Saturday, February 16, 2013

आईना

अभी हाल ही में मेरे बाबूजी के समधी (जीजाजी के बुजुर्ग चाचाजी), के दर्शन हुए। झुकी कमर, 80-85 के करीब उम्र और बीमार शरीर। पर तीक्ष्ण कटाक्षपूर्ण व्यंग्य भरी कमजोर आवाज में उनकी ओजस्वी वाणी ने मुझे आईना दिखाया।

बुजुर्गवार के पधारने के बाद उन्हें उनकी सुविधानुसार ठहराया गया। ड्राईंग रूम में ही, दीवान पर उनका बिछावन लगा दिया गया। उनके पुत्र सदैव उनकी सेवा में तत्पर रहे। अखबार पढ़कर उन्हें कई बार असहाय भाव से गर्दन हिलाते और देश के भविष्य के प्रति चिंता जताते देखा-सुना। उन्होंने बाबूजी की कई पुरानी बातें और उनके साथ बिताये क्षणों को याद किया और मुझे सुनाकर रोमांचित किया। और बातें करना चाहते थे पर मुझे व्यस्त देखकर रुक गये।

चूँकि घर में शादी के वजह से हम 'बच्चों' का जमघट्टा लगा था। हंसी-ख़ुशी-किलकारी और अट्टहासों का वातावरण था। मेरे बच्चे, भांजे-भांजियों ने मुझे घेर लिया और बचपन के मजाकिए यादों, और उपन्यासों की कहानियों को सुनने-सुनाने की महफ़िल-सी सजा दी। जोश में मैंने खूब कथा-कल्याण किया। खूब हंसा-हंसाया। अपने प्रिय लेखक 'पाठक साहब' की बातें की। उनके उपन्यासों के दर्शन कराते ही छीना-झपटी हुई। "मीना मर्डर केस" रिम्पी ले गई। ड्राईंगरूम के फर्श पर कालीन डालकर हम सभी, दीदी-जीजाजी, माँ, मेरी पत्नी और बच्चों का हुजूम साथ मिलकर बैठ जाते और हंसी-ठट्टे करते बतियाते, खाते-पीते, एक-दुसरे को कहते-सुनते, सुनाते जाते थे। मजाक होते तो न रुक पाने वाली हंसी और ठहाकों के गर्जन से कमरा गूंजता, आँखें छलछला आतीं। ये सब ख़ामोशी-से, कभी हँसते तो कभी मुस्काते वृद्ध चाचाजी देखते।

काम-काज के दरम्यान कई बार जीजाजी की गाडी, कभी मुझे भी ड्राइव करनी पड़ी। मेरी अपनी गाड़ी अनवरत व्यस्त रही, _रेलवे स्टेशन से घर से मार्किट से बस स्टैंड से घर से मार्किट से रेलवे स्टेशन से घर से मार्किट से रेलवे स्टेशन से घर से बस स्टैंड_ तीन दिनों खूब दौड़ी। कमल के आने के पर जब उसने ड्राइव किया तो __ उसे ब्रेक कमज़ोर मिला, उसने जीजाजी से चिंता जताई कि ऐसी हालत में मैं गाड़ी किस तरह चला कर, सपरिवार आया? और अभी तक चलाये ही जा रहा हूँ!! अगले सुबह मेरी दीदी की, लोहरदगा की बचपन की सहेली जो विवाह के बाद अब कोलकाता में रहतीं हैं, तनुजा दीदी अपने पति और बेटी के साथ आईं थीं। उसी दिन मुझे भांजियों रिम्पी और निशि (वुड-बी 'दुल्हन' बिटिया) को ब्यूटी-पार्लर ले जाना था और लौटते समय तनूजा दीदी को, सपरिवार उनके होटल से घर लिवा लाना था। जिम्मी (प्रीतिश, मेरा बेटा) साथ चला, जिसे जगन्नाथ मंदिर में इन्तेजामात देखने के लिए छोड़ना था। पहला मोड़ आते ही मेरे होश उड़ गए! गाड़ी की ब्रेक पूरी तरह फेल थी!! मैंने तत्काल क्लच से ताल-मेल मिलाकर, किटकिटा कर जोर से ब्रेक को चांपा, गियर लो किया, हैण्ड ब्रेक धीमें-से, पूरी खींची, गाड़ी घिसट कर रुक गई। "...क्या हुआ?" _तब मैंने हैरानी से ब्रेक फेल की बात बताई। ब्रेक आयल कंटेनर में झाँका। खाली! एम्प्टी!! जबकि घर (लोहरदगा) से सभी तरह से मैं चौकस गाड़ी लेकर चला था। मेरे प्राण काँप गए। मैंने कमल को तुरंत फोन किया। तब उसने अपनी बात कही। मैंने उसी क्षण उसे मेरे पास आने को कहा। वह ऑन-ड्यूटी, उसकी कम्पनी के काम-काज जो धनबाद-बोकारो में भी जारी थे, अपने सहकर्मी मित्र के साथ मेरे पास आने को निकल पडा। मैंने उसी हालत में सावधानी से रेंगते हुए जिम्मी को मंदिर छोड़ा। और तनूजा दीदी के होटल पहुंचा। "...अरे! श्रीकांत! तुम कितने बड़े हो गए हो! मुझे तो याद भी नहीं कि तुम बचपन में कैसे दिखते थे पर खूब दुबले पतले थे! कितने बदल गए हो तुम!!" तनूजा-दी, जीजाजी (उनके पति) और बिटिया को लेकर चला, बच्चियों को पार्लर छोड़ा। यूँ ही बड़ी सावधानी से गाडी चलाते मैंने तनूजा-दी को घर छोड़ा। शशि दिखा। मैंने हर्षित होकर कहा -'शशि! देख! तनूजा-दी!! शशि ने तनूजा-दी के चरण छुए। तनूजा-दी ने शशि को तत्काल पहचाना। "...हाँ! ये जस का तस है!" मैंने अभी मुंडन करवाया हुआ है। जिस रफ़्तार से नये बाल उग रहे हैं उससे नहीं लगता कि इस साल मुझे कंघी की जरूरत पड़ने वाली है। इसीलिए मैंने खुद की फोटो खिचवाने और इन्टरनेट पर अपलोड करने छोड़ दिए हैं। एक ज़माना था जब शशि के सिर पर बरगद के सामान बाल हुआ करते थे। शशि का सिर यही कहता है कि -"एक समय था जब हमपर भी बहार थी! यह संयोग ही है कि मेरे मुंडन की वजह से और शशि के 'उजड़े चमन' की वजह से -फिर भी- हम भाई ही दिखते हैं। कमल से भी तनूजा-दी की मुलाकात हुई। उनकी पुत्री ने रिम्पी से कहा -"मामा कितने अच्छे होते हैं ना!... पर मेरे कोई मामा नहीं ..!!" ये बात रिम्पी ने बहुत बाद में मुझे बतलाई। बाद में दीदी से भी मैंने कुछ डिटेल्स पूछे तो तनूजा-दी के परिवार की उनके बचपन की कहानी से मैं द्रवित और बहुत ही भावुक हो गया। अभी भी तनूजा-दी रिमोट कंट्रोल वाली पेसमेकर पे हैं। ब्रेन का 2-ऑपरेशन हो चूका है। फिर भी कोलकाता से अपनी सहेली की बेटी की शादी में शिरकत करने आईं!

कमल से मिला। अपनी-अपनी बातों पर हमें काफी हैरत हुई कि ब्रेक कैसे फेल हुआ। तत्क्षण सेक्टर-4 में मारुति वर्कशॉप का रुख किया गया। वहाँ के एक मुसलमान मिस्त्री ने गाडी की पहली आजमाइश में ही गड़बड़ पकड़ ली, कि ब्रेक आयल लीक कर जाने से ऐसा हुआ! अच्छी भली गाडी की ब्रेक आयल कैसे लीक हुई? जांचकर, ठीक कर के वापस देने में उसने जो वक़्त दिया वो हमें और परेशान करने वाला था। -'कल आइये!' _तब हमने उससे गुजारिश की, लड़की की शादी की बात कही। गाडी की ज़रुरत पर जोर दी। उसने पूछा -'आपकी बेटी की शादी है क्या, सर?' मैंने उससे कहा कि -'नहीं, मेरी भांजी की शादी है, और अभी बरात पहुँचने वाली है, प्लीज़...।' मिस्त्री ने कहा -'सर, आपका ओहदा लड़की के बाप से भी बड़ा है, "माँ-माँ" को मामा कहते हैं, आपकी भगिनी अपनी माँ, आपकी बहन को एक बार माँ बोलती है, पर आपको तो दो बार माँ पुकारती है, आपको अपने फ़र्ज़ की फिकर बिलकुल वाजिब है, आपकी चिंता हम समझते है, लंच का टाइम बीत रहा है, वर्कशॉप में कोई वर्कर नहीं है, फिर भी आइये, चलिए, हम देखते है। आप निश्चिन्त रहिये काम अभी हो जाएगा।' कमल और उसके मित्र ने इस बात को साक्षात देखा सुना। मिस्त्री, एक लेबर क्लास अनपढ़ की बातों से मन्त्रमुग्ध हम उसके पीछे चले। वो गाडी सर्विस स्टेशन में ले गया। वहाँ मौजूद हाथ पोंछते एक खलासी छोकरे को उसने फाल्ट चेक करने को बोला। छोकरे ने टाइम और भूख का हवाला दिया। मिस्त्री ने छोकरे को मीठी झिडकी दी-'अरे, चल न रे बेट्टा! बहुत शबाब वाला काम हउ! आज एक दिन लेट खइबे तो मर नइ जइबे!' उस्ताद, मिस्त्री की बात लड़के से न टाली गई। दोनों ने मिलकर फाल्ट तलाश किया। पिछले दाहिने चक्के में ब्रेक-आयल सिलेंडर की रबर, आयल-ट्यूब कटी पाई गई। मिस्त्री के अनुसार वह कट पुराना था, जो रात में -टें- बोल गया था, और सारी ब्रेक-आयल बह गई थी। नया सिलेंडर "मारुति-शोरूम/वर्कशॉप" में उपलब्ध नहीं था! मिस्त्री ने कहा -'एन.आर. वाला हीयाँ से ले लाइए।' हमने अपनी अनभिज्ञता जाहिर की कि 'हम बाहरी लोग हैं, ये दूकान हमें नहीं मालूम, प्लीज़ आप ही ले लाओ।' मिस्त्री ने फिर मुझे तसल्ली दी, मुझसे पैसे लिए और आधे घंटे का टाइम दिया। बोला -'अब दिन में गर्मी बढ़ गई है, ऑफिस में बैठिये या थोडा घूम-फिर के आइये, गाडी तैयार कर देते हैं।' हम एक रेस्टुरेंट में जा बैठे। बे-मन से कुछ खाया। वापस लौटे तो गाडी में काम जारी पाया। हमारे सामने सब काम हुआ। गाड़ी ठीक हो गई। मिस्त्री का तहे दिल से शुक्रिया कर, वर्कशॉप का बिल भुगतान कर हम लौटने लगे तो मिस्त्री ने पूछा -'सर, आपलोग कहाँ से आये हैं?' हमने कहा -'राँची से।" तो उसने बतलाया कि वो भी राँची, हिंदपीड़ी का रहने वाला है। गाडी का नंबर देखकर ही वो ये समझ गया था। मैंने उससे हाथ मिलाया फिर से शुक्रिया कहा और घर लौटे। इसी दरम्यान शादी की भीड़ में कई बार जीजाजी की गाडी मुझे चलानी पड़ी क्योंकि वे रस्मों में व्यस्त हो चुके थे। कमल ने हमारी मारुति संभाल ली। शादी की रात बीती।.सुबह होते ही गाडी की जरूरत पड़ी। कमल जब हमारी मारुति के पास गया तो पिछला बाँयां चक्का '-फ्लैट-', पंक्चर पाया। मुझे पता लगा तो मेरी फिर-से हवा निकल गई।

बिटिया की बिदाई और फिर नाश्ते के बाद कमल और मैंने स्टेपनी बदलनी चाहि, तो आपस में पूछने लगे रिंच और और टूल्स कहाँ हैं। काफी 'सूंघने' के बाद पिछली सीट के कारपेट के नीचे से टूल्स मिले। जैक और हैंडल दूसरी जगह से मिले। रिंच लेकर स्टेपनी खोलना चाहा तो डिस्कस करने लगे कि किधर ले लगाएँ और किधर घुमाएँ! मैंने शेखी बघारी तो बोल्ट सिर्फ घूमता था खुलता नहीं था। अपनी झेंप, लानत और कोसनों जैसे भाषे वाली डायलोग में घोलता मैंने कमल से कहा -' तूं ही देख।' कमल भी न खोल सका। आखिर हमने हार मान ली। कमल मेनरोड के मोड़ पर, सड़क पार, पेड़ के नीचे हवा भरने वाले और पंक्चर बनाने वाले बिना छत और दीवार की टायर दूकान से मिस्त्री को जीजाजी के स्कूटर पर बिठा लाया। मिस्त्री को मेरे हवाले कर वो अपने काम पर चला गया। मिस्त्री ने पंक्चर टायर को स्टेपनी से बदला। फिर पंक्चर टायर ले कर हम मेरी मारुति से उसकी दुकान पर आ गये। मुआयना करने पर ट्यूब 'बरबाद' हो चुका निकला। मिस्त्री को नए ट्यूब के पैसे देने के लिए जेब टटोला। कई कागजों में गुम सिर्फ एक '1000' का नोट था। मुझे हिचकिचाता देखकर उसने कहा -'घबराइये मत, सर! पईसा ले के नइ भागेंगे!' मैंने कहा -'नहीं भाई, वो बात नहीं है। मैं सोच रहा था कि इसे किसी से छुट्टा करा लूँ। मिस्त्री ने कहा -'थोडा देर का काम है, सर। सिर्फ ट्यूब ही तो बदलना है, और हम आपको दुकानदार का बिल भी देंगे। या आप अपने से ले आइये। जिनके घर के आप मेहमान हैं उनको हम उस समय से जानते हैं जब हमारा मूंछ भी नहीं उगा था। गडबड नहीं होगा, सर। साहब से पूछ लीजियेगा। आप ठहरिये, कुछ पहले का काम है उसको निपटा के तुरंत ट्यूब लाने जाते हैं।' मैंने कहा 'भई, मैं बाद में आता हूँ।' समय पूछ कर, उसे 1000 का नोट सौंप कर मैं घर वापस आ गया। समय होने पर मैं उसके पास गया तो एक सफ़ेद अम्बेसेडर खड़ी थी जिसके पहिये का पंक्चर वो उस वक़्त बना रहा था। गाडी के मालिक सब्र से खड़े उसकी मिस्त्रीगिरी देख रहे थे। मैं भी उत्सुकता से देखने लगा। काम के प्रति उसकी लगन, मेहनत, तत्परता और फूर्ती देखकर मुझे बहुत बढ़िया लगा। मुझे देखकर उसने कहा कि -'रेडी है सर। ले जाइये।' उसने मुझे ट्यूब की खरीद का बिल और बाकी पैसे लौटा दिए। मैंने उससे गुजारिश की कि वो मरम्मत हो चुके पहिये को स्टेपनी से बदले दे और स्टेपनी वापस उसकी सही जगह पर कस दे। वो थोडा खिन्न-सा हो गया। मैंने कहा आप अपने हाथ का काम पूरा कर लीजिये, मैं इन्तजार कर लेता हूँ। बैठने की कोई जगह और साधन नहीं थी सो मैं खड़ा रहा। किसी भी प्रकार की मिस्त्रीगिरी को उत्सुकता से, हर मिस्त्री की कारीगरी देखना मुझे बचपन से पसंद है। कभी-कभी मिस्त्री के साथ मैं खुद लग जाता हूँ। पंक्चर पहिये को खोलना, रिम से टायर-ट्यूब अलग करना फिर मरम्मत के बाद वापस लगाना हुनर, ताक़त और मेहनत वाला काम है। जो उसने अकेले अम्बेसेडर कार के पहिये का किया। फिर एक स्कूटर का पहिया, पंक्चर बनाने के लिए खोलने लगा। अम्बेसेडर वाले बाबू ने पैसे पूछे। मिस्त्री ने जब कीमत बताई तो बाबू गुसा गये -'हद है! मुझे फिर मरम्मत की ज़रुरत नहीं पड़ेगी या तुम काम छोड़ दोगे!? हुआ ही क्या था? दो जगह चिप्पी हो तो चिपकाई ना!? पहले से कीमत की बात नहीं की तो अब तुम उसकी एडवांटेज लोगे!? मिस्त्री खामोश अपना काम करता रहा। बाबू ने कुछ और प्रलाप किया। उनके साथ के आदमी ने पूछा क्या बात है, तो बाबू ने मिस्त्री की फजीहत करनी शुरू कर दी। उनके आदमी ने कहा -'ऐसे लोगों के मुँह मत लगिए, दे दीजिये पैसे, खुद भुगतेगा।' बकते-झकते बाबू ने पैसे दिए और चले गये। स्कूटर के नन्हें से पहिये ने भी बड़ी मेहनत करवाई। उसे फिट कर के वो मेरी गाड़ी की टायर चेंज करने लगा। बीच-बीच में वो हांफता। खड़े होकर कमर सीधी कर मुंह बनाकर अंगडाई तोड़ता, सांस लेता-छोड़ता हांफता फिर जैक और रिंच से जूझता टायर बदलने लगता। तभी स्कूटर का मालिक आ गया। पैसे पूछे, तो दाम सुनकर वो भी भड़क गये -'अब एकदम डकैती मत करो!' एक 10 का नोट थमाया और जाने लगे तो मिस्त्री ने कहा-'इतना से नहीं होगा, सर, और दीजिये। स्कूटर वाले ने कहा -'लूट लो भाई, मजबूर आदमी को सभी सताते हैं तो तुम क्यों पीछे रहोगे!' एक 5 का सिक्का और थमाकर चले गये। मेरे मुँह से अनायास निकल गया -"घूस देते वक़्त हाथ में बड़े वाले कई गांधी लेकर सरकारी बाबु से हाथ जोड़कर घूस स्वीकार कर के काम कर देने का आग्रह करते वक़्त भी यूँ ही मजबूर रहते हैं, पर उस वक़्त पैसे का मोह नहीं सताता। पल्ले से सब कुछ झाड देते हैं, साहब की चिरौरी करते हैं, हाथ जोड़ते हैं पैरों पड़ते हैं 'अब आप ही माई-बाप हैं' बोलते हैं, और भी जो साहब कहें सेवा की पेशकश करते हैं पर मजदूर की मजदूरी देते वक़्त इनकी फटती है, इस वक़्त सही कीमत याद आ जाती है, मजदूर के आगे बड़े निष्ठावान बनकर उचित-अनुचित का भाषण पिलाते हैं, लेकिन डॉक्टर के यहाँ लम्बी लाइन में से झूझते पहले और तुरंत-फुरंत- इलाज़ के लिए डॉक्टर के रिसेप्शनिश्ट को 'और' पैसे की देने की इच्छा बताते हैं तब इनकी सात पुश्तों पर एहसान करते, ब्लैक का पैसा, डॉक्टर साहब की गैर मुनासिब फीस वसूली जाती है जिसे भर कर ये खुद की पीठ थपथपाते हैं -'देखा! ऐसे काम निकाला जाता है!' बोल कर दायें-बाएं से बधाईयाँ बटोरते हैं पर रिक्शे वाले का भाड़ा इन्हें ज्यादा गैर-मुनासिब लगता है और ये रिक्शेवाले की गैरत को ललकारते हैं, उसे कोसते हैं 'लेना है तो लो वर्ना जाओ' बोलकर चल पड़ने लगते हैं।" __मेरी बात सुनकर मिस्त्री की आँखें भर आईं। सिर नीचे किये उसने अपना काम पूरा किया। और वापस अपने हवा वाली जर्जर मशीन के पास जाकर बाकी काम में व्यस्त हो गया। मैंने उससे पूछा कि और कितने पैसे दूं? उसने कहा -'नहीं सर, पइसा हमको मिल गया है, जो हम अभी आपका बाकी पइसा लौटाए हैं ना, उसी में अपना मजदूरी भी ले लिए हैं।' फिर भी किसी अंतरप्रेरणा (या झक्क जो भी समझिये) के हवाले मैंने जेब में हाथ डाला और जो हाथ लगा उसे दे दिया। मिस्त्री ने भावुक होकर हाथ जोड़े -'..ज..जी प्रणाम सर!' ..और मेरे पैर छूने चाहे मैंने उसे कंधे से थाम लिया -'भाई मैं कोई '-सर-वर-' नहीं हूँ, ज्यादा ही कहना है तो सिर्फ 'भईया' बोलो, तुम्हारी ही तरह मजदूर, पराधीन आदमी हूँ पर तुम्हारी तरह मेहनत मशक्कत मैं नहीं करता, मजदूरों के साथ मिलकर मजदूरी करना मेरा शौक है इसीलिए तुम्हारे काम और योगदान की कीमत पहचानता हूँ। मेरे दिए पैसे से तुम्हारा कुछ भला नहीं होने वाला ये तुम्हारे अपने काम के प्रति तुम्हारी हुनर,लगन और तुम्हारे स्वाभिमान को मेरा सेल्यूट है।' और मैंने उसे अपने गले से लगा लिया। "विमल" के 'हज़ार हाथ' कैसे और क्यूँ कर हैं? मैं विमल नहीं हूँ और न उसके जैसे कारनामे जानता हूँ, लेकिन ज़ज्बात उससे मिलते-जुलते हैं। मैं हज़ार का दावा इस ज़िन्दगी में कभी नहीं कर पाउँगा, लेकिन सैकड़ा की कहने की सोच सकता हूँ।

घर लौट कर मैंने जीजाजी को सेल्यूट किया तो उनके भाई (बुजुर्ग चचाजी के पुत्र, मोहन भैया) ने मजाक से पूछा -'ई का नौटंकी ह, हो?' तब मैंने उन्हें टायर बनाने वाले मिस्त्री की बात कही और कहा कि वो जीजाजी की कितनी इज्ज़त करता है! मेरा सेल्यूट उस मजदूर की तरफ से है, जिसे आपने आपना मानकर उसका मान बढ़ाया है। यही असली कमाई है। जो मेरे बाबूजी ने अर्जित की है। जो आपने भी कमाने में कोई कसर न छोड़ी। मजदूर की भावना ने बाबूजी की याद दिला दी, सो मैं आपको सलाम करता हूँ।' सुनकर जीजाजी और मोहन भैया भी बाबूजी को याद कर भावुक हो गए। मोहन भैया ने बताया कि उनके पास अभी भी दर्जनों चिट्ठियाँ महफूज़ हैं जो कभी बाबूजी ने उन्हें लिखीं थीं। बुजुर्गवार ने इसे भी खामोशी से देखा-सूना।
मैं लेबर-क्लास के लोगों को ही क्यूँ अपना दोस्त बनाना पसंद करता हूँ वजह बयान करने के लिए इसी घटनाक्रम में मेरे साथ हुई दो बातों को मिसाल के तौर पर लिखता हूँ। 1. बोकारो रेलवे स्टेशन पर जब हमलोग चाचाजी को वापसी की गाडी पर चढाने गए थे तब अपनी आदत के मुताबिक वक़्तगुजारी के लिए मैं प्लेटफ़ोर्म पर स्थित बुक-स्टाल पर जा कर किताबे देखने लगा। तभी मेरे मोबाइल पे कॉल आ गई। बातचीत और किताबों में मैं ऐसा खोया कि 'शरलौक होम्स के सर्वश्रेष्ठ कारनामे' जिसे वेदप्रकाश कम्बोज ने हिंदी में अनुवादित किया है, मुझे पसंद आ गई, और मैं उसे खरीदने के लिहाज़ से पढने लगा। निर्णय लेने में देर नहीं हुई। मैंने उसे खरीद लिया और उसे पढ़ते हुए जीजाजी वगैरह के पास आ खड़ा हुआ। गाडी के इन्तजार में हम गप-शप में लगे थे कि किसी अनजान लड़के ने मुझे मेरी पीठ पर ऊँगली से स्पर्श करके मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा। मैं चौंककर घूमा। -'हाँ जी?' उसने कहा -'वो किताब वाला दुकानदार आपको बुला रहा है!' (मैंने सोचा कहीं मैं पैसे चुकाना तो नहीं भूल गया!) -'क्यों?' लड़के ने मुझसे कहा -'शायद आपका मोबाइल वहीं रह गया है!' -'...अर्रे बाप रे !' मैं लपककर किताब दूकान पर पहुंचा। दुकानदार ने मुझे पहचाना, मुस्कुराया, मुझे मेरा फोन दिखा कर अर्थपूर्ण भाव से उसे हिलाया। मैंने झेंपते हुए सहमती में मुंडी हिलाई। बिना कुछ बोले उसने मेरा मोबाइल मझे सौंप दिया। मैं धन्यवाद में बहुत कुछ कहना चाहता था। पर सिर्फ अंग्रेजी वाला 'थैंक्स' मेरे मुंह से निकला। तभी गाडी आ गई। जीजाजी ने मुझे पुकारा। मैं वापस उनके पास गया तो उन्होंने, जो ये सारा तमाशा देखा था, मेरी पीठ पर कस कर एक मुक्का दिया और हंसने लगे -'तूं कभी नहीं सुधरेगा।' ... चाचाजी को गाडी पर बिठाकर लौटते वक़्त मैं वापस किताब दूकान पर गया। तब मैंने दुकानदार से पूरी बातचित की। हाथ मिलाया। हम दोनों हँसे-मुस्कुराए। मैंने कहा की जब भी आइंदे मैं बोकारो आऊंगा किताब लेनी हो या नहीं आपसे मिले बिना नहीं जाऊँगा। अब आप मेरे दोस्त हो। उसने सिर झुककर उलटे मेरा शुक्रिया कहा। मैंने वापस उसे शुक्रिया कहा। फिर हम दोनों ठठा कर हँसे। मैंने उसे विश किया और लौट आया।  2. मेरे नए चश्में का फ्रेम ढीला था जो बार-बार बहकर मेरी नाक पर आ जाता था। मैंने सोचा की राँची में जिसकी दूकान से ये चश्मा बनवाया था उसी से ठीक करवाऊंगा। वापस राँची आनेपर मैं दुकानदार के पास जाकर अपनी समस्या बतलाई। वो नौजवान सेठ अपनी कुर्सी पर पसरा हुआ था। उसने जैसे मेरे पुरखों पर कृपा करते हुए मेरी बात सुनी। और बेमन से अलसाए हुए बोला -'अभी लंच का टाइम है, ये कोई वक़्त है आने का? सभी स्टाफ लंच पे गए हुए हैं। बाद में आइये।' मुझे बहुत अचम्भा हुआ मन ही मन बोला कि फिर दूकान खोलकर क्यूँ बैठे हो! लेकिन मैंने फिर गुजारिश की कि -'मैं सफ़र पे हूँ, बाहर से आया हूँ, फिर पता नहीं कब आऊंगा, प्लीज़ आप खुद ही इसे ठीक कर दीजिये, जो भी मेहनताना होगा मैं चुकाऊंगा।' उसने उपेक्षा से कहा -'मैं ये सब नहीं करता, इसके लिए मैंने नौकर रखे हुए हैं। बोला न बाद में आइये!. मेरा मन किया कि उसे गर्दन से पकड़कर पेंडुलम की तरह झुलाऊं! ...तभी दूकान पर मौजूद मैले कुचैले कपडे पहने एक काले-कलूटे गरीब-से छोकरे ने मुझसे पूछा -'क्या हुआ है,सर?' मैंने चश्मा उतारकर उसे दिखाया, प्रोब्लम बताई की ढीला है। बह कर नाक की फुनगी पर आ जाता है, जिसे बार-बार सर्दी की तरह सुडकना पड़ता है। लडके की हंसी छुट गई। उसने कहा -'बैठिये, हम देखते हैं।' तभी दुकानदार ने जोर से पुकार कर छोकरे को डांटा -'अरे, अब तुम अपना कारीगरी मत दिखाओ! जाओ जा के उधर बैठो।' लेकिन पता नहीं क्यों लड़का (शायद) जानबूझकर अपने मालिक की बात अनसुनी-सी करता मेरा चश्मा लिए वर्कशॉप के भीतर चला गया। मैंने 'मलिक'जी' की तरफ मुस्कुराकर देखा तो उसने दूसरी तरफ मुँह घुमा लिया। मैं वहीं खड़ा आईने में देख-देखकर तरह-तरह के पोज़ बनाने लगा। थोड़ी देर में लड़का मेरे चश्मे को एक कपडे से पोंछता हुआ आया और मुझे थामकर बोला -'पहनकर देखिये, सर।' मैंने पहना। फर्क साफ़ महसूस हुआ। चश्मा बड़ी मजबूती से मेरी आँखों पर सज गया। मैंने गुर्राकर दिखावा किया -'इसे गर्म किया था क्या?' वो बोला -'जी! उसके बिना कैसे होता!' मैं मुस्कुराया। प्रत्युत्तर में लड़का भी मुस्कुराया। मैंने अपना हाथ आगे किया। उसने मेरा हाथ पूरी गर्मजोशी से थामकर हिलाया। मैंने उसे थैंक-यू कहा। वह शरमाया। मैंने 'मालिक जी' की और देखा और लड़के से बोला -'यारा! मैं कोई सर-वर नहीं हूँ!' मैंने 'मालिक जी' की ओर इशारा कर कहा -'सर तो ये लोग होते हैं, क्यूँ सर?' उसने फिर मुँह घुमा लिया। मैं उसके सामने जा खड़ा हुआ और सीटी मारी। उसने चौंक कर मझे देखा। मैंने सुनील के स्टाइल में उससे कहा -'थैंक-यू फॉर नथिंग!' वो कुछ बोलता उससे पहले ही मैंने लड़के को आँख मारी, और निकल लिया। अब बोलिए ....

कितने मेहनतकश मजदूर आपको जानते हैं? कितने रिक्शेवाले आपकी इज्ज़त करते हैं? भीषण गर्मी में 2 किमी जब "आप" रिक्शा पर पैसेंजर बिठाकर खींचोगे और 2-रूपए मेंहनताना पावोगे तो क्या आपको मंज़ूर होगा? आप कितने सरकारी बाबुओं को जानते हैं? कितने सरकारी बाबू आपको सलाम बोलते हैं? आप किसको सलाम बोलते हैं? कौन आपकी इज्ज़त करता है? कौन आपको गले लगाता है? आप किसको गले लगाते हैं? आप किसकी इज्ज़त करते हैं? आपकी एक आवाज़ पर कौन निःस्वार्थ आपकी सहायता पर तत्पर रहता और करता है? ऐसे कितने लोगों को आप जानते हैं? उनमे से कौन सामाजिक ओहदे में किस मुकाम पर आसीन है? मजदूर से बात करते वक़्त आपकी भाषा और वाणी कैसी होती है? मजदूर के मजदूरी की कीमत आप कैसे, किस पैमाने से नाप कर तय करते और अदा करते हैं? शादी-ब्याह, जन्म-मरण में कौन आपकी सहायता करता है? आपकी सेवा के बाद कितने मजदूर आपके द्वार से संतुष्ट और प्रसन्न हो कर विदा होते हैं? आपके साथ काम करने वाले कितने मजदूर फिर-से दुबारा आपकी सेवा के लिए तत्पर रहते हैं, आपका काम उत्साह से, लगन से करते नहीं अघाते? ठीक है, मजदूरी की कीमत तय और नियत होनी चाहिए ताकि बहस ही न हो। सही कीमत चुकाइये। हाथ में नोट लेकर आप मजदूर के पीछे दौड़ते हैं या मजदूर अपनी सेवा के साथ सदा आपके पीछे खड़ा रहता है? टिप की बात छोडिये। टिप से परहेज कीजिये। टिप ही बैलेंस बिगाड़ता है। क्या मैंने टायर वाले को टिप दी थी? क्या मैं खुद को नायक साबित करना चाहता था? क्या ऐसा करते पब्लिक ने मुझे सरेआम देखा था? क्या मेरे एक मजदूर को गले लगाने की पब्लिसिटी हुई? पब्लिसिटी यहाँ हो रही है। जो मैं यहाँ इन लाइनों को लिख रहा हूँ। ताकि लोग जानें और मुझे "मान" दें। यह तो स्वार्थ हो गया। पैसे खर्च कर के झूटी ख्याति की बेशर्म कोशिश हो गई। लानत है, ऐसी ओछी नीयत पर! तो क्या मुझे ये बातें शेयर नहीं करनी चाहिए? अगर किया तो क्या गुनाह किया? नेकी कर दरिया में डाल दूँ तो मेरे बच्चों को कैसे पता चलेगा कि मजदूर से दोस्ती और उसकी इज्ज़त और मदद करना उनके दादाजी (बाबा) और पिता का जूनून था, है? आज बाबूजी को हमारे यहाँ जितने लोग 'मिस' करते हैं, उनमे से सबसे ज्यादा तादाद मजदूरों की ही है। कोई सेठ, नेता, बाहुबली या धनकुबेर मेरे बाबूजी को मिस नहीं करता। बाबूजी को शहर में देखकर मजदूर ही उन्हें प्रणाम करते थे। बाबूजी को बाज़ार जाना होता या सिनेमा, उनके लिए रिक्शे वाले आपस में लड़ते। सिनेमा वाले बुकिंग क्लर्क (सुभाष भईया) बाबूजी की आमद पर टिकट और मुनासिब सीट सुरक्षित रखते। स्वर्गीय डॉक्टर बिसु बाबु के यहाँ बाबूजी घूमने के ख्याल से पैदल ही 2-किलोमीटर चले जाते तो इलाज के बाद बिसु बाबु बाबूजी के मना करने पर भी उनके लिए रिक्शा बुलवा देते। दवा दुकानदार (गोपाल चाचा) बाबूजी को दुकान के भीतर बुलाकर बिठाते और सभी दवाइयाँ आराम से चाय पिलाकर देते। जिस दुकान पर बाबूजी चले जाते दुकानदार पैसे की बात बाद में करता सामान पहले पैक कर रिक्शा पर रखवा देता था। उनके सहकर्मी जो आज मेरे सहकर्मी हैं, वही मजदूर तबका बाबूजी को मिस करता है। वही लोग आज मेरी हर मदद और सहायता को सदा तैयार रहते है, और मैं उनके। क्योंकि ये ही मेरे बाबूजी के संगी-साथी मेरी अंतिम बारात के बाराती होंगे, हिस्सेदार जैसे रिश्तेदार नहीं, जो मुर्दे की बोटियाँ नोचते हुए शर्माते तक नहीं!

मुझे खुद को 'भईया' कहलवाने का बहुत शौक है। कोई स्नेह से या यूँ ही मुझे भईया बोलता है तो मुझे बड़ी ख़ुशी होती है। लेकिन जिम्मी, सन्नी के मित्र और अभी बोकारो में मेरे भांजे उज्जवल के जो दोस्त अपनी निशि दीदी की शादी में शरीक होने आये थे सभी मुझे अंकल बोलते हैं। मैं उनसे सहमत होता हूँ पर 'बुढउ' की तरह कुढ़ कर रह जाता हूँ। मेरे घर की दाई की पोती मुझे दादा कहती है और मैं उसे (हँसते हुए) मारने दौडाता हूँ। रिम्पी ने अपने बेटे 'शौर्य' को सिखाया है कि वो मुझे 'बड़े-मामा-नानू' कहा करे। (...हाय रे बप्पा! हम 'नाना' बन गेलियई!) एक शाम मैं जीजाजी के साथ मार्केट गया तो अपनी लत के मुताबिक जीजाजी एक पान की दूकान पर जा पंहुचे। उन्होंने हम दोनों के लिए पान बनाने का आर्डर दिया। मैंने जीजाजी से मजाक में कहा कि बचपन में एक बार आपने मुझे प्लांट (बोकारो इस्पात कारखाना) घुमाया था, इससे पहले की मेरी उम्र हो जाए एक बार फिर घूमने की तमन्ना है। जीजाजी कुछ कहते तभी दुकानदार के लड़के ने जो दूकान 'बढ़ा' रहा था, एक डिस्प्ले रैक अन्दर रखने की गरज से मुझसे बोला -'अंकल! जरा साइड हटिये।' ("_दुर्र फीटे मूँ!") मैं चिढ गया, और जीजाजी से बोला -'अब तो जरूर ही घूमना पड़ेगा। इस आदमी (लड़के) ने मुझे आइना जो दिखा दिया!' जीजाजी ठठा कर हँसे। मेरे बेटे मुझे 'पापा' कहते हैं। मैंने कभी ऐतराज नहीं किया। (हालांकि मुझे इस शब्द से भी चिढ है, पापी का आका = पापा!)। पर मेरी बिटिया गुनगुन को मैंने सबक सिखाया है कि वो पापा-मम्मी  "_'अपने' पापा-मम्मी_" (कमल और रूपा को ही) कहे पर मुझे _"बाबूजी_" पुकारा करे, 'चाचा' नहीं, 'ताउ' नहीं, 'बड़े-पापा' भी नहीं। इसीलिए हरिवंश राय बच्चन जी को अमित जी जब "बाबूजी" लिखते-बोलते हैं तो अमित जी से स्वाभाविक स्नेह हो जाता है। यह शब्द "बाबूजी" सदैव मेरे बाबूजी को मेरे अंग-संग रखता है। मेरे बाबूजी, जो मुझे हमेशा हिदायत करते रहते हैं कि कभी अपनी औकात मत भूलो। मैंने जिम्मी,सन्नी, लड्डू से हमेशा कहा है कि अब्दुल कलाम बनो, आइंस्टीन बनो, स्टिफन हाकिंग बनो पर उससे पहले इंसान बनो। मुझे फक्र है कि मेरे बच्चे मुझे उन पर नाज़ करने का हमेशा अवसर देते रहते हैं। अभी मेरी भांजी (उनकी निशि दीदी) की शादी में उनकी मौजूदगी और 'भाई' की भूमिका पर दीदी-जीजाजी, मोहन भईया ने मेरी पीठ ठोकी कि मैंने अपने बच्चों को बहुत ही अच्छे संस्कार दिए हैं। लेकिन ऐसा है नहीं। बच्चों में ये जन्मजात गुण स्वयं बाबूजी और ईश्वर की मुझ पर असीम कृपा है। गुनगुन का मुझे "_बाबूजी_" कहना समूचे परिवार, रिश्तेदारों को खूब भाता है। गुनगुन और मेरा आपस में पिता-पुत्री का प्रेम, जिम्मी और गुनगुन का आपस में सगे भाई-बहन का प्रेम, वीणा और कमल का आपस में भाभी-देवर से बढ़कर माँ-बेटे जैसा प्रेम, वीणा और गुनगुन का आपस में माँ-बेटी का प्रेम घर में एक मिसाल है। मुझे मेरी बेटी पर नाज़ है और यकीन है कि वो जो भी करेगी, जो भी बनेगी सभी उस पर फक्र करेंगे। क्या हुआ जो उसके जन्मदाता मैं और मेरी पत्नी वीणा का शरीर नहीं हैं। पर हम उसके माँ-बाबूजी हैं। गुनगुन, मेरी बेटी का जन्म मेरे घर में मेरे लिए प्रभु का सबसे बड़ा वरदान है।

किसने कहा? ये इम्पोर्टेंट नहीं क्योंकि भीड़ की कोई शक्ल नहीं होती। बाबूजी की बात निकलने पर मुझे फिर-से वही उपदेश सुनने को मिले जो मैं उनके देहावसान के बाद से लगातार सुनते चला आ रहा हूँ, जो रिश्तेदारों के जमघट्टे में आम 'मुझ' पर प्रहार करने के लिए, एक तरह से 'मुझे' नीचा दिखाने के लिए प्रयोग किये जाते हैं, पर उनपर अमल करने को मेरा जी नहीं चाहता __कि -'तोहार बाबूजी साल में एक बेरी सबहन रिस्तेदारन के ईहाँ हर हाल में घूमे-फीरे, मीले-जूले जात रहन।' __कि -'तोहार बाबूजी के किरपा से न जाने के55तना आदमी के नौकरी, रोजी-रोजगार भ गईल, बाकी तूं त ओकनी के पनियों न (पानी भी नहीं) पूछअ ल!' __कि -'तुमने उनके नाम और प्रतिष्ठा को बनाय रखने के लिए कुछ भी नहीं किया, बड़े अफ़सोस की बात है!' __कि -'तोहार बाबूजी हमेशा सबहन के चिट्ठी द्वारा संपर्क में रहत रहन, आपन हरेक चिट्ठी में आपन पता लिखके अंतरदेसी भेजत रहन, लेकिन तूं त आजकल फ़ोन भी ना करे ल!' __कि -'तोहार बाबूजी तूं लोग खातिर मकान बनवा देहलन, बाकि तूं त ए गो कोठरियों ना बनवइलअ!'  मैं कुछ भी गुस्ताखी पूर्ण उत्तर नहीं दे सकता कि बाबूजी जो करते थे वो मैं क्यों नहीं करता, क्योंकि प्रश्न पूछने वाले श्रीमान को इसका कारण सहित उत्तर भली-भाँती मालूम है। आइना मुझे दिखाने के बदले उसमे खुद को ढूंढें और पहचानने की कोशिश करें कि क्या वे वही 25 साल पहले वाले ही श्रीमंत हैं? क्या हालात भी वही हैं? क्या परिवेश भी वही हैं? क्या माहौल भी वही हैं? आज बाबूजी की बनवाई हुई मकान खड़ी है, सलामत है तो कौन उसकी देखभाल और रख-रखाव की चिंता कर रहा है? बाबूजी के गुजरने के बाद हम पितृहीन अनाथों को किसने अपनाया? तिवारी जी के देहावसान के बाद उनके अनाथ परिवार को आपने कब और कितनी बार याद किया या पूछा? किसने बाबूजी का जीवन भर खून पीया और उनके गुजरते ही हमारी बोटियाँ भी नोच डाली? उन्हें क्यों नहीं सबक दिया गया? किसने बाबूजी के लगाए फुलवारी को आग लगाईं? मेरे बाबूजी से इतना ही प्रेम था तो उन दरिंदों को हम पर ज़ुल्म ढाने से क्यों नहीं रोका गया? उस वक़्त जब सहायता के लिए हम आप श्रीमंत सहित सबके दरवाजे-दरवाजे फिरते थे तब हमारा हाथ आपने क्यों नहीं थामा? आज आपको स्वर्गीय तिवारी जी याद आ रहे हैं, लेकिन आपके सामने उन्ही तिवारी जी की संतानों की तरक्की और उन्नती में भी खोट दिख रहा है तो इसका क्या इलाज़ है? आज हमारे दिलों में खून के रिश्ते में से स्वार्थ और नफरत की बू आती है तो इसे पैदा करने वाला कौन है? कौन है? किसने ये विध्वंश मचाया? किसने हमें तबाह किया? क्यों किया? कोई उस राक्षस को क्यों नहीं उपदेश देता? हर ज़ुल्म सहने के बाद भी हम ही अभी-भी बे-वजह क्यूँ हर किसी के निशाने पर हैं? क्या बिगाड़ा था हमने किसी का?  .................. इसके बावजूद आज जब हम संभले हैं तो क्यों हमारे सूखते घावों पर विष मला जा रहा है? हमारी हंसी में सबको उछ्रिन्खलता क्यों दिखती है, आंसू के बाद बड़ी मेहनत से पाई निश्छल मुस्कान क्यों नहीं दिखती?? आइना खुद देखिये औए खुद को पहचानिए। शायद आपकी शक्ल देखकर आइना ही आपको न पहचाने, क्योंकि अब आपकी समाई आईने में नहीं समंदर में ही संभव है।

विदा की घड़ियाँ आईं तो कई फेरे फिर-से स्टेशन और बस स्टैंड के लगे। सभी मेहमानों को विदा किया गया। फिर बुजुर्ग चचाजी की बारी आई तो जीजा जी ने जबरन मुझे अपने साथ ले लिया। रास्ते में हम पान खाने के लिए रुके। कभी मैं पान खाने का बहुत ही शौक़ीन था। अब आदत छूट गई है। लेकिन जीजाजी के स्नेहिल सान्निध्य का सुख उठाने के लिए उनके साथ अपने पसंदीदा ब्रांड के मसालों की खुशबु वाले पान जरूर खाता हूँ। पान की दूकान पर मोहन भईया ने अपनी बातों से मेरा दिल जीत लिया। उन्होंने मुझे बहुत आशीर्वाद दिया। मेरी पीठ और सिर को सहलाया। बुजुर्गवार (जीजाजी की) गाडी में अगली सीट पर ही बैठे हमें देखते रहे। जब हम फिर चले तो आगे बैठे चाचाजी, जीजाजी से गाडी के बारे में पूछते थे -'पेट्रोल से चलेला कि डीजल से?' -'गाडी के का नाम ह?' -'कय (कितने) आदमी समा लन?" (जबकि मुझे मिलाकर उस वक़्त 6 ठुंसे हुए थे)...

हम स्टेशन पहुंचे। सबने सामान सम्भाला। बुजुर्गवार को सावधानी से उतारकर खड़ा किया गया। लाठी और एक व्यक्ति (मोहन भईया) के सहारे के लिए वो ठिठके खड़े थे। मुझे नजदीक देखकर उन्होंने इशारे से मुझे पास बुलाया पूछे -'बहुत किताब पढ़अ ल?' 
मैंने कहा -'जी हाँ।'
'कइसन, कौन विषय के?'
"जासूसी।'
जासूसी?'
'जी।'
'ई गाडी कय बेर चलवलअ ह?'
'कई बार।'
'केतना नंबर ह?'
'जी?'
'अरे भाई ई गाडी के केतना नंबर ह?'
'ओह!'
मैं गाडी के नंबर प्लेट देखने को लपका तो उन्होंने मजबूती से मेरा हाथ पकड़ कर रोक लिया -'रहे द, रहे द। फेल त हो गइलअ!' इतना कह वृद्ध स्वयं ही स्टेशन की तरफ लपक लिए। और मैं ....मुझे लगा की आइना अब मुझे फिर से देखना पड़ेगा ... या बुजुर्वार दिखा गए! ....सोचो, सोचो (और माथा खराब करो)।
**********
अगले दिन सुबह 15, फरवरी, 2013 की सुबह मैंने 'मन्त्र-स्नान' किया। और वापस घर (लोहरदगा) को लौट चले। मिलन के बाद की जुदाई बड़ी दुःख देती है। कौन नहीं रोया!? सभी रोये। मेरी हर बात सबको रुला रही थी, मैं हँसाना चाहता था तो उलटे सभी रोते थे। मेरे दामाद जी, (रिम्पी के पति) उदयन जी, मेरी बात पर मेरे हाथ जोड़कर निवेदन पर कि 'आइयेगा' बड़े भावुक हो कर मेरी आगोश में समा गए, यह देख रिम्पी फफक पड़ी। और मुझसे लिपटकर फूट-फूटकर कर रोने लगी। माँ, गोल्डी, वीणा और दीदी-जीजाजी के भी आंसू बेकाबू हो गये। यहाँ तक कि जिम्मी, सन्नी भी उदास होकर सिर झुकाय विनम्र खड़े सबको प्यार के आंसुओं में सराबोर होते देखते रहे। जिम्मी और सन्नी ने मुझसे इजाज़त ली थी कि वे 'निशि-दी' के ससुराल रेशैप्शन पार्टी में बुआ (फुआ)-फूफा जी के साथ जायेंगे। सब रो रहे थे लेकिन एक मैं ही पत्थर दिल दांत निपोर रहा था। मेरे शरीर में रोने और आंसू बहाने वाला सिस्टम बिगड़ा हुआ जो है। मैंने जब पहली बार बाबूजी की ब्रेन ट्यूमर (टर्न्ड इन कैंसर) की रिपोर्ट देखि तब भी न रोया। जब उनकी मृत्यु हुई तो उनके पार्थिव शरीर को अपनी गोद में थामे हुए भी मैं न रोया। जब मैंने उन्हें मुखाग्नि दी तब भी न रोया। जब पगड़ी की रस्म हुई तो मैं मुरारी मामा की ओर देखकर सुबकने लगा। लेकिन ...अब मैं क्या कहूँ, शायद पागल हो गया हूँ, ...मैं देशभक्ति के गीतों पर और मनोज कुमार जी की फिल्म "पूरब और पश्चिम" के गीत 'दुल्हन चली' के एक ख़ास तान पर अपने आंसू नहीं रोक पाता। खैर,...हमने विदा ली और घर को लौट चले।
**********
रास्ते भर माँ सरस्वती की पूजा के पंडालों में बजते फ़िल्मी, डिस्को म्यूजिक सुनते हम घर की तरफ वापस लौट निकले। मैंने ड्राइविंग सम्भाली। हम भी जब बचपन में अपने मोहल्ले में चंदा करके सरस्वती माँ की पूजा करते थे तो तब के हिट फिल्मों के गाने या डायलाग ही बजाते और फक्र से सुनते सुनाते थे। दुर्गा पूजा के पंडालों में अब दुर्गाशप्तशती के मंतोच्चार, लखबीर सिंह लक्खा, नरेन्द्र चंचल, अनुराधा पौडवाल, उदित नारायण, अनूप जलोटा इत्यादि-इत्यादि के भजन बजते हैं पर सरस्वती पूजा _"ई तो स्टूडेंट सब के परब हैय न सर! ए.आर. रहमान के म्यूजिक में भी तो सरस्वती माँ का वास है ना! बजावे दीजिये ना।" ...ओके! ओके! ओके! हम भी 'शोले', 'दीवार' के डायलाग और उषा उथुप के "...रंबा हो हो हो"," ...हरी ओम हरी", सुभास घई की फिल्म 'क़र्ज़' का गाना "...हे! तुमने कभी किसी से प्यार किया? ...किया। ...मैंने भी किया! ...ॐ शान्ति ओम", इत्यादि बजाते ही थे। आप "...फेविकोल" बजाओ या चिपकाओ कौन रोकेगा!! फिल्म दबन्ग-2 का ये गाना हर शहर के हर पूजा पंडालों में बजता पाया गया। कॉम्पिटिशन सिर्फ इस बात का था कौन इसे कितने जोर की आवाज़ में बजा सकता था। 'फेविकोल' को सुनते लोहरदगा आये तो यहाँ भी वही गाना। बाकी गानों को इस गाने ने इस बार मात दे दी। पता नहीं यह गाना किसको आइना दिखा रहा है ...
फिलहाल नमस्ते। 
_श्री .