Thursday, July 18, 2013

बाबूजी ये आप हैं!

"हज़ारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पर रोती थी,
तब कहीं होता है, चमन में कोई दीदावर पैदा!!"
प्रियवर बाबूजी ये आप हैं!
सादर प्रणाम!
आपका बेटा,
_श्रीकांत .

Sunday, July 14, 2013

देव आनंद ने मुझसे कहा कि कोई कहीं नहीं गया! सब साथ साथ यहीं हैं!

दुर्भिक्ष - भाग-७ ख़त्म होने तक मैं बहुत रो चूका, ...तब आखिर में जब इसके विश्राम तक और आठवें भाग के बीच तक पहुंचा! तब उत्सव मनाने को जी चाहने लगा। हम जैसे लोगों ने जिस जुग में जनम लिया और जिस परिवेष में पले-बढे, उसकी हर सांस में सिर्फ प्यारी-प्यारी फिल्मों और घनिष्ठ मित्र की तरह सभी फिल्म कलाकारों का वास है! उन्हें हम अपना मानते हैं; सगा जानते हैं! इसलिय हम बचपन में जब भी खुशियाँ मनानी होतीं तो उस योजना में फिल्म देखना जरूर शामिल होता था! फिल्म के बगैर कोई सैर कोई पिकनिक पूरी नहीं होती थी! मात्र यही एक साधन था जो हमें सच में ख़ुशी देता था! कोई भी ख़ुशी ..चलो फिल्म देखने! हर बात को हम घुमा फिराकर फिल्मों तक ही ले आने के आदि चुके थे! इन्हीं सभी कलाकारों की फिल्मों देखते हम बड़े हुये!
और आज ...मुझे फ़िल्में देखे लगभग २ महीने से ज्यादा हो चुके हैं! इस बीच और कई नयी पुरानी फ़िल्में जमा हो गयीं! जिन्हें बस खरीद कर रखा ही था कि कई बार घर से बाहर जाना पडा! अब तो काफी दिन हो चुके हैं! देव आनंद से डर लगने लगा था कि उन्हें देखते ही मैं खुद को नहीं संभाल पाऊंगा! राजेश खन्ना की याद आते ही फिल्मों की सोच भी दहलाती थी! कल रात जी कडाकर के मैंने देव आनंद की फिल्म "तीन देवियाँ" निकाली, और उसे चलाया! तब VCD को जिस तरह राइट किया गया है, उसके मुताबिक़ एक बैनर की तरह जब उनकी एक इसी फिल्म की स्टिल फोटो दिखी! फट से डूबते दिल को न जाने कैसे राहत सी मिली! थोड़ी हिम्मत बढी। फिल्म शुरू हुई और अमीन सयानी की आवाज़ सुनते ही जैसे शरीर में फिर से सजीवनी दौड़ पड़ी;  _पात्र परिचय होने लगा तब तीनों देवियों का परिचय कराने बाद उस नौजवान की उपस्थिति हुई; और अमीन सयानी की आवाज़ ने पूछा "..और इन्हें तो आप पहचानते ही होंगे? सिर पर काली टोपी पहने और काले कपडे में वह नौजवान मेरी ओर पलटता है और उनकी मशहूर; ''दंतपंक्तियों से खिली मुस्कान को देखते ही सभी अवसाद दूर हो गया! मन खिला दिल झूमा शरीर स्वस्थ हो गया!
कोताही और कमजोरी मेरी थी! मैंने ही उन्हें भूलने की गुस्ताखी की थी, और नाहक ही निराश और हताश हुआ पडा था!
देव आनंद कहीं नहीं गए! वे हमेशा की तरह 'बिन बदले' मेरे साथ ही मेरे घर में रहते हैं!
इस फिल्म के अंत में मैं बचपन का वही लड़का हूँ, जो फ़िल्में देख ताली और सीटी बजाते हँसता रहता था! (हालांकि मेरी सीटी बढियां नहीं बजती)
और देव आनंद ने मुझसे कहा कि कोई कहीं नहीं गया! सब साथ साथ यहीं हैं!
मेरे पास! सिर हिलाकर मुस्कुराते और हँसते हुये!