स्तर के आदमी का एक ही उत्तर होगा _:"वो भी क्या दिन थे!!" 
दोस्तों, मेरे विचार से यही सबके जीवन का GOLDEN MOMENT होता है! और यही हमसे आज विलग है, और इसी के पुनर्प्राप्ति की लड़ाई आज कई रूपों में लड़ी जा रहीं है! जिसका क़ानून है, एक कड़वा सच : "All's fair in love and war.", अपने-अपने लाक्षणिक गुणों और अपनी सामार्थयानुसार, सभी के सामने एक नहीं अनेकानेक भयंकर और किसी की भी कल्पना से कहीं ज्यादा त्रासद जीवन मुकाबिल है, जो निःसंदेह सर्वशक्तिमान के समकक्ष शक्तिशाली है! ...........पुराने निश्चिन्त हंसी और दोस्तों की भीड़ में, नौजवानी की उमंग की पुनर्प्राप्ति की चाह _यह लड़ाई ही जड़ है, जो कहीं सात्विक और साश्वत है तो कही दुर्दान्त! यह हमारे वश में नहीं! इसीलिए वे पुराने दिन _"हमारा ज़माना"_ के नाम से चर्चित है! जो हर किसी का अलग-अलग होता है! जबकि अभी हम असुरक्षित और भारी जिम्मेदारियों और जिम्मेवारियो के पराधीन हैं! बात अजीब है लेकिन सच है, _इसी वजह से कोई जांबाज़ है, तो कोई एक मानसिक रोगी, एक पीड़ित आत्मा, शरीर के पिजरे में बंद, असहाय! मजारों, और मंदिरों की भीड़ '.....वो लम्बी पौराणिक और सनातन भीड़ और आस्था', से उत्पन्न उम्मीद हमें भी वहीँ जाकर चादर फैलाने को विवश कर देती है, किये हुए है, करती भी रहेगी, क्योंकि आस्था के आगे सभी तर्क गौण हैं! असफलताओं और भ्रस्त तंत्र की मार से हम अधमरों को तो लड़ना भी नहीं आता, सीखने के लिए भी रिश्वत देनी पड़ती है either in Cash or kind! इस असाध्य छूत की बिमारी ने कितनों को उजाड़ दिया और कितने अभी और उजड़ते जा रहे हैं!

अब इस "हमारे ज़माने" की उम्र की बात पर कोई बहस नहीं हो सकती! ना ही कोई विचार इसे किन्ही एक वाक्यों में रेखांकित कर सकता है! .....but, ....depends !

मेरे ज़माने की उम्र मैंने बता ही दी है! इस दौर के हरेक बात में ऊर्जा है! यही उर्जा _
जो चला नहीं गया,
जो खो नहीं गया,
उसकी बैटरी डाउन नहीं हुई कि,रिचार्ज किया जा सके!
हड़प की गई,
हथिया ली गई,
छीन ली गई,
लूट ली गई,
चुरा ली गई,
लेकिन ताक़त भी इसी इस ज़ुल्म की देन है!  
................
क्या तुम ऐसा ज़ुल्म कर सकोगे?
................
कृतज्ञ और कृतघ्नों के बीच बदलाव को सहना, झेलना, और अपनाने पर हम मनुष्य भले हमेशा विवश रहे हों, पर इससे "हमारे ज़माने" पर कोई फर्क पड़ता है? अपने उस प्यारे अतीत को कोई भूल सका है? नहीं! होश संभालने के बाद से लेकर बढती नौजवानी की तरफ बढती उम्र के बीच न जाने हम कई बार कई बहुरूप में अपने को बड़ा होता देखते हैं, और जिससे, "उस" वक़्त, जिस ICON से आपको लगाव होता है, आप वैसा बनने की कोशिश करते और मुग्ध होते नहीं अघाते! वही ICONS आज भी उसी उम्र और किरदार मात्र की शक्ल में जीवनपर्यंत के लिए अपने हो जाते हैं! उनका आज का रूप-लावण्य भले आज, अब, आपको नहीं लुभाता हो! वही उम्र, वही वक़्त, वही दौर हमारे "आज" की बुनियाद है! इसकी स्टडी से ही कोई भी हमारे अतीत के साथ हमारी ठीक पहचान कर सकता है!
इसलिए मेरी जिद्द है, और लड़ाई ज़ारी रहेगी, _मैं बड़ा होना नहीं चाहता!
मैं आज भी गुल्ली-डंटा खेलना चाहता हूँ, _मुझे आज भी वही गिनती के हंसोड़ शब्द अक्षरशः याद हैं! मैं आज भी "अंटा" _गुच्छु, या शीशे की गोल-गोल गोटियाँ,_गोली, जिसे हम 'अंटा' बोलते हैं", खेलना चाहता हूँ, "मैं आज भी "गुड्डी (= पतंग), अपनी लटाई से उड़ाना, लड़ाना, और तागे का मांझा सोटना चाहता हूँ, वह हर खेल.......... फिर-से खेलना चाहता हूँ, मुहल्ले की गलियों में स्वछन्द दौड़ना-फिरना चाता हूँ, पर यह असंभव नहीं तो बड़ी मुश्किल है; काल पहिया वापस धकेलना यदि संभव होता तो.......!' सो, आगे की सुध ले!
फिर भी 'दिल तो बच्चा है जी!'
और, बचपन हर गम से बेगाना होता है!
२-जनवरी १९६६ को मेरी जन्म हुई! आज २०१३ में मैं ४७-वर्ष के एक शरीर में रहता हूँ! जिसकी शक्ल आपके सामने है! और अक्ल? उसे आपकी, तुम्हारी और तेरी सहायता की ज़रूरत है! क्योंकि मेरा बचपना कायम है!
देखना ये है कि इस मामले में मैं कितना खुशकिस्मत हूँ?
और मैं?
दोस्ती की है, निभानी तो पड़ेगी ही! 
सदैव आपकी सेवा में तत्पर ......

_श्री .