Saturday, May 4, 2013

आँखें (1968)

आँखें (1968)
ankhen (The Eyes) ! A DIAMOND JUBILEE HIT !!

The best of the best espionage movie ever made in India !
A great creation of the legendary Producer Director Late Ramanand Sagar & his all SAGAR family !
The movie's disc cover proudly proclaims :
1."ACCLAIMED UNANIMOUSLY BY PRESS"
2. "INTRINSICALLY INTERESTING STORY, DIALOGUE IS CRISP AND MEANINGFUL, LYRICS ARE HIGHLY POETIC" __Times of India Bombay
3. "BEST SPY FILM OF TYE YEAR (मैं तो कहूँगा :"...the BEST of the era !!") SUPERB SHOWMANSHIP" __Biltz Weekly, Bombay.
4. "BEAUTIFULLY CONCEIVED...., MASTERLY EXECUTED...., LIVELIEST ENTERTAINMENT...., MAGNUM OPUS...., RICH PURPOSE"__Amrit Bazar Patika - Calcutta
5. "SPECTACULAR SIGNIFICANT AND DYNAMIC"__Cine Advance - Calcutta
6. "FASCINATING FOREIGN LOCATIONS"      __FimFare - Bombay            
7. "Celebrated Diamond Jubilee"
8. "Shown at Film Festival MOSCOW"
9. "Celebrated 25 Silver jubilee Weeks over 12 Stations"
10 "Winner of FilmFare Awards : Best Director _ Ramanand Sagar ; Best Cinematographer _ G. Singh"
11."100 Days at over 25 Stations !"
12. "ALL TIME RECORDS AT 50 STATIONS"
13. "ALL TIME RELEVANT"
14. "the SHRIKANT TIWARI LIKES THIS MOST FROM HIS CHILDHOOD & the story goes like this"::::>>>
Please read........
सन 1972 में हमारे शहर में पहला सिनेमा घर (हॉल) बना! छोटे शहरों में नई फ़िल्में लगना उस ज़माने में किसी चमत्कार से कम नहीं था! ...कोई चमत्कार न होना था, न हुआ ! अतः 1974 में जब यह फिल्म मैंने पहली बार "W.T." देखि थी तब मेरी उम्र छोटी-सी, नन्हीं-सी थी!...और मैं अपने बाबूजी की गोद में रहता था! ईतनी-सी उम्र (8 Yrs.) में ही मैंने इस फिल्म का भरपूर आनंद लिया था!
ब्लैक & वाइट में --"समाचार"-- समाप्त होते ही (रंगीन) फिल्म शुरू होती है और रफ़ी साहब की बुलंद आवाज़ गूंजती है :" उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता, ...जिस मुल्क की सरहद की निगेहबान हैं ऑंखें!" ...इतने में ही रोमांच हो आता है और हॉल का शोर शांत हो जाता है, सभी दर्शकों की "आँखें" अब स्क्रीन पर है..,
कहानी एक Sabotage से शुरू होती है! स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हुए इस आतंकवादी हमले पर सरकार के बयान हैं कि इसमें दुश्मन मुल्कों का हाथ है! जिसके तत्काल बाद एक गोपनीय इमरजेंसी मीटिंग होती है! यह मीटिंग एक गैर-सरकारी देशभक्त लोगों की है जिन्होनें नेताजी सुभाषचंद्र बोष से तालीम पाई थी, और उनकी सेना "आज़ाद हिन्द फ़ौज" के वीर सेनानी थे! इस गोपनीय ग्रुप के लीडर हैं बुजुर्ग मेज़र दीवानचंद मेहरा! इस "गैर-सरकारी ग्रुप" को सरकार से सहमती और सहूलियतें प्राप्त हैं, यह ग्रुप अत्यंत गोपनीय हैं, जो किसी की नज़रों में नहीं हैं! मेजर साहब का पुत्र सुनील भी इसी ग्रुप का एक सदस्य है! इस मीटिंग में यह तय पाया गया कि निःसंदेह हिन्दुस्तान में जासूसी और तोड़-फोड़ की सभी कुकृत्यों के पीछे दुश्मन मुल्कों का हाथ है! ग्रुप मेंबर अशफाक साहब का छोटा बेटा अनवर भी (पहली बार) इस मीटिंग में शामिल है जो मेजर साहब से सहमत नहीं है, और जिसकी "ऑंखें" कुछ और बयां करतीं हैं! मेज़र साहब एक गोपनीय जानकारी सभी सदस्यों से शेयर करते हैं कि मेजर साहब के दोस्त और अशफाक साहब के बड़े बेटे सलीम, जो गुप्त मिशन पर बाहर है, ने कुछ ख़ास जानकारियाँ दीं हैं!! दुश्मनों द्वारा स्मगलिंग के मार्फ़त हिन्दुस्तान में घातक हथियार और गोला-बारूद चुपके से लाया जा रहा है !! सलीम ने उनका पता पा लिया है और वह भी उसी शिप पर "ऑंखें" सजग रखते हुए समुद्री यात्रा कर रहा है! उसे अब सिर्फ हथियारों के खेप का पता लगाकर और उनपर गुप्त निशान लगाकर मेजर साहब को सूचित करना है !!  

समुद्री यात्रा में शिप पर मौजूद दुश्मनों के -इंडिया में सक्रीय- डॉक्टर/कमांडर का मैसेज आता है जो शिप पर 'उसकी टीम' के "कैप्टन" को बतलाता है कि उनके पीछे एक हिन्दुतानी जासूस लगा हुआ है ...... इनमें मंत्रणा होती है, और "उस हिंदुस्तानी" जासूस से निपटने की रणनीति तय होती है!

दुश्मन मुल्कों के तरफ से हिन्दुस्तान में एक अत्यंत ही गुप्त स्थान पर वेष-भूषा बदले, छद्म रूप में सक्रीय कमांडर और उसके सदस्यों, प्यादों और उनके "डैन", सीक्रेट अड्डे के भेद को देखकर वास्तविक रोमांच होता है!! कमांडर वह हर पैंतरा जानता और आजमाता है जिससे गद्दार पैदा किये जाते हैं जो उसकी नापाक मंसूबों में सहायक होते हैं, जो अगर पकडे भी जाएँ तो उनसे कोई खतरा न हो !

'शिप' पर सलीम हथियारों की पेटियों पर गुप्त निशान लगता है, जिसे दुश्मनों की "ऑंखें" देख रही हैं, लेकिन वे अभी उसे नहीं पकड़ते! सलीम ट्रांसमीटर पर मेजर साहब को इन सारी बातों की जानकारी देता है! और अपना शक जाहीर करता है कि शायद उसे पहचान लिया गया है !! मेजर साहब सलीम को सावधान रहने को कहते हैं, और हिदायत देते हैं कि संभव है दुश्मन बीच समुद्र में ही हथियारों की पेटियां उतार दे !!

इस -45 साल पुरानी- फिल्म में _घरों में गुप्त रूप छिपाए गए ट्रांसमीटरों का ईतना शानदार और रोमांचक और सटीक प्रस्तुतिकरण है कि आज भी देखकर लोमहर्षक रोमांच होता है! वास्तव में इस ख़ास बात को इसी शानदार तरीके से फिर कभी नहीं दिखाया जा सका है! ट्रांसमीटर की "टु टु....टू टू टू...बीप-बीप-बीप" की आवाज़ के साथ कंट्रोल पैनल पर लगे कई रंगों के लाइट्स का जलना-बुझना जादुई असर डालने में अभी भी कामयाब है जो रहस्य को और भी रोमांचक बनाता है! समूची फिल्म ही विभिन्न प्रकार के ट्रांसमीटरों के साथ आगे बढती है! ऑपरेशन द्वारा -अंगों में- छिपे "माइक्रो ट्रांसमीटर्स" की चर्चा और उपयोग इस फिल्म को वास्तविक Espionage Movie का दर्ज देती है! रह-रहकर कई तरह के ट्रांसमीटर्स से हमारा ताल्लुक व तआर्रुफ़ करवाया जाता है, और हॉल में 'अईस्स...-अईस्स...' की ध्वनि मजा और बढ़ा देती है! इस फिल्म की कहानी यानि -जासूसी- की "लय" कभी नहीं टूटती, कभी नहीं बहकती! "एक सच्ची और सम्पूर्ण जासूसी Espionage फिल्म_!!" इस कहानी का जासूस हीरो सिर्फ जासूस है! यह गाना नहीं गाता! यह डांस नहीं करता! हलांकि हसीनाएं इसपे रीझती और मोहित होती हैं लेकिन सुनील को सिर्फ अपने कर्तव्य और मिशन का ही ध्यान रहता है! हरेक कलाकार अपनी भूमिका में खूब जमा हुआ है! शानदार एक्टिंग और जानदार डायलॉग्स और चिल्लिंग इवेंट्स + थ्रिल्लिंग एक्शनस आपको चनाचूर खाने और पानी तक नहीं पीने देंगे! इसीलिए भर पेट खा-पीकर इसे देखिएगा! देख चुके हैं तो फिर से देखिये, खाना मेरे यहाँ आ कर खाइये!! ट्रांसमीटर्स के -सदुपयोग और दुरुपयोग- का ईतना वृहद्, विषद और विहंगम परफोर्मेंस फिर दुबारा कभी नहीं देखा !! आज के ''''-आधुनिक साइबर दुनिया-'''' में ट्रांसमीटर्स के मार्फ़त घात-प्रतिघात का ऐसा मुजाहिरा बॉलीवुड दुबारा नहीं दे सका, न ही कोई और शानदार Espionage फिल्म पेश कर सका ! यदि "ऐसी ही कशिश" वाली इसके मुकाबिले, इसके समकक्ष "कोई दूसरी Espionage हिंदी फिल्म" आपलोगों ने देखी है तो बताइये ताकि उसे मैं भी देख लूं!

[जीतेंद्र भाई की 'फ़र्ज़' as a spy thriller का नाम न लीजियेगा, क्योंकि वह 1st Indian Espionage Movie of India है भी या नहीं मुझे नहीं मालूम, फिर भी जीतू भाई के लिए और उसके गानों के लिए मैं उसकी इज्ज़त करता हूँ, लेकिन वह the Best नहीं है! मिथुन as Gun Master G9 मुझे कभी भी पसंद नहीं, सॉरी]

BEST of THE BEST ये है! _"ऑंखें !!" जो रीयली "ऑंखें" खोलती है! आगे पढ़िए....

.....मेजर साहब के बेटे सुनील से उसकी बहन 'जापानी लड़की' की कहानी सुनती है! इसमें भी, यानि जापान जाने में भी सुनील का मकसद उसका कर्तव्य ही है, लेकिन किसी 'मिशन' पर नहीं! जापान में सुनील की मुलाकात मिनाक्षी से हुई थी, जो सुनील से प्रेम करने लगती है! मिनाक्षी के दिवंगत पिता सुनील के पिताजी मेजर साहब के दोस्त और आज़ाद हिन्द फ़ौज के सेनानी थे! एक शानदार और यादगार और सदाबहार गाना यहाँ है: "...मिलती है ज़िन्दगी में मोहब्बत कभी, कभी...!" एक और बात शेयर कर लूं : 'इस फिल्म को देखने के बाद "बोटिंग" मेरे लिए किसी Fantasy से कम न थी! आज तक जब भी मौका लगा और बोटिंग का चांस मिला मुझे यही गाना याद आता रहता है, सही है, कुछ बातें आपके व्यक्तित्व का ही नहीं, वरण अस्तित्व का अंग बन जातीं हैं...!'

....सलीम जो दुश्मनों के बीच है,......अपने मिशन को अंजाम देते हुए मारा जाता है !!! ...जिसकी मौत की खबर सुनते ही मेजर साहब की ".....सलीईईइम!!" की चीख से सारा स्क्रीन लाल खूनी रक्तमय हो जाता है!

कैप्टन, जो 'शिप' द्वारा हिन्दुस्तान में छिपे देश के दुश्मनों के लिए आर्म्स & अम्युनेशन ला रहा था, बड़े ही रहस्यमय तरीके से कमांडर के पास आता है! (किस रहस्यमय तरीके से? जिन्होंने नहीं देखा, अवश्य देखिये।) कैप्टन का आना, उसका कमांडर से मिलना, गुप्त अड्डे की सैर, ...जो सुरक्षा के अत्याधुनिक साधनों और इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल्ड यंत्र, उपकरण self destruction, by pushing a only button के लिए भी well equipped है, और trespassing controlled laser signals से लैस और सुरक्षित है, मस्त लगता है!! और कमांडर द्वारा अपने मंसूबों की व्याख्या __इन दृश्यों को रामानंद सागर साहब ने फिल्माने में लगता है अपनी पूरी क्षमता लगा दी थी! किन शब्दों में इसकी तारीफ करूँ समझ में नहीं आता! कमांडर द्वारा उसके अपने मंसूबों की व्याख्या को सुनने में ऐसा लगता है जैसे वह ""_अभी के, तत्काल के_"" हालातों को बयाँ कर रहा हो ! यही इस फिल्म को ALL TIME RELEVANT, सर्वकालीन प्रासंगिक के विशेषण को इज्ज़त दिलाता है, जो Breathtaking है! Very Exciting, Very Surprising or Impressive है!! -और जो सच में सच है!-  और जो देश और हमारे लिए अफ़सोस और चिंता की बात है!
 .......इधर हताश मेजर साहब सुनील को कहते हैं : "...अब तुम्हें -बेरुत- जाना होगा !!" _मिशन है: देश से बाहर देश के दुश्मनों को धता बताते हुए यह पता लगाना कि हिन्दुस्तान में दुश्मनों का "सदर मुकाम" कहाँ है? _मुल्क के अन्दर मुल्क के दुश्मन कौन हैं?? _यहाँ से सुनील की एक्शन में इंट्री होती है ! मेजर साहब सुनील को बेरुत में पहले ही पहुँच चुके अन्य ग्रुप मेम्बर्स और स्थानीय सहायक नदीम की तस्वीरें दिखाते हैं! सुनील मिनाक्षी की तस्वीर देखकर हैरान रह जाता है, कि वह भी इसी ग्रुप की सक्रीय सदस्या है, जो बेरुत में एक डांसिंग ट्रूप की शक्ल में मौजूद हैं! ...दिल थाम कर हम सुनील के साथ बेरुत जाते हैं ...! वहाँ सुनील की मुलाक़ात मिस्टर नदीम से होती है जो सुनील को बेरुत में सहायता और सहूलियतों के साथ ख़ास सूचनाएं देकर सुनील के गुप्त मिशन को सफल होने में मदद करेगा! ख़ास और ज्यादा गुप्त बात यह है कि नादिम को भी यह बात नहीं मालूम कि बेरुत में सुनील के कोई और साथी भी हैं !! नादिम सुनील को जिस होटल में ठहराता है वहां की तलाशी लेते वक़्त सुनील को कई जगह से जानबूझ कर छिपाए गए ट्रांसमीटर्स मिलते हैं !! और (हम) दर्शक सन्न रह जाते हैं ! बेरुत में मिनाक्षी को Indian Embassy से एक ख़त मिलता है, जिससे पता चलता है कि हिन्दुस्तान से कोई एजेंट इस मिशन को अंजाम देने के लिए आ रहा है, जिसकी उन्हें पूरी सहायता करनी होगी और जो मिशन का इंचार्ज होगा! चिट्ठी पर लगी पोस्टेज स्टाम्प को एक ख़ास लिक्विड से भिगोकर उखाड़ने पर दो स्टैम्प्स के नीचे छिपे दो "माइक्रो फिल्म" मिलते हैं जिसमे से एक में कोडेड मेसेज है और दुसरे में हिन्दुस्तान से आने वाले एजेंट की तस्वीर...!  बेरुत में छिपते-छुपाते, नदीम से भी बचकर अपने साथियों तक सुनील किस तरीके से पहुँचता है ...फिल्म में देखिये !! यहाँ दुश्मनों द्वारा ट्रांसमीटर्स का इस्तेमाल यूँ है जैसे आज का मोबाइल फ़ोन हो, और भविष्य दिखला रहे हो !! (जेम्स बांड की फिल्म You Only Live Twice की याद दिलाती है!!) सुनील की मुलाकात अपने ग्रुप मेंबर्स और मिनाक्षी से होती है! मिनाक्षी और ग्रुप के दो ख़ास सदस्य "महमूद" और "स्टूडियो ओनर" भी कोई कम नहीं हैं! उन्होंने भी अपना मुकाम ऐसा गोपनीय बनाया है जो सुनील को खूब भाता है! सुनील, नदीम पर अपना शक ज़ाहिर करता है..., फिर जब मिशन शुरू होता है,...सांस लेने की भी जैसे फुर्सत नहीं मिलती...! कर्णप्रिय गाने के दरम्यान भी स्टंटमय जासूसी !!  ">>>"गैरों पे करम अपनों पे सितम ??" ...काहे हो ? मिनाक्षी का 'विग' समूचे स्क्रीन को कवर कर लेता है (हा हा !!)! इस पार्टी में, जो नादिम के जन्म दिन की ख़ुशी में है, सुनील की मुलाक़ात शाहजादी ज़ेनब से होती है, जो पहली नज़र में सुनील पर फ़िदा हो जाती है।.....

दुश्मन को जानकारी है कि मेजर साहब को रोके बिना उनके मनसूबे पूरे नहीं होंगे! अतः वह घात लगते हैं! मेजर साहब के नवासे का अपहरण कर लेते हैं! जिसमें एक गद्दार उनका साथ देता है!

फिर सांस लेने को तभी फुर्सत मिलती है जब इंटरवल के बाद सुनील की बहन भगवान् के सामने दुखद गाना गाती है! शायद यह गाना इंटरवल के बाद इसलिए डाला गया होगा ताकि सभी दर्शक आराम से हलके होकर अपना चनाचूर या पॉपकॉर्न खाते हुए बढियां से सैटल-डाउन हो लें! ...लेकिन जैसे ही गाना समाप्त होता है दुश्मन अपनी चाल चल देते हैं! कमांडर अपने दल की सदस्या "मैडम" को एक षड्यंत्र रच कर मेजर साहब के घर में घुसा देता है! मेजर साहब को बस इतना पता है कि यह "बुढ़िया" उनकी बेटी के पति की सगी मौसी हैं!! और फिर सांसें रोक देने वाली घटनाएं छद्म वेष-भूषा, फेस-मास्क और ट्रांसमीटर्स के गज़ब के खेल, खतरनाक खेल शुरू हो जाते हैं!... बेरुत से सुनील का मेसेज _by the interception of enemy radio signals_ बुढ़िया 'मैडम' कमांडर को भेजती है, कमांडर इस मेसेज को वापस बेरुत में अपने पार्टनर को देता है, बेरुत में बैठा हिंदुस्तान का दुश्मन सुनील पे जिसकी शरू से ही ""ऑंखें"" लगीं हैं फिर घातक घात करते हैं ...और सुनील क़ैद हो जाता है! ...ट्रांसमीटर्स के सहयोग से ही मीनाक्षी, महमूद और 'स्टूडियो ओनर' मिलकर भिखारियों जैसा वेष धारण कर सुनील का पता लगाने में बेरुत की गलियों की ख़ाक तक छान देते हैं लेकिन सुनील का पता नहीं मिलता .....वे दुश्मनों के बीच हैं ...... और मिलकर नाच-गा रहे हैं "... तुझको रक्खें राम तुझको अल्लाह रक्खे ....इंटरनेशनल फकीर आये हैं .... अरे कहाँ छुप गया है तू कठोर ........!!"  कॉमेडी, कॉमेडी ही लगती है जो निर्मल हास्य पैदा करती है कोई फूहड़ता नहीं!  .....अंततः बेरुत में सफलता मिलती भी है या कोई जान से जाता है? नदीम में क्या भेद था? ज़ेनब नाम की रहस्यमयी किरदार ने (जो असलियत में दुश्मन की जासूस है!) सुनील पर रीझ कर जिसकी जान लेनी थी, क्या करती है? क्या सुनील को बेरुत में सफलता मिलती है या ......

हॉल में खुशनुमा हंसी, ठहाके, तालियाँ, शोर, हल्ला, गालियों, कोसनों और जूत-पूजार ने नवाजी जा रही बुढ़िया 'मैडम' को  मेजर साहब जब हुमच कर मारते हैं तब गज़ब का माहौल बन जाता है, Gun Fire, Suspense & Horror से हमारी हालत भी पतली होती है!! ...लेकिन "मैडम" सायनाइड खाकर जान दे देती है !! ऐसी शानदार अदाकारी दुर्लभ ही देखने को मिलती है!! अफ़सोस से गर्दन हिलाते मेजर साहब का संवाद आज भी मुझे रोमांचित कर देता है _: "इसकी मौत हमारी शिकश्त है!"

फिल्म की खासियत है "ऑंखें" ! हर किसी की "ऑंखें"!! और आँखों की भंगिमाएं! जैसे आँखों से ही संवाद अदायगी कर रहे हों ! और रामानंद सागर साहब इसमें पूर्णतः सफल रहे है! मैंने उन्हें सेल्यूट करता हूँ!
_जय हिन्द!

मित्रों, उपरोक्त में मैंने कहीं भी किसी भी कलाकार का नाम नहीं लिया है, फिल्म में जिसकी जो भूमिका है वही लिखा है! वो बाकी अब यहाँ --पेस्ट-- किये देता हूँ :
Directed by Ramanand Sagar
Produced by Ramanand Sagar
Written by Ramanand Sagar



Music by Ravi
Cinematography G. Singh
Editing by Lachhmandass
Release date(s) 1968
Country India
Language Hindi

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Cast:

  • Mala Sinha ... Meenakshi Mehta
  • Dharmendra ... Sunil
  • Kumkum ... Sunil's Sister
  • Sujit Kumar ... Nadeem
  • Mehmood ... Mehmood
  • Lalita Pawar ... Madam / fake Mousi
  • Daisy Irani ... Lily
  • Zeb Rehman ... Princess Zehnab
  • Madhumati ... Madhu
  • Neelam
  • Sujata
  • Nazir Hussain ... Diwan Chand aka Major Saab
  • Jeevan ... Doctor
  • Amarnath
  • Madan Puri ... Captain
  • Dhumal ... Studio Owner
  • Sajjan ... Boss in Beirut
  • Master Ratan ... Babloo
  • Hiralal
  • Parduman
  • A. A. Khan
  • Jagdish Kanwal
  • Narbada Shankar
  • Ram Tipnis
  • Lachhmandass
  • M. B. Shetty ... Guard who gets arrested with the Diamond Dealer
  • Kailash Advani
  • Ishar Singh
  • Shafi
  • Lalit Kumar
  • Ramlal
  • Mohammed Ali
  • Sheru
  • Qamar
  • Vishnu
  • Bismillah
  • & श्रीकांत तिवारी : AS दर्शक & प्रशंशक