Tuesday, January 15, 2013

युद्ध जब तक टले, टालना चाहिए

जंग जब सर पे आ ही जायेगी तो जंग होगी जो किसी के टाले नहीं टलेगी। और ये भी निश्चित जान लीजिये कि विजयश्री हमेशा की तरह हमारे भारत की हमारी सेना की हमारे जवानों की ही होगी। पर यह भी सच है कि युद्ध की विभीषिका को कोई भी नहीं झेल सकता। युद्ध जब तक टले, टालना चाहिए। पाकिस्तान भस्मासुर बना हुआ है, अपनी मौत खुद ही मरेगा, हमें असर हुआ तो कौन जाने, हो सकता है इस बार विश्वपटल से उसका नक्शा ही गायब हो जाएगा। हमारे जवानों और सेना के हौसले सदा की भाँती बुलंद है और सारा देश उनके साथ खड़ा है। फैसला हम नहीं सेना लेगी। और सेना का फैसला ही अंतिम और न्यायोचित होगा। राजनीतिकों की नहीं। राजनेताओं की हरकत पर जनता और सेना सबकी निगाहें हैं। सेना पर, सैन्य नायकों पर हमें पूरा यकीन है, हमारे देश का मान उनके दम पर सदा बना रहेगा। जय हिन्द!

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मै तो युद्ध ही चाहता हु किउ की एक बार तो पाकिस्तान को उसकी औकात दिखाना ही पड़ेगा और बताना पड़ेगा की हम हिन्दुस्तानी शेर है
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  • Abhay Marodia agaami 2 saal ke liye shanti
  • Pradeep Patel war achi chiz nhi h......bahut kharab chiz h....bahut jyda
  • Shrikant Tiwari जंग जब सर पे आ ही जायेगी तो जंग होगी जो किसी के टाले नहीं टलेगी। और ये भी निश्चित जान लीजिये कि विजयश्री हमेशा की तरह हमारे भारत की हमारी सेना की हमारे जवानों की ही होगी। पर यह भी सच है कि युद्ध की विभीषिका को को कोई भी नहीं झेल सकता। युद्ध जब तक टले, टालना चाहिए। पाकिस्तान भस्मासुर बना हुआ है, अपनी मौत खुद ही मरेगा, हमें असर हुआ तो कौन जाने, हो सकता है इस बार विश्वपटल से उसका नक्शा ही गायब हो जाएगा। हमारे जवानों और सेना के हौसले सदा की भाँती बुलंद है और सारा देश उनके साथ खड़ा है। फैसला हम नहीं सेना लेगी। और सेना का फैसला ही अंतिम और न्यायोचित होगा। राजनीतिकों की नहीं। राजनेताओं की हरकत पर जनता और सेना सबकी निगाहें हैं। सेना पर, सैन्य नायकों पर हमें पूरा यकीन है, हमारे देश का मान उनके दम पर सदा बना रहेगा। जय हिन्द!
    _श्रीकांत तिवारी .

"सीक्रेट एजेंट" और मेरी बेचैनी !

            अब से 12 साल पहले एक थ्रिलर उपन्यास पढने को मिला था: "दहशतगर्दी"! इसमें लेखक ने कारगिल युद्ध में पराजित पाकिस्तान, पाकिस्तानी सेना, पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी ISI और पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों, दहशतगर्दों की खीज से पैदा हुई भारत विरोधी षड्यंत्र की (काल्पनिक) कथा कही थी। इसकी कहानी में लेखक ने कट्टर और दुर्दांत दहशतगर्दों की विकृत, घातक और भारत विरोधी मानसिकता का अत्यंत ही रोमांचक किन्तु सच्चा चित्रण किया था। इसमें इन दहशतगर्दों की सलाहियत (सम्पन्नता, पहुँच तथा दबदबे), और अंतर्राष्ट्रीय रूप से फैले इनके खतरनाक-व्यापक-अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क और दहशतनाक मंसूबे की व्याख्या एक भारत विरोधी आतंकवादी हमले के रूप में की गयी थी जिसके कामयाब हो जाते ही वे कारगिल जैसे कई और हमले समूचे भारत में अंजाम देते। इन आतंकवादियों (दहशतगर्दों) की मानसिकता का ऐसा सटीक चरित्र-चित्रण इस उपन्यास में बेमिसाल है जो कहीं, किसी और दुसरे माध्यम से, उपलब्ध भी नहीं है। इसलिए इस उपन्यास को अंग्रेजी शब्द के मुताबिक "यूनिक / एक्सक्लूसिव" कहा जा सकता है। और अपनी भाषा में "दुर्लभ!"

इस उपन्यास में एक ऐसे रेलवे ट्रैक की कल्पना की गयी है हो जो रेलवे लाइन के ज़रिये कोलकाता (इंडिया) को ढाका, मयांमार (कुवालालंपुर) होते सिंगापूर से जोडती है। इस ट्रैक पर एक बहुत ही फैंसी खूब सुविधा-संपन्न महँगी ट्रेन "कॉन्टिनेंटल एक्सप्रेस" चलती है। जो दहशतगर्दों का निशाना है। एक ख़ास विशेषता इस उपन्यास में यह है कि इसमें कोई भी किरदार फ़िल्मी हीरो की तरह नहीं है। ...बाकि इसमें पढ़ लेने का कष्ट करें।

 [उदयन जी और रिम्पी! अगर आपलोग इस पोस्ट को पढ़ रहे हैं तो आपके लिए एक मनोरंजक सूचना है: इस उपयास "दहशतगर्दी" में आपके शहर 'कुल्टी' का जिक्र है। इस उपन्यास में जिक्र है (काल्पनिक कथ्य को बल देने के लिए) कि कुल्टी में एक लास-वेगास स्टाइल कैसिनो है! जहाँ एक "हाई -वोल्टेज" सस्पेंसिव-ड्रामा, एक्शन-पैक्ड फाइट होता है। इस कैसिनो से आगे अमेरिकन कांस्युलेट का एक बंगला भी दर्शाया गया है। रिम्पी तो मेरी उपन्यासों की लाइब्रेरी में से कई बार, कई किताबें इन लेखक महोदय की लिखी पढ़ चुकी है। पर इसे नहीं पढ़ा। रिम्पी ने शायद "कोई गवाह नहीं" भी पढ़ा है, और उसने लेखक महोदय के लेखन की तारीफ़ भी की थी ' ...बाप रे ...! मामा! ...सस्पेंस बर्दाश्त नहीं हो रहा है, ...कहीं-कहीं खूब डर लग रहा है ...!!']

'दहशतगर्दी' जैसा कथानक फिर पढने को नहीं मिला। लेखक महोदय ने खुद ये घोषणा कर रखी है कि वे करंट-अफेयर्स, ऐस्पियोनेज जैसी विषयों से परहेज करते हैं। वे रहस्य कथा, जिसे वो अपनी जुबान में "हूडनइट्स" कहते हैं, लिखने में ही सहज फील करते हैं।

मेरे इन प्रिय लेखक महोदय को ईश्वर ने भविष्य में झाँक लेने की ऐसी दिव्य दृष्टी दी है, जिसे अपनी महानता के कारण भले वो इनकार करें, कि उनके लिखे पूर्ववर्ती उपन्यासों जैसी-ही कुछ दुर्घटनाएं आजकल घटित हो रही है। दिवंगत 'दामिनी' की घटना ऐन उनके लिखे उपन्यास (20-22 साल पुराने) "जहाज का पंछी" की याद दिलाते है। यह कथानक लम्बी (3-भागों में) है। जिसका नायक ऐसा है जो आज आम आदमी की कल्पनाओं में जी रहा है, ताकि वो हक़ीक़तन प्रकट होकर बालात्कारियों को उनके किये ज़ुल्म की सजा दे सके, खोखले सरकारी तरीके से अलग मजलूम को चैन दिलाने वाले तरीके से सजा दे सके, जिससे मजबूर और कमज़ोर मजलूम को इस ताक़त का अहसास हो सके कि वे इस नायक की मौजूदगी के जेरेसाया सुरक्षित हैं! कई लोग ऐसी फरमाइश कर चुके हैं कि इस विषय को फिर कथानक का मुद्दा बनाया जाय। इस नायक "विमल" की एक सीरिज़ है जो अब तक (लेखक महोदय के 50-साल के लम्बे अदभुद लेखन काल में) कुल 41-उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। इस नायक का पहला उपन्यास 'मौत का खेल' 1971 में (कीमत 2/-रुपये में) प्रकाशित हुआ था। इनके लेखन में चार भाषाओं का मनोरंजक सम्मिश्रण होता है, जिन पर इनकी खूब पकड़ है- 'हिंदी, पंजाबी, उर्दू और अंग्रेजी। मुझे यकीन है कि रहस्य कथा के प्रेमी जो इन पंक्तियों को पढ़ रहे है लेखक महोदय को सहज ही पहचान चुके हैं। वैसे हम रहस्य कथा के प्रेमियों को रहस्य को रहस्य रखना बाखूबी आता है। पर यहाँ लेखक महोदय का नाम लेना कोई रहस्योद्घाटन नहीं करता।

जी हाँ! यकीनन मैं हरदिल अज़ीज़ श्री सुरेन्द्रमोहन पाठक की बात कर रहा हूँ। जिनके लेखन का मैं वैसा ही दीवाना हूँ जैसे अमित जी, धरम पा जी और दिलीप साहब का।

"दहशतगर्दी" के यहाँ जिक्र की वजह है। पाठक सर का 2012 दिसंबर में प्रकाशित नया उपन्यास "सीक्रेट एजेंट"! इस उपन्यास के नाम से ही मुझे रोमांच हो रहा है,.....क्या ये दहशतगर्दी जैसी इंटरनेशनल ज़मीनों को जोड़ने वाली कहानी है!?...........क्या ये "Espionage" है, किसी Spy की कथा करेगी!?...........लेकिन पाठक सर के आजतक के लेखन इतिहास को याद करता हूँ तो ये शंका होती है कि 'टॉप-सीक्रेट' नाम के उपन्यास ने भी यूँ ही मुझे सताया था, जो सुनील सीरिज़ का था। काफी मनोरंजक होने के बावजूद  कथानक Espionage कतई नहीं था। पाठक सर की जुबानी "हूडनइट्स" था। इसी उपन्यास में सुनील को अपनी फेमस मोटरसाइकल  20-हॉर्स पॉवर की "एम.वी.अगास्टा-अमेरिका" सेठ उत्तम्चंदानी से हासिल हुआ था, जिसके बारे में सुनील का सदा शराबी पंजाबी यार रमाकांत (मीना मर्डर केस में) खूब तारीफ़ किया करता था जिसकी उस समय (1975-1080) में 80,000/रू कीमत थी।

आज मैं अन्य दिनों की अपेक्षा ज्यादा बेचैन हूँ। पाठक सर का नया उपन्यास थ्रिलर "सीक्रेट एजेंट" राँची में परसों ही खरीद लिया गया है, जिसे आज धीरू लेकर आने वाला है। बदमाश कल से ही कल-कल-कल कर रहा है, फोन रिंग हो रहा है पर उठाता नहीं। रिम्पी सहज ही मेरी बेचैनी का अंदाजा लगा सकती है। लो जी फोन लगा :- '_उं!.......हाँ!. हलो! .......आएँ!.....आज साढे आठ बजे?....साँझे के !!......शाम में!!?'......अच्छाह!

.7:18PM अभी-अभी घर आने पर पता चला कि धीरुवा अब कल-बिहाने आवेग। क्यों? ट्रेन छुट गई!
'..........दुर्र फिटे मूं !"


_श्रीकांत .