Wednesday, February 6, 2013

फिल्म 'हकीकत' का ये गीत

मैं ये सोच कर उसके दर से उठा था कि वो रोक लेगी मना लेगी मुझको ....
(मेरे मित्र, भ्रातृवत डॉक्टर श्री राजेश पराशर जी के सौजन्य से; क्योंकि उन्होंने ही इसकी याद दिलाई तो प्रेरणा आई।)>>
main ye sochkar uske dar se uThaa thaa मैं ये सोचकर उसके दर से उठा था 
ke vo rok legi manaa legi mujhko के वो रोक लेगी मना लेगी मुझको 
havaaon mein lahraataa aataa thaa daaman हवावों में लहराता आता था दामन
ke daaman pakaDkar biThaa legi mujhko के दामन पकड़कर बिठा लेगी मुझको 
kadam aise andaaz se uTh rahe the क़दम ऐसे अंदाज़ से उठ रहे थे 
ke aavaaz dekar bulaa legi mujhko के आवाज़ देकर बुला लेगी मुझको 
magar usne rokaa मगर उसने रोका
na usne manaayaa न उसने मनाया 
na daaman hi pakaDaa न दामन ही पकड़ा 
na mujhko biThaayaa न मुझको बुलाया 
na aavaaz hi dii न आवाज़ ही दी 
na vaapas bulaayaa न वापस बुलाया 
main aahistaa aahistaa baDhtaa hi aayaa मैं आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ता ही आया
yahaaN tak ke us se judaa ho gayaa main -2 यहाँ तक के उससे जुदा हो गया मैं ...
 
यहाँ तक के उससे जुदा हो गया मैं ...
judaa ho gayaa main -4

जुदा हो गया मैं ... 
जुदा हो गया मैं ... 
जुदा हो गया मैं ... 
जुदा हो गया मैं ...
  http://www.youtube.com/watch?v=ALn8z12A0p0
फिल्म 'हकीकत' का ये गीत (हमारे समय के खलनायक) सुधीर पर फिल्माया गया था। उसकी प्रेमिका तत्काल शादी से इसलिए इनकार कर देती है क्योंकि सुधीर को ऑर्डर्स मिल चुके थे। चीन के आक्रामक तेवर की वजह से उसकी छुटीयाँ कैंसिल हो जातीं हैं और उसे उसी समय फ्रंट पर जाने का हुक्म हो चुका होता है। इनकार करती मंगेतर उससे रूखेपन से पेश आती है। सुधीर तल्ख़ वातावरण में ही उससे विदाई लेता है। जाते-जाते वो अपनी मंगेतर से पूछता है -'मुझे खत लिखोगी?" तो वो मना कर देती है। टूटे ह्रदय से फौजी, सुधीर चला जाता है, लेकिन फ्रंट पर उसे कोई ख़त नहीं मिलता। उसका एक साथी ख़त न मिलने पर उसकी खिल्ली उड़ाता है। मायूस सुधीर ख़त के इंतज़ार में बैठा है कि बैकग्राउंड से ये गीत रफ़ी साब की भीनी आवाज़ में सभी टूटे दिलों को आवाज़ देती है। ...आखिरकार जंग छिड़ जाती है। सुधीर को गोली लग जाती है, उसका एक साथी (ह्रितिक रौशन के ससुर संजय खान साहब) उसे बचाने के लिए उसके घायल जिस्म को काफी दूर तक ले जाता है, पर प्यास और थकान उसे तोड़ देती है, सुधीर उससे इल्तजा करता है कि वो उसे छोड़कर चला जाय। संजय चला जाता है। और एक चट्टान की ओट में अपनी बेबसी पर फुट-फूटकर रो पड़ता है। इधर सुधीर अपने ज़ख़्मी, गोली खाई शरीर को कुछ दूर घसीटता है पर उसका बल चुक जाता है और वो शिथिल पड जाता है। तभी बैकग्राउंड से यही गीत इस बार दर्द और बेबसी में डूबे स्वर में गूंजती है ...सुधीर के प्राण निकल जाते हैं, और इसबार 'हमारी' आँखों से दर्द औए बेबसी के अविरल आँसू बहने लगते हैं.....

_श्री .