Friday, February 22, 2013

डांट-फटकार की शेयर-बाजारी !!

डॉक्टर साहब के दुखद निधन के बाद सभी मजदूरों ने खुद को यतीम समझा तो गलत नहीं समझा।

मजदूरों की भाषा में "युगों पुरानी रवायत" का अंत हो गया। मजदूरों की शंका सच सिद्ध हुई। पहले वाली बात अब नहीं रही। पहले वाली बात... ... ...

जब भी कोई मजदूर या उसके परिवार का कोई सदस्य बीमार पड़ता, उसके निदान के लिए डॉक्टर साहब की उपस्थिति 'सबसे बड़ी दवा से भी बड़ी' राहत थी। संसार से भी बड़ी बीमारों की फौज में वे हरेक मरीज़ को उसके नाम, चेहरे सहित उसके पूरे परिवार को पहचानते थे। इन्होने (इन मरीज़ मजदूरों ने) भी यह बात अपने बाप-दादा और नाना से सुनी थी। जिसके वे प्रत्यक्ष गवाह बने। डॉक्टर साहब के स्नेहिल हाथ की थपथपाहट, उनके स्पर्श करने और मरीज़ के मुवयाने करने का अंदाज़, उनके पूछताछ का हंसोड़ ढंग, उनकी मुस्कान, सभी के सुख-दुःख में उनकी गरिमामय उपस्थिति को याद कर आज हर मरीज़ की आँखों में लाचारी और बेबसी के आंसू हैं। कंपनी के मजदूरों को डॉक्टर साहब की फीस अपनी जेब से नहीं चुकानी पड़ती थी। डॉक्टर साहब के लिखे पर्ची के मुताबिक दवा-दुकान से दवाइयाँ अपनी जेब से बिना कोई भुगतान दिए मिला करतीं थीं। हर छोटे मजदूर को और कंपनी के 'हर-एक-बड़े' स्टाफ को 'मेडिकल-फ्री' थी। यदि दुर्भाग्यवश बीमारी अगर रेफर केस बन जाती तो बड़े शहर में बड़े डॉक्टर्स के इलाज़ की फीस और सभी दवाइयों की कीमत -फिर भी- कंपनी ही अदा करती थी। कभी कोई अपवाद हो ही जाता था अन्यथा, प्रायः इसके लिए कभी भी किसी भी मजदूर या स्टाफ को सीधे कंपनी के मालिकान के पास कोई अलग से फरियाद की दरख्वाश दाखिल करने की जरूरत नहीं पड़ती थी। इसके लिए डॉक्टर साहब से पुनः सम्पर्क ही काफी होता था। इससे आराम, राहत और फायदा ये होता था कि न मरीज़ को सीधे मालिकान से सामना होता था न मालिकान एक-एक मजदूर के अलग-अलग मेडिकल खर्चे की झिक-झिक में पड़ते थे। सबकुछ एक स्वचलित प्रणाली की तरह सुचारू रूप से चलता था। मालिकन खुश कि उसने वादा निभाया और सद्कार्य किया, पुन्य कमाया और स्टाफ को उत्तम स्वास्थ्य देकर कामकाज निर्बाध जारी रखा। स्टाफ और मजदूर खुश कि मालिकान ने उस पर, उसके पूरे परवार पर दया की, उन्हें स्वस्थ किया और जीवन के नाना प्रकार के जंजालों में से एक सबसे बड़े ज़हमत से उसे निजात दिलाई! वह उपकृत होकर दो-गुने जोश से कंपनी के प्रति अपनी जिम्मेवारी निभाने में जुट जाता। डॉक्टर साहब भी खुश कि 'इतने' गरीबों की दुआएं उन्हें मिलीं, और एक धनाढ्य कंपनी को अपना क्लायंट और पारिवारिक मित्र बनाया, साथ-ही-साथ गरीब-से-गरीबतर भी उनके प्रिय मित्र, शुभचिंतक और आजीवन मुरीद बन गए। दवा-दुकानदार खुश कि उसे इतनी बड़ी ग्राहक-ग्रुप मिली। मतलब सभी खुश। ...बिमारी न हुआ त्यौहार हो गया!

इस ख़ुशी को ग्रहण तब लगा जब स्वार्थी और गन्दी इंसानी फितरत ने इस जामात को छू लिया। इसके बाद इस परिवार में पवित्र प्रेम का निरंतर ह्रास होना, उसका क्षय होना शुरू हो गया। किसकी (किस ख़ास की) बुरी नज़र लगी ये न सोचा जा सकता है न अनुमान लगाया जा सकता है। एकबार भ्रमित होने के बाद अचानक सभी को 'सभी' बुरे लगने लगे। धीरे-धीरे जिसकी बारी आई वे पुराने और शुभचिंतक और पथप्रदर्शक गुरु, स्वामी, पति, पिता और पुत्रों की म्रत्यु से यह परिवार खाली होने लगा और उनकी जगह आये नए लालची और स्वार्थी तत्वों की भरमार हो गई। मजदूरों की पहचान _उनका बेशकीमती योगदान, उनकी अटूट मेहनत_ चापलूसी की भेंट होने लगे। जिन मालिकान को 'गरीब नीयरे और मजदूर प्यारे' थे, उनके नजदीक अब उनके नए चापलूसों की फौज ने अपने घेरे में ले लिया। मालिकान को भी 'वक़्त' बदलता दिखा उन्होंने चापलूसों की सेना के आगे निःस्वार्थ मजदूरों को खो दिया और स्वार्थी और कुटिल लोगों को अपना हितु बना लिया और होने वाले हर नुकसान का ठीकरा बेक़सूर मजदूरों के सिर फूटने लगा। चापलूसों ने डॉक्टर साहब की निश्छल, निःस्वार्थ सेवा को भी सवालों के घेरे में डालकर मालिकान को दिग्भ्रमित कर दिया जिससे आपसी-प्रेम को सबसे बड़ा झटका लगा, दरारें पड़ गईं! मजदूरों की बिमारी अब 'उनके'{मालिकान-के}रहम की मोहताज होने लगीं! सभी की बिमारी उन्हें {मालिकान-को}झूठी लगने लगीं। सभी की मासूम बातों में अब कंपनी को झूठ-फरेब और बिमारी का बहाना बनाकर 'गंदे पैसे' कमाने की चाल, सिर्फ चाल ही दिखने लगीं। इनकी नज़रों में डॉक्टर साहब अब 'जरूरत से ज्यादा' दवा लिखने वाले बन गये। दवा-दुकानदार इन्हें कुटिल व्यापारी कमीशन और दलाली-खोर दिखने लगा। मजदूर और सभी स्टाफ की नैतिकता हमेशा के लिए बदनाम हो गई। यूँ चापलूसों की सेना ने 'प्रेम और विशवास की हत्या' की और मालिकान के हमप्याला-हमनिवाला बनकर सत्ता और धन के सान्निध्य का हक़दार बनकर दिखाया। फिर मजदूरों पर भी हुकूमत करने की उनकी असफल कोशिश ने उन्हें आइना दिखाया तो उनकी भयानक मंशा की गति सिर्फ थोड़ी मद्धम ही हुई, _लेकिन उनकी मजदूरों और स्टाफ पर भी हुकूमत करने की चाल नाकामयाब रही। इससे बौखलाकर उन्होंने धनवानों की इस फितरत पर हमला किया कि 'हर दरबार की शोभा विदूषक से ही शोभायमान होती है'। उन्होंने अपनी छवि चाटुकार और विदूषक की बना ली जो हर सुबह राजा की आँखें खुलते ही उसके सामने अपना हंसमुख मुँह पेश करना, दिन भर उन्हें अपने निर्देशानुसार आखेट पर ले जाना, अपनी पसंद के जानवर को राजा का निशाना बनाना, शिकार के गोश्त के बंटवारे में अपनी बेशकीमती राय की महत्ता स्थापित करना, राजा के भोजन-शयन और आराम के साथ-साथ उनके लिए मनोरंजन के सम्पूर्ण साधनों की वव्यवस्था करना, कारोबार में अपना छोटा मुंह बड़ी बात की संज्ञा से विभूषित राय देकर राजा को आज्ञा देने के लिए अपने विशेष-इशारे की प्रतीक्षा के लिए रोके रखना, फिर और राजा की ओर से राजाज्ञा की घोषणा करना, इसतरह हर मजदूर, हर नागरिक को 'अपनी' चापलूसी में लगाना इन शत्रुओं का फैशन बन गया। जिसके थपेड़े जब डॉक्टर साहब, दवा-दुकानदार और दरबार की जनता पर पड़े तो उसकी जलन किसी भी घातक तेज़ाब की जलन से कहीं ज्यादा थी। पौराणिक खानदानी रीत अब राजा और राज-परिवार को खलने लगी। उन्हें उनके विदूषक चाटुकारों ने समझाया और कुछ स्वार्थी और दुष्ट नागरिकों की पोल खोलकर 'बड़ा-खुलासा' का सेहरा अपने सर पहना। एक उदाहरण ने सौ परिवारों की बलि ले ली। नीरीह, निर्दोष, सहमी हुई मासूम जनता पिस गई। लेकिन यहाँ कोई यूनियन नहीं, और न ही इसकी कोई गुंजाइश छोड़ी गई थी। कारोबार और नौकरी जारी रही लेकिन डॉक्टर साहब के घर जाने की नौबत आने पार मामूली फुंसी भी अब गहरे नासूर की तरह तकलीफदेह हो गई थी। आये दिन मालिकान, मजदूरों और स्टाफ पर खुलेआम बिगड़ने लगे। डांट-फटकार अब हर स्टाफ और मजदूरों की दिनचर्या में शुमार हो गई थी। इसी नफरत के बीच एक दिन वयोवृद्ध डॉक्टर साहब का निधन हो गया। समूची जनता को "लकवा-सा" मार गया ...

अब क्या होगा?

हर कोई इसे आपस में अपने-आपसे, एक दूसरे से पूछता फिर रहा है। कोई जबाब नहीं! __यह यक्ष प्रश्न अभी भी जस-का-तस खड़ा है...

डॉक्टर साहब के निधन के बाद चूंकि समूची मेडिकल व्यवस्था टूट गई थी, अब एक-एक टिकिया की कीमत के लिए मजदूरों और समूचे स्टाफ को मालिकान का ही आसरा था। जब ऐसा पहली बार हुआ तो बड़े मालिकान हकबकाय, झुंझलाय, कसमसाय, कुलबुलाय, तिलमिलाए, बिलबिलाय। जिस बीमार भीड़ की मेडिकल बिल्स का उन्होंने अनेक वर्षों से लगातार निर्विरोध, निर्विवाद रूप से भुगतान किया उन्हें इस लम्बी लाइन में कुछ ही चेहरे जाने-पहचाने बाकी सभी अजनबी लगे! ...फिर इस लम्बी लाइन का कोई अंत नहीं! ...फिर, हर के हाथ में दो-दो, चार-चार कागज़ के पुर्जे दिखे! मतलब एक बैठकी में यदि 25-व्यक्तियों की लाइन हैं तो तक़रीबन 100-पुर्जे देखना! उन्हें पढ़ना, समझना, सवाल-जबाब करना, फैसला लेना, और सब पर कलम चलाना भारी काम लगा। अब इसे कोई दूसरा तो नहीं करेगा, करना तो इन्होने स्वयं था!...किया। पर सख्त हिदायत जारी हुई कि आइंदे हर कोई माह में सिर्फ एक ही बार आवे। सबके हाथ में एक से ज्यादा पुर्जा न हो। सिर्फ 'अपनी' बिमारी की बात करे। पूरे परिवार का ठेका कंपनी ने नहीं लिया हुआ। और सबसे बड़ी हुक्म :'-जो जिस मालिक का नौकर है उसका फैसला उसका 'अपना मालिक' ही लेगा', सो! ...भागो सब यहाँ से...

जब जिस ख़ास मालिक का दरबार लगा तो उनके साथ उनके विदूषक और चाटुकार भी आसन पर विराजे। बीमार नौकर पेश हुआ तो चाटुकार या विदूषक ने ही सभी सभी तरह के जबाब-तलब किये, पुर्जे जांचे और मालिक को अपना विशेष-इशारा दिया। मालिक की घोषणा हुई कि 'तू चोर है, तू बेईमान है, तू झूठा है, तू मक्कार है..., तुझे हराम की खाने की लत पड़ गई है, तू दवा-दुकानदार से मिला हुआ है, उसके साथ मिलकर तूने झूठे कागज़ बनवाये हैं, तुझे कुछ नहीं मिलेगा...!'...भाक्क हिंयां से...

ऐसे दृश्य अब दरबार में आम दिखने लगे थे। डांट-फटकार, दुत्कार, धिक्कार, नफरत, हिकारत, गालियों और कोसनो से सुसज्जित नौकर खुद को धन्य-धन्य मान कर मालिक और विदूषक जी का उपकृत होकर निहाल होता _असल में अपना मुँह पिटवाकर_ जब अपने घर आया तो बीबी ने समझाया कि राजा की बात का बुरा नहीं माना जाता। दुधारू गाय की लताड़ भी अच्छी होती है, उसे भी उसी तरह स्वीकार करना चाहिए जैसे उसके हरेक आशीर्वाद को अब तक सिर-माथे लिया है। जब उसे पता चला कि उसके चार बच्चों को कुत्ते-बिल्ली के बच्चों से तुलना कर धिक्कारा गया है और एक छहमहीने-बच्चे की दवा का पुर्जा भी अस्वीकृत होकर फट चूका है तो वो भी संज्ञाशून्य-सी होकर अंतरिक्ष को सवालिया निगाहों से ताकती रह गई।

अब, दरबार में सबके मुख मलीन हैं। जो हर बिमारी को हंसी से त्यौहार की तरह हंस कर झेलते थे छोटी से छोटी बिमारी के नाम से भी कांपने लगे। सबको मनुष्य का शरीर है। कभी-न-कभी इस शरीर को किसी-न-किसी  इलाज़ की जरूरत पड़ेगी ही, भगवान् न करे, भगवान् न करे अब जो ऐसा वक़्त आ ही गया तो क्या होगा? कहीं बड़ी बिमारी से सामना हो गया तो क्या होगा? कहीं किसी प्रकार के ऑपरेशन का चक्कर पड़ गया तो क्या होगा? इस प्रकार के सवालों के अंत की कोई सीमा नहीं... पर इन लाचार और मजबूर मजदूरों को कौन-से जबाब से तसल्ली मिलेगी?? किसी के मुँह से अफ़सोस में डूबे स्वर से ये शब्द निकले :-'क्या मालिक की डांट-फटकार से डरकर बिमारी भाग जायेगी? क्या गरीब अब अमिर की डांट-फटकार के डर से अब बीमार ही नहीं पड़ेगा!?!?!?'

इस बात को एक विदूषक-जी ने सूना और खिलखिला कर हंसा:-'अब यही कामना करो! इसी तमन्ना मे अब तुमलोगों की गति है!' उसकी इस ताने भरी बात और निर्भीक भंगिमा से लगा जैसे वो ये भी जताना चाह रहा हो कि -'इससे हमही तुम्हें निजात दिला सकते हैं!' मुझे उसकी ये बात और उसकी हंसी बहुत बुरी और भयानक लगी। कोई फ़िल्मी हीरो होता तो युनियन बनाकर हड़ताल कर देता और एक्शनपैक्ड दृश्यों-की-सी सजा इन चाटुकारों को देता। लेकिन कठोर सच्चाई कहती है कि :-'ज़रा खुद को देखो, अपनी हालत को देखो! देखकर तुम्हें खुद ही पता लग जाएगा कि तुम मेरा क्या बिगाड़ सकते हो?'

पर शायद अभी इतने बुरे दिन नहीं आये हैं, और आयेंगे तो देख लेंगे! जैसे साक्षात् मौत को देख लिया वो इन तुच्छ लोगों की उलाहने और ललकार को भी देख लिया जाएगा। लेकिन इस जमूरे की बात का जबाब देना जरूरी था वरना इसने आज हमें ललकारा है, रोका न गया तो इसकी कुटिलता और निर्भीकता की वजह से हो सकता है किसी मजदूर भाई की दुःख के आंसू कभी नहीं सूखेंगे, किसी के भी रोके न रुकेंगे। मैंने उसे टोका :-'भाई साब! मेरी एक राय मानिए और अपने मालिक ही नहीं समूचे मालिकान सहित पूरी कंपनी को राय दीजिये कि वो आपको अपना एक और इकलौता भड़वा और दलाल घोषित करें। आप यहीं इसी ज़मीन पर, जिसकी धुल- माटी में हमने जनम लेकर अपना सर्वस्व, किसी ने स्वेच्छा से तो किसी ने मजबूरी से, इस कंपनी के मालिकान के हाथों में सौंप दिया है, आप अपनी दलाली और भड़वागिरी की दुकान लगावें। आपका तम्बू तानने में हम भी आपकी सहायता करेंगे। और उस पर बोर्ड टांगेंगे "डांट-फटकार की शेयर-बाजारी !! उर्फ़, भड़वागिरी की दुकान!" ...आप अपनी दलाली की दुकान में बकायदे हमसे फीस लेकर हमें अपनी निर्लज्ज सलाह दें कि हम अधिक-से-अधिक नाजायज़ पैसा कमाने के लिए कौन सी वाहियात बिमारी का ढोंग करें!? आप खुद चलकर दवा दुकानदार से मिलें, अपनी दलाली की कमीशन फिक्स करें! हमारे नाम का पुर्जा हासिल करें! फिर आप अपनी भड़वागिरी के देखरेख में स्वयं हमें मालिकान के आगे पेश करें और उन्हें सलाह दें कि आपकी पसंद की "निम्नलिखित गालियों की लिस्ट" में से 'फलाना गाली' से हमारी जूत-पुजार करें और जो कि फिर आपकी नयन-कटारी के ख़ास इशारे, भौंह-मटक्के के अर्थ को समझकर हमारी अर्जी पर दस्तखत कर देने की महान कृपा करेंगे! फिर जब वो पुर्जा नगदी निकासी में कामयाब हो जाय तो आप हमसे अपनी फीस और दुकानदार से अपनी दलाली वसूल लें! आप अपनी भड़वागिरी की दुकान में दलाली की और मशवरे की एक लिस्ट टांगें जो इस प्रकार होगा :
इन्वेस्ट करें और फजीहत के साथ घर बैठे उत्तम स्वास्थ्य और 'अनिश्चित' मुनाफा कमायें:
१. सिरदर्द होने पर > मामूली गाली! मुनाफा ५% 
२. जुकाम होने पर > थोड़ी ज्यादा मामूली गाली! मुनाफा १०%
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.etc etc ...
किसी भी वाद-विवाद का न्याय-छेत्र भड़वे दलाल जी के बापों का मोहल्ला होगा।'
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'अब से इसी बात पर डिस्कशन होगा कि किसे कौन से नंबर की डांट खिलाई जाए, किस लेवल की गाली दिलवाई जाय ताकि उसकी बिमारी दूर जाय।​ भड़वे जी की चम्पी करेंगे और घिघियाएंगे कि बॉस डांट सुनवा दो ना! माँ बीमार है! भड़वे जी का दरबार लगेगा और दूर-दराज के गावों-देहात से लोग 'डांट-फटकार में इन्वेस्ट करने' आने शुरू करेंगे।  शेयर के भाव इसी तरह ऊपर नीचे होते पाये जायेंगे! सेंसेक्स की चर्चा होगी! हो सकता है कोई ऐसी गाली डेवेलप हो जाय जिससे मौत को भी टाला जा सके! जिसके शेयर विदेशों तक में बेचे जा सकेंगे! अर्थव्यवस्था को गालियों का सहारा मिलेगा, मरीजों को स्वास्थ्य के साथ मुनाफे में भी इजाफा होगा! भड़वे जी की लम्बी उम्र की दुवाएं मांगी जायेंगी लेकिन ऐसी किसी भी गाली का लाभ न होगा, क्योंकि भड़वागिरी एक लाइलाज बिमारी है, देश-विदेशों में शोध हो रहे हैं, लेकिन कोई भी सटीक गाली अब तक नहीं पाई जा सकी है जो इस भड़वे को फिर से स्वस्थ कर सके! अंततः मरेगा। फिर उसकी कब्र या समाधि पर स्मारक बनवाया जाएगा! चंदे में सबसे बड़ी राशि मालिकान ही देंगे ताकि शेष भड़वों को प्रोत्साहन मिले! समरक पर हर वर्ष पुण्य तिथि का त्यौहार या उर्स मनाया जाएगा! मालिकान और मजदूरों और स्वर्गीय डॉक्टर साहब के परिवार की तरफ से चादरें चढ़ाई जायेंगी! कीर्तन होंगे! जयजयकार होगा! प्रसाद और चढ़ावे चढ़ेंगे! भड़वे जी की याद में कवि-सम्मलेन और मुशायारें होंगे जिसमे भड़वे जी की शान में गीत-संगीत, दोहे और छंद पढ़े जायेंगे! गालियों की शेयर दुकान की लोप्रियता से प्रेरित होकर दवा निर्माता गालियों पर शोध को फाइनांस करेंगे! कोई नयी इजाद होगी तो उसे हर तरह के इनाम-इकराम से नवाज़ा जायेगा! लगे रहिये! नयी इजाद के बाद गालियों की पुडिया सस्ते दर पर बाज़ार में आ जायेंगी! और कृतज्ञ मजदूर नारा लगायेंगे :-'जब तक सूरज-चाँद रहेगा भड़वे जी में प्राण रहेगा! भड़वे भाई अमर रहें! --अमर रहें! अमर रहें!!'

नमस्ते।
_श्री .