Tuesday, January 1, 2013

सूरज और प्रहरी

निम्नलिखित पक्तियों में मैंने अपनी कल्पना से एक छोटी-सी कथा कही है, इसका उद्देश्य किसी भी दृष्टि से स्वार्थसिद्धि नहीं है।  मेरी इस कथा के नायक हैं एक काल्पनिक किरदार, जिनका निश्चय ही कहीं-न-कहीं वजूद है। 
तो दोस्तों, कथा कुछ यूँ है..................
.....................सांझ ढले सूरज भाई ! चाँद भाई ! सितारे लोग ! हवा भाई ! आग भाई ! पानी भाई ! धरती माई ! आकाश भाई ! इन्दर भाई ! ब्रम्हा दादा ! विष्णु भईया ! ठाकुर यमराज सिंह जी ! चित्रगुप्त सिन्हा ! नारदनगदन जी ! एंड अबभ आल शंकर बाबा !  ...इत्यादि एक जगह पीपर नीचे बईठ के थके हारे-से आपस बतिया रहे थे।
...
सूरज भाई :" वे...! कितनी बदबू है! छे:! माइयवि धूल-धुवां के मारे सांस तक लेना मुहाल है। भई ! हम घिनरते-घिनरते बहुत थक गए हैं। हम तो कल नई उगेंगे!"

चाँद भाई :" हाँ यार! रात में तो और बूरा हाल है, तुम तो शाम होते ठेके पर मस्ती के लिए निकल लेते हो, मुसीबत मेरे गले पड़ जाती है। कल रात तो बड़ी भयानक गुजरी। बहुत ज़ुल्म हुआ। मैं तो ऐसी स्तिथि में घर से नहीं निकलने वाला, ठण्ड में कौन रात भर जागे कि 'जम' ही जाय!"

सितारे लोग समवेत स्वर में :" जी। सर जी, एकदम्मे ठीक बोलते हैं! धरती बहन के तरफ झांकते डर लगता है। अचानक-अचानक इनके यहाँ के बासिन्दे हम सबके ऊपर कूद पड़ने लगे हैं। हम तो कहे देते हैं धरती बहन! रोको अपने निवासियों को वर्ना परिणाम अच्छा नहीं होगा!" "चाँद सर के उपरे कई बार ये लोग अटैक कर चुके हैं। न मानें तो हम हड़ताल कर देंगे!"

ब्रम्हा दादा :" एइ ! हल्ला मत करा ! ध्यान टूटा हई!"

धरती माई (सिसकते हुए ) :" तो अपने कहल जाय! हम का करीं? अपने सभे के तो पतों न होई कि हम कइसन-कइसन अत्याचार सहत बानी" "का करीं ? आपन देह पर के लइकन के देह पर से झिटिक दीहीं ?" "हम महतारी हईं, निरदई ना। हमार जे करम बा हम पुराइब। भले चाहे इन्दर भाई हमरा उपरे बजर पटक देस।"

विष्णु भईया :" ठीक है - ठीक है, धरती बहन तुम शांत रहो, मैं इस मामले में शंकर बाबा से चर्चा करके कोई समाधान निकालूँगा। आप क्या कहते हैं शंकर बाबा?"

नारदनगदन जी ने खडताल बजाया और दुक्की लगाईं :"नारायण ! नारायण !!"

शंकर बाबा ने मेहनत से आँखें खोलीं और उनीन्दे से लड़खड़ाते स्वर में बोले :"होऊँ!!! की कहलियई? "...धरती बहिन के कोई दिक्कत हई? ...दुर्र! त ये में सोचे के का हई! कहन न! सबके तुरते उलट-पलट पटक के रख दियाई?"

ब्रम्हा दादा झल्लाए  :"धेत्त तेरे कि ! एह शंकर बाबा! तनी शांत रहन न! कहालियाई न ध्यान टूटा हई!"

ठाकुर यमराज सिंह जी :" ओए चीन्द्रंगुप्ताँ ! की बयस्स होईं रल्लीं एँ? नाँ-पता लिक्ख रक्ख पिच्छे वेखाँगा! मेरी भैंस नु जुलाब हो रई ये।"

चित्रगुप्त सिन्हा :"हूकम। यहाँ तो मरने-मारने की भारी धक्कमपेल मची है!!! एक-एक का नाम लिखने में ब्रम्हा दादा के अनेक कल्प बीत जायेंगे! आपको सिर्फ रजिस्टर्ड प्राण खींचना ही पसंद है तो ये काम खुद ही कर लीजिये वैसे भी लाख अनुग्रह के बावजूद आपने अभी तक मुझे लैपटॉप ले कर नहीं दिया, कलम-स्याही मिलती भी तो नहीं, वैसे भी मेरी उंगलियाँ दुख रहीं हैं, एक छुट्टी की एप्लीकेशन लिखी है, वो वर्षों से आपके टेबल पर धूल फांक रही है, जिसका आपने अबतक कोई संज्ञान नहीं लिया, इन मुर्दों की क्या सोचेंगे! ... म म मैं भी अभी छुट्टी चाहूँगा। आखिर न्यू इयर ईव है जी!"

ठाकुर यमराज सिंह जी :"खुर्र्रर्र्र्रर्र्र .........!!."

सूरज भाई (आवेश में)  विष्णु भाई से :" आप बुरा मत मानियेगा सर जी! कुछ भी कहिये, कल तो हम नहिएँ उगेंगे।"

विष्णु भईया ने असहाय भाव से गर्दन हिलाई। पर बोले कुछ नहीं। फिर रहस्यमय दंग से मुसकुराय जैसे कोई युक्ति सूझी हो। पर फिलहाल चुप रहना ही बेहतर समझा।

हवा भाई ने फुसफुसा कर पानी भाई से कहा :" इयार सुरजवा के बात ठीक हैय। इसका हम समर्थन करते हयं। हमारा भी यही बिचार हैय। वइसे भी हमको कल फुर्सत नई हैय। कल सुराजवा के चक्कर में हमर बेटा के ठुड्डी पर इन्दरवा बजर मार दिया था। हमको ब्रम्हा दादा से शिकायत भी करना हैय और उसका इलाज भी करवाना हैय। कल हम भी नहीं बहेंगे।"

इन्दर भाई ये सुनकर भड़के :" अजी ए ! हवा भाई! ई भी तो सोचिये कि आपका छोकरा बन्दर की तरह उधम मचा रहा था, यकीन न हो तो सूरज भाई से पूछ लीजिये कि कल उसके वजह से सूरज भाई और यहाँ मौजूद सभी लोगों को केतना तकलीफ हुवा था। ऐसे में जो मेरा फ़र्ज़ था सो मैंने निभाया। रही बात उसके चोट कि तो वो ठीक हो जायेगा। मैं गारंटी करता हूँ। क्यों ब्रम्हा दादा! का बोलते हैं?"

ब्रम्हा दादा फिर भड़क गए :" दुर्र रेह !! अरे तोहीन हमरा ध्यान करे देबा कि नई?" "चुप्प, चुप्प !" "इतना-इतना राछस सब से मेंटलथिरेपी से बतियावै थियइए! सभन के बरदान में लम्पटई और अधर्म करे के ताकत देइवे ला हई जे से जुलुम और पाप ढेर बढ़े ताकि ओखनी के बिनास करे खाती बिसनु भाई के फेन्न-से भेस धरे पड़े, अरे भीळेण नईण रहतई त इनकर हीरो के अवतार के पुछ्तई!?" " भीळेण बिना हीरो काऊंन काम के?" "अब चुप्प! सब कल्ह देखल जयितई!"

पानी भाई फुसफुसाते हुए हवा भाई से  :"बॉस! अपुन का भी अगाडी-पीछाड़ी दून्नों तरफ बड़ी दरद है। लगता है आर्कटिक और अंटार्कटिक दून्नों पिघल जायेगा। कल गंगा बहन मिली थी वो भी शिकायत कर रही थी, उसे जमुना बहन ने भी अपना दुखड़ा सुनाया था। गन्दगी और दुर्गन्ध से दोनों त्राहि-त्राहि कर रहीं थीं। दोनों तो कुछ दिन के लिए टेम्स में जा कर नहाने की सोच रही हैं।

आग भाई बगल में ही बैठे थे वे भी दुखित थे :"हान जी। सई बात अय। धरती बहन दे बासिंदों ने अब तक मुजको इतनी घी पिला दी अय कि पेट बिगड़ गया अय। जिसके वजह से मेरा रिंग टोन सिस्टम भी बिगड़ गया अय। मुझे भी आराम की ज़रुरत अय। कल मैं भी न जलूँगा।

अचानक आकाश भाई की गंभीर वाणी सुनाई दी :"प्रिय बन्धुवों मेरी परेशानी के बारे में किसे पता नहीं!? सोचता हूँ मैं भी अपनी चादर कुछ वक़्त के लिए समेत ही लूं!"

सूरज भाई ने फिर अपनी जिद्द दुहराई :"इस बात को गाँठ बाँध लीजिये सर जी, कल सचमुच मैं नहीं उगूंगा, बस!"

विष्णु भाई मुस्कुरा कर सूरज भाई से बोले :"मेरी एक शर्त है यदि आप मेरी इस शर्त को जीत कर दिखा दें तो यहाँ विराजमान सभी को अपनी-अपनी मनमानी करने की पूरी छूट होगी, अन्यथा कोई भी अपने-अपने कर्म की मर्यादा को तोड़ने की बात आइंदे फिर कभी भी नहीं करेगा।"

विष्णु भाई की बात पर समवेत स्वर में पूरी श्रद्धा से बात मंज़ूर हो गई, तब सबने विष्णु भाई से उनकी शर्त पूछी तो विष्णु भाई ने अपने इशारे से धरती माई की ओर संकेत कर कहा :"धरती बहन पर के उस स्थान को देखिये वहाँ एक व्यक्ति हथियार लेकर काफी देर से अडिग खड़ा है, आप उसे घर जाने को कहें, वैसे भी ये सबके घर लौटने का वक़्त है, यदि वो चला गया तो आप अपनी मनमानी करने के लिए आज़ाद होंगे। और इस कार्य को सूरज भाई आप करेंगे क्योंकि अपने काम से थक कर यह विवाद आपही ने छेड़ा है। बोलिए मंज़ूर है?"

सूरज भाई ताप से तमतमाते ताव में गरजे :"जी हाँ ! मंज़ूर है!" और सूरज भाई इस बाज़ी को जीतने निकल पड़े। उस व्यक्ति तक आते-आते, उनके जाने का वक़्त हो गया, हडबडाय से तेजी से आगे बढे तो अचानक 'वक्तेकालुकाल भाई' ने उन्हें ऊँगली की :"सूरज भाई ! नहीं! आप मेरी मर्यादा भंग नहीं कर सकते, वैसे भी अभी तक आपने शर्त नहीं जीती है, तब तक संयम में रहिये।" दांत किटकिटाते सूरज भाई अपनी निर्धारित गति से आगे बढे। उन्हें खूब कष्ट हुआ। आखिरकार वे उस व्यक्ति तक पहुंचे और हांफने लगे। गहरी सांस लेकर उन्होंने वहां के वातावरण का अवलोकन किया। देखा .......

...................छुट्टियों, त्योहारों और नव वर्ष के आगमन का सुहाना मौसम था। सांझ ढले दिनभर की थकान, और धूल-मिटटी और बदबू से भरे माहौल में कड़ी मेहनत से चिडचिडाये हुए सूरज भाई भुनभुनाते रहे, तभी उन्होंने उस व्यक्ति को देखा, जो रोज की भाँती आज भी जहां-का-तहां खड़ा था। वह वर्दी पहने हुए था। उसके कंधे पर बन्दूक लटकी हुई थी। वह (सतर्क और सावधान खड़ा होने के बजाय) निश्चिन्त, निर्भीक और बेबाक खड़ा था। उसके चेहरे पर कोई भी उत्कंठा के भाव के बदले उसका मुखमंडल वीरता के संतोषपूर्ण तेज़ से खिला हुआ था और उसकी ओजस्वी आँखे अपने चारों तरफ के वातावरण का पूरा अवलोकन कर रहीं थीं। सभी ऑफिस, स्कूल-कॉलेज और सभी कार्यालयों के लोग अपने-अपने घरों को लौटते हुए आगामी नए साल के स्वागत और जश्न की बातें करते हँसते-खिलखिलाते जाते थे, पर उनकी दृष्टि में वह जैसे अदृश्य-सा था। कोई उसकी तरफ ध्यान न देता था। पर वह सबको देख रहा था। अपनी इस उपेक्षा की उसे कोई परवाह प्रतीत नहीं होती थी। इसके बावजूद उसका यह प्रसन्नचित व्यवहार देखकर सूरज भाई से रहा न गया। आखीर उन्हें इसी व्यक्ति को डिगा कर तो शर्त जीतनी थी; उन्होंने उस व्यक्ति से पूछा - ' क्यों भाई! तुम्हें घर नहीं जाना? दिनभर इस चिलचिलाती धुप में जलते रहे, कभी भूखे तो कभी प्यासे रहे, धूल-धुवां-बदबू और शोर ने तुम्हे जरा भी विचलित नहीं किया? रात की ठिठुरती ठण्ड भी झेलते हो, बरसात में भी तुम्हारी यही पोजीशन रहती है! घर जाओ भाई। रोज सुबह से तुम्हें देख रहा हूँ, जो अड़े खड़े हो कि खड़े ही हो!! किसी की तुम्हारी परवाह नहीं। पर लगता है तुम्हे सबकी बराबर परवाह है। आखिर तुम हो कौन? और ये सब क्यूँ बर्दाश्त किये अचल खड़े हो? सबके घर चले जाने का वक़्त हो गया है, सभी लौट रहे हैं, फिर तुम अपने घर क्यों नहीं लौट जाते? छुट्टियों और त्योहारों का समय है नए साल के ज़श्न का वक़्त है ,क्या तुम्हें मौज नहीं मनाना? न जाने कब से तुम्हें इसी दशा मैं रोज देखता चला आ रहा हूँ। और तुम यह हथियार क्यों लिए हुए हो? और ये तुमने कैसे कपड़े पहने हुए हैं!? यार, तुमसे पूछे बिना रहा न गया, जल्दी मुझे बताओ और अपने घर जाओ, क्योंकि मैं रुकने वाला तो नहीं हूँ, क्योंकि मुझे कल सुबह ही फिर वापस लौट कर आना हैं।  बताओ भाई और घर जाओ।

उस व्यक्ति ने हंसकर उत्तर दिया - "ये जो तुम रोज देखते चले आ रहे हो, ये मेरा कर्म है। यही मेरा धर्म है। मुझ पर धूल-धुवां-मिटटी-बदबू-शोर-ताप-धूप-गर्मी-सर्दी-वर्षा-आंधी-तूफ़ान-आपदा-विपदा और आक्रमण को झेलने की जिम्मेवारी है जिसकी मुझे ऐसी आदत पड़ गई है, ऐसा अभ्यास हो चुका है कि ये बाधाएं मैं सहजता से झेल लेता हूँ। जहां मैं खड़ा हूँ यह मेरे घर का द्वार है, ये जो इतने हँसते-गाते, खुशियाँ मनाते जन-समूह को देख रहे हो यही मेरा शरीर और इसके अंग हैं, जिनकी हिफाज़त और रक्षा मुझे करनी है अत: मैं यहाँ डटा खड़ा हूँ। मेरे जैसे और कई हैं, उनकी भी यही कहानी है। मैं जाऊँगा तो मेरी जगह उनमे से कोई यहाँ आ डाटेगा, क्योंकि यह हमारा शरीर है, एक जाएगा तो दूसरा आ जाएगा पर यह स्थान कभी एक क्षण के लिए भी खाली नहीं रहेगा, अभी मेरे जाने का वक़्त नहीं हुआ है अत: मैं यहाँ खड़ा हूँ। कोई मेरा भाई जब तक मेरी जगह पर आ कर मुझे सहजता से जाने को नहीं कहता और मेरी जगह पर उसी ज़ज्बे के साथ खड़ा नहीं हो जाता, मैं यहाँ से कभी नहीं जाता। मेरा कोई ख़ास धर्म नहीं! मेरी कोई ख़ास ज़ात नहीं। मेरी कोई ख़ास पहचान नहीं। मेरा कर्तव्य ही मेरा धर्म है। मेरा कर्म ही मेरी जात-गोत्र और मेरा परिचय है। हमें छुटियों, त्योहारों की उतनी ही कद्र और ज़रुरत है जितनी कि तुम्हे इस जन-समुद्र में दीख रहा है। हम हर त्यौहार मनाते हैं। हम सबको गले लगते हैं। हम नाचते और गाते हैं। हमारा हर दिन एक त्यौहार है। हर दिन एक मेला है। हम सबकी रक्षा करते हैं। हम सब की सुरक्षा करते हैं। मैं इस शरीर का अंगरक्षक हूँ। मुझे अपने कर्तव्य कर्म का पूरा भान है। मेरा घर मेरी माँ है। मेरा घर मेरी आन-बान और शान है। मैं यहीं डटा रहूंगा, ध्यान दो, यह शस्त्र तुम यहाँ सिर्फ मेरे कंधे पर देख रहे हो, क्योंकि यह सबको नहीं मिलता। यह बन्दूक मेरे पास मेरा शस्त्र है, क्योंकि मुझमे अपने देश के लिए मर मिटने का ज़ज्बा है, अत: मैं इसका उपयोग और इसके प्रभाव और इसके परिणामों को जानता हूँ, यह मेरे देश की सुरक्षा के लिए उठता है, ये जो जन-समुद्र तुम हँसते-खेलते देख रहे हो यह उनकी खुशियों की और उनकी सुरक्षा के लिए उठता है। अभी मैं यहीं डटा रहूँगा क्योंकि अभी मेरे जाने का वक़्त नहीं हुआ है। देख रहे हो उनकी हाथों में जलती हुईं मोमबत्तियों की कतार! इन मोमबत्तियों के लौ की ज्योत 'दामिनी' की प्रज्वलित ज्वाला है, जिसकी किरणों ने उम्मीद और आशाओं को और ज़ुल्म की पुरजोर मुखालफत को कायम रखा है, मुझे इस ज्योत को हमेशा प्रज्वलित किये रखने की जिम्मेवारी है, ये तुम और तुम्हारे साथी नहीं कर सकते, इसीलिए मैं यहीं डटा खड़ा रहूँगा। मेरा घर मेरा देश है। मेरे कपड़े मेरे शरीर का परिधान, मेरी पहचान और मेरा गौरव हैं। मैं इस देश का प्रहरी हूँ। क्योंकि मुझे सदा विजयी रहना है, इसलिए मुझे यहीं डटे खड़ा रहना है, मुझे कोई गिला नहीं बल्कि ख़ुशी है कि जहां मक्कार अधर्मी, अत्याचारी, अपराधी और इस देश के दुश्मन रजाइयों में दुबककर परिवर्तन के चिंतन का ढोंग कर रहे हैं, वहीं इस जगह पर मेरी ज़रुरत है, मैं इसलिए भी यहाँ खड़ा रहूँगा क्योंकि मुझे इनसे लड़ने-भिड़ने और जीतने की आदत पड़ गई है। तुम जाओ क्योंकि कल तुम्हे फिर लौट कर आना है। मेरी तरफ से तुम्हें नव वर्ष की हार्दिक शुभ कामनाएँ!"

सूरज भौंचक्का-सा मुँह बाए प्रहरी को एकटक देखता रहा फिर चेत कर पूछा -" तुम्हारा नाम क्या है भाई?"

हंस कर "प्रहरी" ने कहा - 'मेरा कोई नाम नहीं, मेरा और मेरे जैसे अन्य साथियों का बस एक ही नाम है -"प्रहरी!"'

"...! ..यह तुम्हारी जेब में कैसी किताब है? क्या तुम्हारा धर्मग्रन्थ है? - सूरज ने उत्सुकता से पूछा।

प्रहरी हंसा - "हा: हा: हा: ! नहीं, उपन्यास है।"

"वो क्या होता है?"

"मनोरंजन।"

"ओह! माने, ...सड़कछाप किताब! यानी कि कोई ज्ञान-ध्यान की बातें नहीं, कोई शिक्षाप्रद बात नहीं? ...जैसे फिल्मों में आइटम सौंग! आयं?"

"क्यों नहीं?"

"भ्रष्ट और अशलील, होगा!?"

"हो सकता है, पर ''दौलत-शोहरत-औरत'' की लालसा में लिप्त कलुषित समाज को आइना दिखाने के लिए, ठीक उसी तरह जैसे रावण, कंस, और दुर्योधन जैसों के कुकृत्य को दर्शाना पड़ता ही है। वैसे नकारात्मक राहत भी कम सुकूनदेह नहीं है। कुछ शिक्षाप्रद संवाद भी होते हैं।"

"ऐसी पटरी पर, फूटपाथ पर बिकने वाली चीजों को विद्वजन तो छूते भी न होंगे!"

"संभव है। पर यह भी सुनलो कि उन्हीं तुम्हारे विद्वजनों की ग्रंथों को, जिन्हें पता नहीं खुद उन्होंने उस पर पड़ी धूल-मिटटी को कितने दिनों से उन्होंने झाड़ा भी न होगा। अरे विद्वजनों की छोडो,...उन्हें तो पटरी वाले भी नहीं पूछते।"

"वैसे क्या मिलता है इससे और सीखा क्या तुमने इससे?"

" गरीबों को, जो इसे लेकर इसका रसास्वादन करने वालों के लिए इसकी दूकान लगते हैं उन्हें रोज़गार! सीखने को भाईचारा-दोस्ती-सब्र-हिम्मत-ताकत-एकता-निष्ठा-तत्परता-नैतिकता-एकाग्रता-वीरता-सटीकता-आदमीयत-क्षमा-दया-त्याग-बलिदान-क़ुरबानी-मेहनत-लगन-प्यार-मोहब्बत-भाषानुवाद-बुद्धिमता-शान्ति-सद्भावना-समर्पण-सहयोग-समझदारी-हाज़िरजबाबी-हंसी-मज़ाक-सलीका-चंचलता-निश्छलता-चपलता-सतर्कता-सदाचार-ख़ुशी-ईमानदारी-शक्ति-प्रबलता-भक्ति-देशभक्ति-व्यावहारिकता-सेवा-सामाजिकता-आत्मसम्मान-और ...ख़ास करके याराँ नाल बहाराँ मेले मित्तरां दे !"... _ और दुश्मन को मुंहतोड़ जबाब देना।

हैरानी से सूरज भाई ने पूछा -"जैसे?" "कुछ बहादुरी की ही बतलाओ।"

प्रहरी ने जबाब दिया - "कुछ न कहने से भी छिन जाता है ऐजाज़े सुखन। ज़ुल्म सहने से भी ज़ालिम की मदद होती है।।", ''...भय काहू को देत नहि। नहि भै मानत आनि।'', ''....सिर दीने सिर रहत है, सिर राखे सिर जाए।'', ''...देहु शिवा वर मोहि ईहै शुभ कर्मन तें कबहूँ न टरौं, न डरों अरिसो जब जाई लरौं निसिचै करि अपनी जीत करौं। जब आऊ की अउध निदान बनै अथि ही रण में तब जूझि मरौं!!'',...''

"रुको-रुको-रुको!" हकबकाय सूरज भाई ने टोका - 'य ..यह तो धर्मग्रन्थ की बातें हैं! फिर ये पटरी पर क्यूँ बिकतीं हैं।"

"क्योंकि श्रीमान, पुस्तकालय तो अजायबघर-म्यूजियम बन कर रह गए हैं, अब तो अक्सर उनके बंद द्वार ही दीखते हैं। अत: इसके कद्रदान मंत्री-संत्री-अभिनेता-खिलाडी-डॉक्टर-वकील-सिपाही-चपरासी-रिक्शेवाले-ठेलेवाले-जमादार-पंडित-मुल्ला-पादरी-आम आदमी-ख़ास आदमी-और मेरे जैसे अनेक प्रहरी सभी पटरी पर ही आते हैं।"

"ये नाकद्री!!??"...(सूरज भाई : मन-हीं-मन : अजीब बिडम्बना है!) ''....क ..कौन हैं इसके रचयिता, इसके लेखक?"

प्रहरी ने सीना तान कर कहा - "मेरी ही तरह एक 'पाठक!'"

"ये किस विषय पर अपनी रचना लिखते हैं?"

"यथार्थ के विषय में।"

"संतों की तरह बोल रहे हो। तुम्हारे हाथ में अभी जो पुस्तक है उसका नायक कौन है, क्या कोई संत?"

"जी नहीं।"

"तो?"

"एक हत्यारा!"

सूरज भाई सन्न रह गए!-"मुझे दोगे/"

"खेद है, किन्तु नहीं। क्योंकि आपके हाथ लगते ही ये झुलस जाएगा। इसके लिए आपको इंसान बनकर इसी फूटपाथ और पटरी पर आना पड़ेगा।"

'.............................!" '...अच्छा:! चलता हूँ। हैप्पी न्यू इयर।"

"अच्छा!! उसपार इंग्लैण्ड पहुँचने से पहले ही तुम्हारे दिमाग पर भी इंग्लिश की पॉलिश फिर गई! हा: हा: हा:, थैंक्स, सेम टू यू !" 

'-----------------!'
 और इस तरह हारकर सूरज भाई अपनी राह चले गए इस संकल्प के साथ कि -'ड्यूटी में कोताही नहीं। विष्णु भाई फिर जीत गए!!!"

आकाश भाई ने हंस कर गंभीर नाद किया :
"नाना भाँती राम अवतारा।
रामायण स़त कोटि अपारा।।"
 

 प्रहरी प्रसन्नतापूर्वक, दृढ़ता से डटा रहा।

[लेखक की कलम अनवरत अपने पात्र की रचना में चलती ही रही..., चलती ही रही... ]

--इति--

 नए साल के आने का वक़्त हो चूका है। सभी को नव वर्ष 2013 की हार्दिक शुभकामनाएं!

_श्रीकांत .     


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