Thursday, January 31, 2013

कुत्ता

बचपन में बाबूजी मुझे गणितीय जोड़-घटाव सिखाते-पढ़ाते थे तब मैं कभी खेलते-खेलते उनके कार्यालय 'गद्दी' में उनके करीब जा बैठता था। गलती पर उन्होंने कभी कोई सख्ती नहीं की। एक-एक बात इतने प्यार-दुलार से सिखाते थे कि मैं सिर्फ प्यार ही सीख पाया। बाबूजी तब अक्सर रोजनामचे को मुझे देते और उसमे अंकित गणितीय अंकों को दुसरे कागज़ पर नक़ल उतार कर जोड़ लगा कर उत्तर देने को कहते। और अपने काम में व्यस्त हो जाते थे। हर पन्ने पर 30-35 लाइनें होतीं थीं। अंकों के तुरंत बगल में उन्हें बंद करती नीचे को मुड़ी हुई लकीर होती थी जो पेन की घसीट से अंकों से भी बाहर निकली होती थी, जिसके बाद सिर्फ दो अंक ही होते थे। मैंने जब पूछा कि ये क्या है तब उन्होंने बतलाया कि शुरू के अंकों को रूपए और घुमावदार लकीर के बाद के अंक पैसे होते हैं। मैंने उस लकीर को और जानना चाहा तो उन्होंने कहा-'ई सिफड़ कहा ला!' मुझे उलझन में देखकर उन्होंने लकीर को एक बिंदु में बदल दिया। मैंने फिर पूछा तो बिना झल्लाय वे बोले -'ई -दशमलव- कहा ला!' तब मैं कुछ सहज हुआ। जब नक़ल उतार रहा था तो पाया कि अंकों के बगल में उनका विवरण दर्ज था। एकाध बार मैंने उन्हें पढ़ा, लिखा था-'कुक्कुर के दूध!' _ 'कुक्कुर के शिकार!' तब मेरी हैरत का कोई ठिकाना न रहा। मैंने बाबूजी को उनके काम के बीच झिंझोड़कर पूछा -'अहो, बाबूजी! ई कुतवा के दूध के पिये ला!? आऊ कुतवा के शिकार करे के जा ला!?' मेरी बात सुनकर बाबूजी के पास बैठे उनके सहकर्मी साथी ठठा कर हँसे! बाबूजी ने भी झेंपते, हँसते बतलाया कि -'अरे कुक्कुर-के ना! "कुक्कुर 'के-वास्ते!', "आऊ, कुक्कुर के शिकार कोई ना करे, ई "कुतवा 'के-वास्ते' 'मीट' ह!" ..आजकल ट्रेंड बदल गया है। कुत्ता या कुकुर बोलने लिखने की मनाही हो गई है। 'डॉग' लिखिए। डॉग बोलिए।

प्राइमरी स्कूल के दिनों में हमें घरेलु, पालतु जानवरों पर निबंध लिखने को कहा जाता था। अधिकांश छात्र, मैं भी, तब 'गाय' को ही अक्सर अपना निबन्ध-विषय बनाते थे। पर, जब 'मा-स्साब' का आदेश होता कि 'कुत्ता' पर एक लेख लिखो, तब हमारे मानस-पटल पर इस जानवर का अक्स उभर आता था। जो कि हमारे, अपने आस-पास सडकों पर आम विचरते पाये जाते हैं। फिर हम थोडा सोचते, थोडा याद करते निबंध लिखना शुरू कर देते थे। और जैसी परम्परागत लाइनें स्कूल में हमें सीखाई गई थी, सभी छात्र लिखते थे -"कुत्ता एक चौपाया जानवर होता है। कुत्ता एक पालतु जानवर होता है। इसके {चौपाया लिख चुकने के बाद भी} चार पैर, दो कान, दो आँख, एक मुँह और एक पोंछी होता है। कुत्ता बहुत ही उपयोगी जानवर होता है। कुत्ता बहुत वफादार जानवर होता है। कुत्ता घर की रखवाली करता है"..., आदि-इत्यादि। कॉपी जाँच के समय 'मा-स्साब' कान खींचते और अलंकृत भाषा में डांटते -'कुक्कुर कहीं का! एतना बड़ा हो गया!! 'कुत्ता' के बारे में नहीं जनता है!? हिंदी बिगाड़ता है? पूंछ को पोंछी लिखता है!? इस्कूल का नाम हंसावेगा?' 'मा-स्साब' को क्या पता, जैसे ही कुत्ते पर पेन रखा, वो भाग जाता है। वरना कॉपी पर क्यूँ लिखता! खुद पर ही लिख के न दे देता!

उस समय हमें नहीं बताया गया था, न पढ़ाया गया था कि कुत्तों की भी अलग-अलग जाति, प्रकार और नस्ल होते हैं। हमें सारे संसार में बस एक ही तरह के कुत्तों की मौजूदगी का आभास होता था। देहाती, सड़क छाप, शुद्ध देशी। [अंगेजों ने नाम दिया-'स्ट्रीट डॉग!]' पर हमें इसका ज्ञान नहीं कराया गया था। कुछ बड़े हुए तो 'अल्सेशन' शब्द से परिचय हुआ [जिसे इधर अभी भी 'ऐलसेसियन' बोलते हैं]। तब हमें यही समझाया गया अल्सेशन माने अंग्रेज या विदेशी कुत्ते। जिसे रखना, पालना, साथ-साथ -घूमना, खिलाना-पिलाना, उसे अपने बच्चे की तरह{भले चाहे आप अपनी जन्माये पुत्र-पुत्रितों का तिरस्कार और निरादर करते हों}अपने गोद में लेना, पुचकारना और साथ सुलाना, फैशन बन गया। स्टेटस सिम्बल बन गया। आप 'बड़े, महिमामंडित व्यक्तित्व के स्वामी' बन गए। ये 'कुत्ते' की महिमा है! जैसे 'मेड इन जापान' से आप अपने अंडरकस्टडी / अंडरपोजेशन हरेक आइटम से मुतासिर, सहमत और खुश, होते हैं, विदेशी मूल के कुत्तों से खुश होने लगे! जैसे फौरेनर विदेशी घड़ियाँ, मोबाइल, टैब्ज़, और आईपोड से कुछ 'ख़ास' होने की आपको सुखद अनुभूति होती है, ठीक वैसे ही विदेशी नस्ल के कुत्तों ने आपको सुखी कर दिया। शुद्ध देशी, सड़क वाले, "हाड़ी रे!...दुर्र हो!' के लायक हो गए! एक पत्थल उठाया और 'दे मार!' कुत्ता फिर भी आपको -"चा!-बस!! ..चा!-बस!!" की शाबाशी देता, भाग जाता है! फिर भी बेशर्म की तरह, ढीठ, जिद्दी देशभक्त की तरह, आस-पास ही इस प्रत्याशा में मंडराता रहता है, इस बात का भरोसा रहता है कि अल्सेशन भाई कुछ तो छोड़ेंगे, या क्या पता देशवासियों को ही देशी की फिर से कद्र हो जाए! पर न ये हुआ है, न होता है, भविष्य किसने देखा है! इसलिए आस बरकरार है।

कुत्ता किसके काम की 'चीज' नहीं? 1976 की फिल्म 'अदालत' की याद आती है, जिसमे अमित जी पूर्वोत्तर भारत (इलाहाबाद-से-पटना तक) के एक किसान, गृहस्थ हैं, जिनकी भाषा भोजपुरी है। घटनाक्रम जिन्हें शहर ले आती है, तब वे अपने जान-पहचान के रिश्तेदार के यहाँ वक्ती शरण के लिए जाते हैं। लेकिन घर की मालकिन छोटे घर का रोना रोती है कि एक हमारा कमरा, एक इनका, एक बेबी का एक पप्पी का,.अमित जी अचकचाय> "पप्पी!?" तो चाची बोलती है 'माई डार्लिंग डॉग!' वहीदा जी, जो इसमें अमित जी पत्नी हैं,-पति-अमित जी ('धर्मा") से पूछतीं हैं -'ए जी, ई 'डॉग' का हय?' अमित जी जबाब देते हैं -"अरे! कुकुर हो!"<<< इस सीन पर, इस संवाद पर, अमित जी के बोल और अंदाज़ पर, हॉल का तो मुझे याद नहीं पर बाबूजी जो हँसे, ..जो हँसे थे! वो ही हंसी अब भी छूटती है। फिल्म "क्रांति" में जब प्रेम चोपड़ा(शंभू) दिलीप साहब(सांगा) से कहते हैं कि 'महाराज की आज्ञा का पालन करना हमारा कर्तव्य है।' तब दिलीप साहब का जबाब आता है-'कर्तव्य का पालन करना कुत्ते से सीखो! कुत्ता तो अपने मालिक की रक्षा करता है, तुमने अपनी मातृभूमि का सौदा कर लिया।' कहने का मतलब प्रेम चोपड़ा का घमंड जहां 'पशुता' है, वहीं दिलीप साहब का जबाब पशु-प्रेम है। पशु-प्रेम की भी खूब कही-(श्रीकांत जी!)-, जहां लोग देश-विदेश में गाय को खाकर डकार नहीं लेते, कुत्ते की पिटाई पर बवाल मचा देते हैं! कुत्ता यहाँ भी काम आया, जो 'सब्जेक्ट' सुझा गया।

कुत्ता कितने काम आता है! बीवी से पिटकर भागे-आपसे -आपसे पिटकर, मार खाकर, 'आपकी' भड़ास निकालता है और आपको मर्द होने का अहसास कराता है। फिर भी आप ही के कदमों में लोटता है, सूंघता, चाटता आपसे लाड दर्शाता है। कुत्ते का अपने प्रेम प्रदर्शन की यह इंटरनेशनल प्रकृति; प्रव्रत्ति है। उसे ये भी याद नहीं रहता कि इसी ने मार था, 'क्यूँ न काटकर इसे मेडिकल केस बना दूं। लगे चौदह इंजेक्शन नाभि में! तब कुत्ते की ताक़त का पता चलेगा, कितने सुहाने दिन थे वो! सुसरे पास न आते थे। सत्यानाश हो इस नई ईजाद का जो वो चौदह इंजेक्शन अब हिस्ट्री बन गया!' कुत्ते को बारम्बार भगाइये वो लौट कर फिर आ ही जाएगा, ये उसकी वफादारी का मज़बूत और चट्टानी सुबूत बन गया। उसकी भूख ने, जो कभी नहीं मिटती, उसे 'कुत्ता' की संज्ञा दिलाया। भर पेट खाने के बाद भी जब आपको खाते देखेगा, आपकी मुँह निहारेगा। और आप गरियायेंगे: 'साला कुकुर! भाग हीयाँ से।' तब भी उसकी बेईज्ज़ती नहीं होती। वो आप पर मानहानि का मुक़दमा नहीं ठोकता। सिर्फ अपनी क्षुधा की आग बुझाने के लिए सब बेईज्ज़ती भुलाकर हर वो करतब करने को तैयार रहता है जिसके लिए आप उसे पालते हैं। हर आहट पर भूकता है। क्योंकि यही उसकी भाषा है। उसे किसी ने व्याकरण नहीं पढ़ाया। उसे अलंकारिक भाषा का कोई ज्ञान नहीं। उसे यह भी पता नहीं कि उसके सात समंदर पार वाले बिरादरी भाई भी यही भाषा बोलते-समझते हैं। यहाँ तो हर 100 किलोमीटर पर भाषा और संस्कार बदल जाते हैं। ईमान और धर्म बदल जाते हैं। फिर बेचारे कुत्ते की क्या बिसात! सिर्फ भौंक कर अपना विरोध भर दर्ज करा देता है।

पहले सिर्फ फिल्मों और किताबों में पढ़ा था कि कुत्ते की मदद से जटिल केस सोल्व कर लिया जाता था। लेकिन उसकी गवाही अदालत में नहीं मानी जाती। सारी दुनिया में कुत्ते अब जासूसी करने लगे हैं। 'डॉग-स्क्वायड' के नाम से इनकी सेना का निर्माण हो रहा है। 26/11 के बाद तो मुंबई वाले 'स्ट्रीट-डॉग्स' को भी अब 'सुपर-कॉप' बनाने की मुहीम पे लगे हैं। दिन बहुरने के लच्छन दिख रहें हैं। बिरादरी को खबर मिलनी चाहिए। मीडिया वाले भी शायद कुत्तों पर 'ज़ूम' करें! 'पीपली लाइव' की तरह।

 *बिफरा हुआ कुत्ता :>>>
एसएमपी सर के विमल सीरीज के उपन्यास "दमन चक्र" में जब विमल और वेष बदली हुई नीलम पहली बार ओरियंटल की बोर्ड मीटिंग में वहाँ मौजूद बोर्ड के (दादा टाइप) मैनेजिंग डायरेक्टर दाण्डेकर को मिलते हैं तब बाद में नीलम विमल से दाण्डेकर के हुलिए और व्यवहार का हवाला देकर पूछती है कि "वो 'बिफरे हुए कुत्ते' जैसी शक्ल वाला" आदमी अगर फिर भौंका तो?'__यहाँ मेरा इशारा इस बात की तरफ है कि इंसान, महिला या पुरुष, में पहली नज़र में ही ये जान लेने की क्षमता फीड होती है कि सामने वाला बंदा किस किस्म का है। भगवान् ने कमीनी फितरत वाले कुत्ते की जात जैसे गलीज़ आदमी को सचमुच बिफरे हुए कुत्ते जैसी ही कमीनी शक्ल भी दी होती है। आप जब पहली ही बार किसी से मिलते हैं तो मिलते ही आपको ये आभास हो जाता है कि 'मेरी इससे निभने वाली है या नहीं। या 'इसके वजह से प्रॉब्लम हो सकती है!' अगर आप थोड़ी बारीकी, गभीरता और यत्न से अपने बचपन को याद करें तो याद करके बताइये कि जब आपने स्कूल में पहला कदम रक्खा था तो क्या सभी लड़कों से आपकी दोस्ती हो गई थी? _नहीं। आपकी पहली मासूम, सहमी नज़र कक्षा में मौजूद हुजूम में किसी अपने जैसे हमख्याल और प्यारे शख्श की तलाश में होती है। जब वो मिलता है तो आप एक-दुसरे को पसंद कर मित्रता, फिर याराना का रिश्ता स्थापित कर लेते हैं। फिर भी कक्षा में मौजूद हुजूम में आपको वो शक्ल भी दिखाई पड़ती है, जिसके चेहरे से घमंड, और कमीनगी साफ़ झलकती है। वो अपनी नाक के नीचे ही सबको देखना चाहता है। बेवजह सभी से अक्खड़ लहजे में बात करता है, बात-बात पर किसी-न-किसी का कॉलर पकड़ लेता है। वो कक्षा का 'इलेक्टेड मोनिटर' हो-या-न हो, वो मोनिटर पर भी ऐसी ही 'धाक जमा कर' उसे अपने रौब के दायरे में रखने की घटिया कोशिश करता है, और यूँ 'सिंगल आउट' होकर तस्दीकशुदा 'बिफरा हुआ कुत्ता' सिद्ध होता है। ऐसे लोग या तो समाज के असामाजिक तत्व बनते हैं या फिर ज़िन्दगी भर दुर्र-दुर्र झेलते, अवांछित अछूत बन जाते हैं। इनकी ऐसी दुर्भावना तब स्पष्ट और प्रबल हो जाती है, जब आप की सोच को मुहरबंद करती वह बंदा कोई दादागिरी नुमा व्यवहार दायें-बाएं बिखेरता मिलता है। उसकी हर किसी पर हर वक़्त चाबुक ताने रहने की फितरत सहज ही समझ में आ जाती है, कि ये खुद को 'बॉस' समझता है। वजह यही है कि उसे अबतक कोई आइना दिखाने वाला नहीं मिला होता की वो देख ले कि उसकी शकल बिलकुल "बिफरे हुए कुत्ते जैसी" है। और वो कभी भी शांत नहीं रहेगा। उसके आस-पास कभी शांति नहीं रहेगी। उसकी अशांत अवस्था उसे खुद ही ले डूबेगी। ऐसा वहशी समान 'कुत्ता आदमी' कतई सभ्य इंसान नहीं हो सकता। इसीलिए वो किसी का भला चाह ही नहीं सकता। इससे जितना हो सके परहेज जरूरी है। फिर भी वो अपनी फितरत के मुताबिक कभी-न-कभी : यदि आप मौजूद हैं; चुपचाप अपना काम कर रहे हैं; उसकी तरफ आप कोई तवज्जो नहीं देते; जिसे वो अपनी तौहीन समझता है और हमेशा आपको उकसाने वाली कोई हरकत करता है, आपको छेड़ता है, आपको बेईज्ज़त और शरेआम ज़लील करके आपको खुद अपने आगे सरेंडर करने को विवश करता है ऐसी स्थिति में मेरा सवाल है : "आप क्या करेंगे?"  ये भी संभव है कि सबकुछ आपकी, मेरी निगाह का धोखा साबित हो; जिसके चांसेज लगभग जीरो ही हैं, पर जब ऐसा साबित होगा तो निश्चय ही मन के मैल मिट जायेंगे, प्रेम-प्यार-दोस्ताना और याराना की जीत होगी। लेकिन ऐसा नहीं होता है तो? अब जबाब दीजिये __ ऐसा आदमी सच्चा पुत्र-पति और पिता, मित्र और सही नागरिक के रोल में खपेगा? निभा पायेंगे इसके साथ? यदि आपका ऐसे लोगों से पाला कभी पड़ा था तो आपने क्या किया? मुझे आकस्मात बदकिस्मती से ऐसे कुत्ते से पाल़ा पड़ जाय तो मुझे क्या करना चाहिए? ध्यान रखियेगा, आपको इससे अकेले ही लड़ना है या भागना है। यहाँ अब आपके अपने इज्ज़त, आन-मान-सम्मान-स्वाभिमान की बाज़ी है। ऐसी हालत में इस कुत्ते का क्या इलाज़ है!?!?!?

कमज़ोर-से-कमज़ोर कुत्ता भी भौंकता है। अनायास भौंकता है। घर के भीतर से ही भौंकता है। सिर्फ उसे किसी दुसरे कुत्ते की 'ललकार' सुनाई देने की कसर होती है। 'ताल-से-ताल मिलाओ' इसने सबसे ज्यादा समझा है। चाहे वो ताल विरोध ही क्यों न दर्शाता हो। अनेकता में एकता की मिसाल यह कुत्ते की जात जितनी प्रबलता से दर्शाती है, 'शायद' ऐसी और दूसरी कोई मिसाल नहीं। कोई कुत्ता (लिंग-भेद से भी परे) अपनी 'टेरिटरी' में दुसरे अप्रवासी कुत्ते की इंट्री और दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं करता। बिना किसी फतवे के समूचे समूह को इकठ्ठा कर लेता है और जो जंग होती है, उसमे अप्रवासी 'घुसपैठिये' कुत्ते को हार मान कर, देह नुंचवा कर, दुम दबा कर भागना ही पड़ता है। लेकिन देश के रहनुमा 'नो कमेंट्स' से ज्यादा बोलना तक नहीं जानते। सबसे बड़े प्रतिनिधि तो चुप रहना ही बेहतर समझते हैं, डर हो सकता है कि कहीं जाति न बदल जाय, हमें भी 'उनके' (पाकिस्तानियों) जैसा ही बडबोला न समझ लिया जाय। फिल्मों और उपन्यासों का रसिया हूँ, इसलिए एक और फ़िल्मी दृश्य की याद आ गई। राजेश खन्ना की फिल्म 'अपना देश' में तीन नेता (तीनों विलेन) म्युनिसिपल्टी के चुनाव में अध्यक्ष पद की दावेदारी के लिए आपस में लड़ पड़ते हैं। उनकी भों-भों चलती रहती है कि डायरेक्टर ने सड़क पर लड़ते तीन कुत्तों को पर्दे पर दिखा दिया, और हॉल में गूंजती तालियाँ और सीटियाँ साबित करतीं हैं कि - ये पब्लिक है, सब जानती है।(...ये राजेश खाना की ही फिल्म 'रोटी' का गाना है।). फिल्मों की बात है तो और एक बात जोड़ता हूँ। कुत्तों ने मिमिक्री आर्टिस्टों पर भी खूब मेहरबानी की है। उन्हें जब भी धरम-पा जी की नक़ल करनी होती है वे उनकी अंदाजेबयां की नक़ल कर सिर्फ -"कुत्ते!" कहते हैं और सारी तारीफ के हक़दार बन जाते हैं। मशहूर हास्य कलाकार श्री राजू श्रीवास्तव एक कॉमेडी शो में>>> -"मैंने देखा सामने से धर्मेन्द्र जी चले आ रहे हैं! आँखों पर यकीन नहीं हुआ! डरते-डरते उनके पास जा कर पूछे कि सर, आप धर्मेन्द्र जी ही हो ना? कोई मेकअप तो नहीं किया हुआ?' 'वो' पलटे और गुस्से से बोले -"कुत्ते!" (राजू)>>>".....हाँ!हाँ! असली है, असली है!!" कुत्तों में कटखनापन भी अजीब लच्छन हैं। किसी को भी काटना, बेवजह काटना, बेमतलब भौं-भौं इनकी लाइफ स्टाइल है।

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अगर घरेलु कुत्ता काटे तो कोई दिककत नही है पर पागल कुत्ता कटे तो समस्या है। सड़क वाला कुत्ता काटले तो आप जानते है नही उसको इंजेक्शन दिए हुए है या नही, उसने काट लिया तो आप डॉक्टर के पास जायेंगे फिर वो 14 इंजेक्शन लगाएगा वो भी पेट में लगाता है, उससे बहुत दर्द होता है और खर्च भी हो जाता है कम से कम 50000 तक कई बार, गरीब आदमी के पास वो भी नही है ।

कुत्ता कभी भी काटे, पागल से पागल कुत्ता काटे, घबराइए मत, चिंता मत करिए बिलकुल ठीक होगा वो आदमी बस उसको एक दावा दे दीजिये । दावा का नाम है Hydrophobinum 200 और इसको 10-10 मिनट पर जीभ में तिन ड्रोप डालना है । ये दवा आपको किसी भी होमियोपैथिक दवाईयो की दुकान पर मिल जाएगी, कितना भी पागल कुत्ता काटे आप ये दवा दे दीजिये और भूल जाइये के कोई इंजेक्शन देना है। इस दावा को सूरज की धुप और रेफ्रीजिरेटर से बचाना है। रेबिस सिर्फ पागल कुत्ता काटने से ही होता है पर साधारण कुत्ता काटने से रेबिस नही होता। आवारा कुत्तों अगर काट दिया है तो राजीव भाई के अनुसार आप अपना मन का बहम दूर करने के लिए ये दवा दे सकते है लेकिन उससे कुछ नही होता वो हमारा मन का वहम है जिससे हम परेशान रहते है, और कुछ डर डॉक्टरों ने बिठा रखा है के इंजेक्शन तो लेना ही पड़ेगा। अपने शरीर में थोड़े बहुत resistance सबके पास है अगर कुत्ते के काटने से उनके लारग्रंथी के कुछ वायरस चले भी गये है तो उनको ख़तम करने के लिए हमारे रक्त में काफी कुछ है और वो ख़तम कर ही लेता है । लेकिन क्योंकि मन में भय बिठा दिया है शंका हो जाती है हमको confirm नही होता जबतक 20000-50000 खर्च नही कर लेते ये उस समय लिए राजीव भाई ने ये दावा लेने की बात कही है। और इसका एक एक ड्रोप 10-10 मिनट में जीभ पे तीन बार डाल के छोड़ दीजिये । 30 मिनट में ये दवा सब काम कर देगा। ये दवा आपको किसी भी होमियोपैथिक दवाईयो की दुकान पर मिल जाएगी।

कई बार कुत्ता घर के बच्चो से साथ खेल रहा होता है और गलती से उसका कोई दाँत लग गया तो आप उस जखम में थोडा हल्दी लगा दीजिये पर साबुन से उस जखम को बिलकुल मत धोये नही तो वो पक जायेगा; हल्दी Antibiotic, Antipyretic, Antititetanatic, Antiinflammatory है।

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अगर घरेलु कुत्ता काटे तो कोई दिककत नही है पर पागल कुत्ता कटे तो समस्या है। सड़क वाला कुत्ता काटले तो आप जानते है नही उसको इंजेक्शन दिए हुए है या नही, उसने काट लिया तो आप डॉक्टर के पास जायेंगे फिर वो 14 इंजेक्शन लगाएगा वो भी पेट में लगाता है, उससे बहुत दर्द होता है और खर्च भी हो जाता है कम से कम 50000 तक कई बार, गरीब आदमी के पास वो भी नही है । 

कुत्ता कभी भी काटे, पागल से पागल कुत्ता काटे, घबराइए मत, चिंता मत करिए बिलकुल ठीक होगा वो आदमी बस उसको एक दावा दे दीजिये । दावा का नाम है Hydrophobinum 200 और इसको 10-10 मिनट पर जीभ में तिन ड्रोप डालना है । ये दवा आपको किसी भी होमियोपैथिक दवाईयो की दुकान पर मिल जाएगी, कितना भी पागल कुत्ता काटे आप ये दवा दे दीजिये और भूल जाइये के कोई इंजेक्शन देना है। इस दावा को सूरज की धुप और रेफ्रीजिरेटर से बचाना है। रेबिस सिर्फ पागल कुत्ता काटने से ही होता है पर साधारण कुत्ता काटने से रेबिस नही होता। आवारा कुत्तों अगर काट दिया है तो राजीव भाई के अनुसार आप अपना मन का बहम दूर करने के लिए ये दवा दे सकते है लेकिन उससे कुछ नही होता वो हमारा मन का वहम है जिससे हम परेशान रहते है, और कुछ डर डॉक्टरों ने बिठा रखा है के इंजेक्शन तो लेना ही पड़ेगा। अपने शरीर में थोड़े बहुत resistance सबके पास है अगर कुत्ते के काटने से उनके लारग्रंथी के कुछ वायरस चले भी गये है तो उनको ख़तम करने के लिए हमारे रक्त में काफी कुछ है और वो ख़तम कर ही लेता है । लेकिन क्योंकि मन में भय बिठा दिया है शंका हो जाती है हमको confirm नही होता जबतक 20000-50000 खर्च नही कर लेते ये उस समय लिए राजीव भाई ने ये दावा लेने की बात कही है। और इसका एक एक ड्रोप 10-10 मिनट में जीभ पे तीन बार डाल के छोड़ दीजिये । 30 मिनट में ये दवा सब काम कर देगा। ये दवा आपको किसी भी होमियोपैथिक दवाईयो की दुकान पर मिल जाएगी

कई बार कुत्ता घर के बच्चो से साथ खेल रहा होता है और गलती से उसका कोई दाँत लग गया तो आप उस जखम में थोडा हल्दी लगा दीजिये पर साबुन से उस जखम को बिलकुल मत धोये नही तो वो पक जायेगा; हल्दी Antibiotic, Antipyretic, Antititetanatic, Antiinflammatory है।
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इनके सारे बदन में हर वक़्त, बेवक्त की खुजली भी लाज़बाब होती है। तीन टांग से बैलेंस बनाकर एक टांग से बदन खुजाना!_ये नक़ल कोई मिमिक्री आर्टिस्ट करके नहीं दिखाता। कुत्ते को ड्राइविंग नहीं आती फिर भी वो हर गाडी के पीछे भागता है। पकड़ भी लेगा तो आखिर करेगा क्या!? कुत्ते की दुम बड़ी रहस्यमय है! इसके हिलने और दुबकने का मतलब, प्यार,स्नेह का प्रदर्शन तथा डरा-सहमा हुआ माना जाता है। टेढ़ी दुम पर कई प्रश्नोत्तर, और डायलोगबाजी हो चुके है, आगे भी होते ही रहेंगे। जब भी जरूरत होगी किसी के भी व्यवहार की तुलना के लिए कुत्ता सदैव हाज़िर है।

कुत्तों की मेहरबानी को भूलना बेइंसाफी होगी। आज इसे आदमी से ज्यादा इज्ज़त और शोहरत हासिल है। यह अकारण नहीं हो सकता। आदमी ने इंसान बनना छोड़ दिया तो कुत्ते ने अपना लिया। आदमी ने ही कुत्ते को ये अधिकार दे दिया, और अपनी हस्ती को इसके आगे तुच्छ कर लिया। जब पालते हैं तो इंसानों सरीखा इनका नामकरण करते हैं। कोई भी नाम रखिये किसी-न-कसी इंसान के नाम जैसी होगी जिसे जब वो सुनेगा तो खुद को बेईज्ज़त होता महसूस कर ऐतराज़ करेगा। गुस्से में आम ये कहा जाता है कि -'अगर मैं झूठा साबित होऊं तो मेरे नाम पर कुत्ता पाल लेना!' और हकीकतन ये हो भी रहा है। कुत्ते जानेंगे तो फक्र महसूस करेंगे।

कुत्ते की श्रवण शक्ति, गंध सूंघने और पहचानने की शक्ति, उनकी कच्ची नींद और हर आहट पर चौकस-चौकन्ना और उसका फुर्तीलापन निर्विवाद रूप से प्रशंसनीय है। इंसान की फितरत को भी पहचान लेना कुत्तों को और भी विलक्षण प्राणी बना देता है। कुत्ता जिस घर, या दायरे में रहता है, उसे वहाँ नित्य आने-जाने वाले की पहचान हो जाती है। उन सभी में आगंतुकों, जो आते-जाते रहते हैं, और हमेशा मौजूद घर के सदस्यों में से उसे हर किसी से घनिष्ठता नहीं हो जाती। कुत्ता >लालची, खोटी, चापलूस, और बेईमान नीयत वाले को< झट पहचान लेता है और, अपने मालिक की पुचकार और मनाही को नज़रअंदाज कर लगातार उस पर भौंकता रहता है जिस पर कि उसे संदेह होता है। खोटी नीयत वाला व्यक्ति रोज-रोज क्यों न आता-जाता हो कुतवा उसे गरियाये बिना नहीं छोड़ता। एक बात काबिलेगौर है, कुत्ते के ये गुण उसके देहाती, देशी, विदेशी या हाईब्रीड के होने का मोहताज़ नहीं। सभी में यह होता है, सिर्फ उसके इन गुणों को थोडा प्रयास कर उभारने की जरूरत होती है। अगर आप साफ़ दिल के हैं तो वो धीरे-धीरे आपका भी दोस्त बन ही जाएगा।

मेम-साब की गोद की शोभा कुत्ते से और बढ़ जाती है। किसी नौकरानी को इतना अधिकार नहीं कि वो मालकिन के सामने बैठ भी जाय, जबकि कुत्ता मालकिन के साथ नर्म-मुलायम-गर्म बिस्तर पर साथ सोता है। नौकरानी का काम है कुत्ते और उसकी टट्टी को साफ़ करना, उसे नहलाना-धुलाना। मालिक-मालकिन भी कुत्ते से जो प्यार दिखाते हैं उसे देखकर उनके आश्रित-कर्मचारियों को क्षोभ होता है, उन्हें ये हीन भावना डंस लेती है कि उनकी औकात एक कुत्ते से भी गई-बीती है। पर कुछ तो ख़ास है जो सारी दुनिया में महिला-पुरुष, मशहूर या आम, अमीर या गरीब सभी कुत्ता पालते हैं और कई तरह से कई तरीके से उससे अपने स्नेह-लगाव और प्यार का प्रदर्शन करते हैं। खूबसूरसत लड़कियां अपने इस "श्वान-स्नेह" को जिस अंदाज़ में झल्कातीं हैं, कवियों को कई कालजयी कविता रचने की प्रेरणा दे जातीं हैं। धन्य हैं ये देवियाँ और भाग्यशाली हैं वे कुत्ते जिन्हें यूँ परस्पर इतना प्यार होता है। 'लड़की को पटाना हो तो पहले उसके कुत्ते को पटाओ!' कई बार यह सूत्र काम कर भी जाता होगा। इन देवियों के कुत्तों को नहलाने-साफ करने वाला स्टाफ जिस शिद्दत से उसको नहलाता और साफ़ करता है, उसके रहने के महंगे कमरे को साफ़ करता है, देख कर किसी ने कहा कि -'काश ये सेवा तुमने "गौ माता" की की होती तो तुम्हारे सात पुश्त 'तर' जाते।' क्या पता कुत्ते को वो सिर्फ एक जीव जानकर और अपने कार्य को ही अपना कर्म मान कर करता है और खुश है तो वो इसी समय 'तरा' हुआ हो!

धनाढ्य घरों में कुत्ता एक अत्यावश्यक वस्तु है, जिसके बिना धन की बेईज्ज़ती है। कुत्ता दरवानो से ज्यादा चौकस होते हैं, जिनके भूँकने पर ही उनीन्दे दरवान को चेतना आती है और वो लाठी पीटकर,या जोर से चीख-पुकारकर 'अपनी' मुस्तैदी को मुहरबंद करता है। कुत्ता यहाँ भी शहीद हुआ। पर उसे इन सांसारिक मोह माया का कोई भान तक नहीं। उसकी इस मासूम शहादत को दरवान जी अपनी बड़ाई में बदल लेते हैं। अपनी कोताही को यह कह कर जस्टिफाई करते हैं कि -'ई साला आखिर हई काहे वास्ते?' दरवान जी की शिकायत भी बेवजह नहीं है। उनको शिकायत है कि उसका छह महीने का वेतन 'कुत्ते जी' के एक महीने के खर्चे से भी कम है। कुत्ते को रोज हड्डी-बोटी-दूध और स्नान, साफ़-सफाई चाहिए जबकि वो एक साबुन की टिकिया भी तरह-तरह के मोल-भाव कर के खरीद पाता है। कुत्ता कहने पर उसे डांट पड़ती है, बोला जाता है उसे बात करने का शऊर नहीं है। जबकि "वाचडॉग" बोलने से उसकी कोई बेईज्ज़ती नहीं होती। मालिक 'हॉटडॉग' खाता और 'ब्लैकडॉग' पीता है,और मुदित मन से खुद को 'लकीडॉग' समझकर, पसरकर सोया रहता है। वाह रे अंग्रेजी की महिमा!! दरवान रात भर असाधारण मौसम और विपरीत हालात में 'डॉग' साहब के साथ ड्यूटी करता है। कभी भूखा-प्यासा तो कभी बीमार-सा, तो कभी एक-दो प्याले के खुमार-सा। उसके मुख मलीन और भंगिमा सख्त होती है तो लोगों को शिकायत होती है कि साहब आपका दरवान बड़ा अक्खड़ है। पर कुत्ते से सभी प्रसन्न होते हैं, लेकिन पास नहीं जाते। कुत्ता उन्हें अजनबी जान उन्हें भाव नहीं देता उनपर खूब भौंकता है। फिर भी तारीफ़ का पात्र है। जबकि दरवान को निकम्मा और काहिल मान लिया जाता है, उसे ताकीद की जाती है कि आगंतुकों से शिष्टाचार से पेश आये। कुत्ते का क्या है वो तो जानवर है।

जिन्हें इस जानवर कुत्ते से स्नेह हो जाता है,
 वे उसके लिए वैसे ही चिंतित होते हैं, जैसे अपने किसी अज़ीज़ को मिस करते हैं, छोटा हो तो फ़िक्र करते हैं, कहीं घर से बाहर जाना पड़ता है तो फोन करके उसका हाल-चाल पूछते हैं। 06,दिसंबर`2012 को मलुवा ने पाँच बच्चों को जन्म दिया था। उनमे से दो मेल हैं और दो फीमेल। फीमेल में से एक काले रंग की है, बाकी भूरे हैं। फैसला लेने में बिलकुल देर नहीं हुई कि मलुवा की जगह अब उसकी बेटी काली वाली लेगी। लेकिन इच्छा हुई कि साथ में एक मेल कुत्ते को भी रखा जाय। एक तगड़ा छांट भी लिया गया। पर एक की ही गुंजाइश थी। फिर 'कुत्ते की फितरत' पर भी शंका थी, क्योंकि कुछ 'कुत्ते इंसानों' की तरह कुत्ते को भी नैतिकता और मान-मर्यादा की समझ नहीं होती। फिर एक जोक याद आ गया जिसमे वर्णित कुत्ते के लक्षण से सारी सुधि दुनिया को नफ़रत है। जोक मुझे मेरे प्यारे बड़े भाई सामान भोजपुरी लोक गायक 'व्यास भैया' से सुनने को मिला था, जिनका 'सेन्स ऑफ़ हयूमर', बातों को पेश करने का उनका अन्दाजेबयाँ लाजबाब है; जोक(सीधे शब्दों में)कुछ यूँ है: "एक आदमी को हाइड्रोसिल / hydrosil की बीमारी हो गई। उसने डॉक्टर्स से संपर्क किया तो ट्रांसप्लांट ही निजात बतलाया गया। मरीज़ के राजीनामे के बाद चालु ऑपरेशन के दरम्यान, दुर्भाग्य से, ट्रांसप्लांट के लिए उपलब्ध अंग, भंग (डैमेज) हो गया। डॉक्टर्स में खलबली मच गई। दुसरे अंग की तलाश तक अब ऑपरेशन रोकना संभव नहीं था। छिपाकर कुत्ते का अंग ट्रांसप्लांट कर दिया गया। ऑपरेशन हो गया। मरीज़ के सक्रीय होने के बाद डॉक्टर्स ने उससे उसका हाल पूछा। उसने सिर्फ एक शिकायत की वो ये कि लघुशंका के वक़्त उसकी एक टांग अपने-आप उठ जाती है!! ...खैर,...फिर इनकी दुर्भावना वाली फितरत इनके फीमेल से भिन्न होती है। इनमें संयम नहीं! विचार नहीं! इनमे खूंखार, घातक, पाशविक फितरत होती होगी तभी तो ये 'कुत्ते जैसी हरकत' करते हैं! जो इन्हीं के जैसे सेम कुछ हैवान और वहशी दरिंदों जैसे 'कुत्ते-इंसानों' में भी होने के कारण नफरत,हिकारत,धिक्कार,वहिष्कार,प्रताड़ना, के बाद तुरंत निश्चित मृत्यु दंड="वध" के सौ फ़ीसदी काबिल है। सो हमने कुत्ते की जात से तौबा की, छोड़ आये। कुत्ते की फीमेल को हिंदी में क्या बोला जाता है उसका पूरा भान होने के बाद भी वो शब्द यहाँ लिखने के लिए मेरी अंतर्रात्मा हामी नहीं देती। हमने काली फीमेल को पाल लिया है। इसका नामकरण "ब्लैकि" रखा गया है, किसी को ऐतराज हो तो बता दीजियेगा, कोई और नाम सोचेंगे! मलुवा की विदाई हो गई। उसकी एक बच्ची को एक मित्र ने पाल लिया। बाकी तीन बच्चो सहित मलुवा को मैंने शशि के कार्य स्थल, प्रेट्रोल पंप स्टेशन पर छोड़ दिया। मन को तस्सली थी कि पेट्रोल पंप के बगल में एक लाइन मोटल (ढाबा) है, जी-खा लेगी। जब मैं सपरिवार राँची गया तो मैंने फोन करने की मन में हंसी और शरारत सूझि! मैंने शशि को फोनकर मलुवा और उसके बच्चों का हाल पूछा। लौटने के बाद सभी इक्कठे बैठे हुए थे तो शशि खुद ही मलुवा का समाचार बताने लगा। मैंने उससे जब यह कहा कि मैंने फोन पर मलुवा का समाचार जानबूझकर पूछा था; मैं देखना चाहता था कि वह क्या सोचता है: "भईया तो कभी फोन करके हमर हाल नई पूछ्लई; और मलुवा से केतना प्यार हइ कि स्पेशल फोन करके 'हमरे से' हाल-चाल पुछइत हइ!" _मेरी बात पर खूब ठहाके लगे। शशि और मेरी आँखें भींग आईं।


अपने पहले, शुरूआती सीज़न के 'कौन बनेगा करोडपति' के किसी एपिसोड में अमित जी कंप्यूटर द्वारा प्रस्तुत एक प्रश्न, तब के प्रतियोगी से पूछते हैं,{जिसका एक्सैक्ट संवाद मुझे याद नहीं}, कि अंतरिक्ष में राकेट के द्वारा सबसे पहले किस जानवर को भेजा गया था! प्रश्न के उत्तर के विकल्पों में से एक विकल्प 'कुता' भी था। जब अमित जी विकल्पों को पढ़ते हैं, तब उन्होंने इस शब्द 'कुत्ता' का उच्चारण किया, और तत्काल बोल पड़े- 'कुत्ता!' _'बोलने से ऐसा लगता है जैसे किसी ने किसी को गाली दी हो!' उत्तर आसन था, सो प्रतियोगी की हामी पर वे कंप्यूटर से विकल्प (A, B, C, D जो भी था),पर ताला लगाने को कहते हैं, ऐसा नहीं कहते कि -'कंप्यूटर महाशय! 'कुत्ते जी' को लॉक किया जाए।' हमारे नेता दुर्दांत आतंकवादी, देश के दुश्मनों को 'ओसामा "जी"' और लश्कर के मुखिया 26/11 के मास्टरमाइंड को 'हाफ़िज़ सईद "साहब"' कहते है, और शर्मिंदा तक नहीं होते। काफी शिष्ट और व्यवहारिक होने का घमंड जो होता है उन्हें! जिनकी तर्कशक्ति की बुद्धि उन्हें प्रेरित करती है यह प्रदर्शित करने का कि हम शत्रु को भी इज्ज़त से पुकारते हैं, भले चाहे वह शत्रु सारे देश की जनता ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानवता का खतरनाक पागल कुत्ते से भी गया-बीता घोर दुश्मन है और देखते ही तत्काल ठौर (on that very spot!) मार गिराने के ही काबिल है।

ईश्वर ने जब कुत्तों की प्रजनन क्षमता बनाई होगी, तभी तत्काल मनुष्यों की बारी आ गई होगी। ईश्वर की लीला ईश्वर ही जानें, पर शायद ईश्वर ने कुत्तों पर रिप्रोडक्टिव सिस्टम फिक्स करने के बाद पता नहीं हाथ धोया था या नहीं, जब वो इस एक्सपेरिमेंट को अंजाम दे रहे होंगे तो (कुत्तों जैसी फितरत पता नहीं कितने प्रतिशत)'मेल' ह्यूमन मेंटल सिस्टम, ब्रेन में कुत्तों वाली फितरत, जरूर घुस गई होगी। जिसका नतीजा प्रत्यक्ष दिखता है। कुत्ते जन्म के एक साल के भीतर ही प्रजनन के लिए चाक-चौबंद तैयार होकर अपने पार्टनर की तलाश में निकल जाते हैं। जन्म के बाद जैसे-जैसे समय बीतता है उसे याद नहीं रहता कि किसने जन्माया था? किसने जन्म दिया था? भाई-बहन कौन थे? थे भी तो वे आपस में पार्टनर बनेंगे कि नहीं? माँ-बहन सभी इन्हें ही उचित पार्टनर लगते हैं। और उनकी वंशवृद्धि को किसी नैतिकता के पैमाने पर तौल कर नहीं देखा जाता। 'इनका क्या? ये तो जानवर है! मनुष्य की तुलना कुत्तों से क्यों? गाय से हाथी से बन्दर से शेर से या और किसी जानवर से क्यों नहीं!? इसलिए कि भले दुसरे जानवर भी कोई नैतिकता नहीं समझते, पर प्रजनन के लिए इनमे से शीघ्र सक्षम सबसे पहले कुत्ता ही तैयार हो जाता है। कुत्ता ही आपके-हमारे घरों और गलियों में खुले-आम वंश-श्रृंगार करता है, कुत्ते ही झुण्ड में एक साथ मिलकर एक निरीह पर हमला कर निर्दयिता करते हैं। इसके लिए लाइन मारना भी सबसे पहले कुत्ता ही शुरू करता है। आदमी के कुछ नस्ल इसी किस्म के होते हैं। कम उम्र में ही खुद को आजमाने की कोशिश शुरू- कुत्तागिरी है। नदीदों की तरह हर बालिका पर लार टपकाना-कुत्तागिरी है। कामांध होकर बालिकाओं का पीछा करना, उन्हें घूरना, छेड़ना-कुत्तागिरी है। अकेला या झुण्ड में हमला कर किसी बालिका पर ज़ुल्म करना-कुत्तागिरी है। और सुधि आदमीयत वाले इंसानों की बस्ती में ये कतई मंज़ूर नहीं। इसके लिए ईश्वर को भी गरियायेंगे और इन अत्याचारी 'कुत्तों' को भी उचित सबक सिखायेंगे; ऐसे कुत्तों का वंशनाश, बीजनाश आवश्यक है। 'दामिनी' की घटना के बाद क्या 'ये कुत्ते' सुधर गए हैं? क्या कोई और दूसरी बालिका 'इन कुत्तों' की पशुता का शिकार नहीं हुई है? दामिनी के बाद सेम यही अत्याचार होना रूक गया> क्या ऐसी ही और नई वारदातें नहीं हुईं?..._फैसला! अभी तुरंत!! तुरंत फैसला जरूरी है। वर्ना हम गए! किस तरह ये 'मुजरिम कुत्ते' हाफ़िज़ सईद से अलग हैं!?!?


कुत्ते गन्दी जगहों पर भी निर्विकार भाव से घूमते-टहलते हैं, पर साफ़-सुथरी सड़क से डरते हैं! "अबे! उधर सड़क पर ट्रैफिक में कहाँ जा रहा है, 'आदमी की मौत' मरना चाहता है क्या!!?" खुले मैदानों से अब खुशबू की जगह बदबू आती है। कुत्ते आपस में बतियाते हैं-'छेह:! यार हमारा मैला तो इतना नहीं महकता! क्या अंग्रेज फिर से आ गये?" जबाब:>"अरे ना रे! कोई नेता हगले होई!"

"इनसे तो 'कुत्ते' ही भले!"
मुझसे पहले भी किसी ने कुत्ते की महिमा पर कुछ कहा होगा। मैंने क्यों ये लिखा मुझे खुद नहीं मालूम। पर, कुत्ता कथा में और कुछ दिलचस्प सूझेगा तो इसी-(blog)-पृष्ठ पर जोड़ता जाउंगा। 


_श्री .
30/जनवरी/2013 लोहरदगा।............................समय? मलूम नईं जी!

Tuesday, January 29, 2013

एक गधे ने कोशिश की वो भी बन जाए घोड़ा

"कउवा हंस की चाल चला लंगडा कर थोडा-थोडा,
"कउवा हंस की चाल चला लंगडा कर थोडा-थोडा,
एक गधे ने कोशिश की वो भी बन जाए घोड़ा,...."
'देखो ताल न टूटे।
हमारी ताल न टूटे।
देखो रे ताल न टूटे,
ताल न टूटे,
डूम-टू-डू-डूम डूम!'

...............
...............
"जिसका काम उसी को साजे,
और करे तो ठेंगा बाजे,..........!"
*******************************************
 उपर्युक्त को यदि मेरे लिए प्रयोग किया जाय तो क्या करना चाहिए?
*******************************************
'.........!'
_श्री . 


Monday, January 28, 2013

सबसे पहले हैं भारत वासी

यारों! 
कोई मेरे को बतायेगा?... कि जब भी मैं तिरंगे को देखता हूँ, तो मेरे रोंगटे क्यूँ खड़े हो जाते हैं? ...जब भी मैं कोई देशभक्ति के गीत सुनता हूँ, जब भी मैं, ...ये अमर बोल सुनता-देखता हूँ मुझे रोष, रोमांच के आवेश में मेरे आंसू क्यूँ अनवरत बहने लगते हैं?  जैसे :-
>>>"हकीकत"(धरम-पा जी) का सच्चा-पावन, वीरगति को समर्पित मोहम्मद रफ़ी साहब के गाया >>>
"कर चले हम फ़िदा जानें-तन साथियों, ...अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों..........." यह गाना जब तक मेरी आँखों के सामने चलता है, गाने के साथ-साथ मेरे आंसू भी चल निकलते हैं, मेरे आंसू, मानो मेरे से, मेरे शरीर से, मुझसे ज्यादा प्रबल हों!

>>>"मेरे देश की धरती .." की वह पंक्तियाँ जिसे श्री महेन्द्र कपूर साहब और 'भारत भाई'_मनोज कुमार जी पेश करते हैं_
"......गांधी सुभास .., टैगोर , तिलक ऐसे हैं चमन के वीर यहाँ ............,
रंग हरा, हरी सिंह नलवे से ..............,
रंग लाल है, लाल बहादुर से..............,
रंग बना बसंती भगत सिंह,
रंग अमन का वीर जवाहर से!"

मेरे देश की धरती .. "

 ************************
 >>> 'पूरब सुर पश्चिम' का वो गीत: ....'दुल्हन चली',...में जब ये लाइनें आतीं हैं:
"देश-प्रेम ही आज़ादी की इस दुल्हनिया का वर है,
इस अलबेली दुल्हन का सिन्दूर सुहाग अमर है,
माता है कस्तूरबा जैसी, बाबुल गांधी जैसे,
बाबुल गांधी जैसे,
चाचा जिसके नेहरू-शास्त्री ...........ई, डरे न दुश्मन कैसे!?
डरे न दुश्मन कैसे!?

वीर शिवाजी जैसे वीरन, लक्ष्मीबाई बहना!
लक्षुमन जिसके बोध भगत सिंह, उसका फिर क्या कहना!!
उसका फिर क्या कहना!
जिसके लिए जवान बहा सकते हैं खून की गंगा।
जिसके लिए जवान बहा सकते हैं खून की गंगा।

>>>"आगे-पीछे तीनों सेना ले के चले तिरंगा..आ ..आ ....................आ!!"<<< {एस! यहीं एक्साक्ट्ली मैं रो पड़ता हूँ!!}


सेना चलती है ले के तिरंगा।
सेना चलती है ले के तिरंगा।
हों कोई हम प्रान्त के वासी, हों कोई भी भाषा-भाषी ...........ई!
सबसे पहले हैं भारत वासी।

सबसे पहले हैं भारत वासी।
सबसे पहले हैं भारत वासी।"


जय हिन्द!
वंदे मातरम!!
_श्री .  
****************
"ओय, कंट्रोल इट!"
"नई होता यार!"

मेरे दुश्मनन्न्न्न!

मेरे दोस्त! अगर तू दुखी तो तेरा ये दोस्त भी दुखी।
जी हल्का करने को थोडा इसे गुनगुना लीजिये ::::::>>>

'...मेरे दिल से, सितमगर, तूने अच्छी दिल्लगी की है,
के बन के दोस्त, अपने दोस्तों से, दुश्मनी की है,.......
मेरे दुश्मनन्न्न्न! तू मेरी दोस्ती को तरसे,.............
मेरे दुश्मनन्न्न्न! तू मेरी दोस्ती को तरसे,
मुझे गम देने वाले, तू ख़ुशी को तरसे,.....
मेरे दुश्मनन्न्न्न!
.................!'
'तू फूल बने पतझड़ का, तुझपे बहार ना आये कभी,
मेरी ही तरह तू तडपे, तुझको करार न आये कभी,...
तुझको करार न आये कभी।
जिए तू इस तरह के, ज़िन्दगी को तरसे,....
मेरे दुश्मनन्न्न्न! तू मेरी दोस्ती को तरसे,
मुझे गम देने वाले, तू ख़ुशी को तरसे,.....
मेरे दुश्मनन्न्न्न!
.................'
'इतना तो असर कर जाएँ,...मेरी वफायें ओ बेवफा,....
एक रोज तुझे याद आएँ,...अपनी ज़फायें ओ बेवफा,...
अपनी ज़फायें ओ बेवफा,
पशेमाँ हो के रोये, तू हंसी को तरसे,...
मेरे दुश्मनन्न्न्न! तू मेरी दोस्ती को तरसे,
मुझे गम देने वाले, तू ख़ुशी को तरसे,.....
मेरे दुश्मनन्न्न्न!
................'
'तेरे गुलशन से जियादा,...वीरान कोई विराना न हो,
इस दुनिया में कोई तेरा,... अपना तो क्या!_बेगाना न हो!!
ओ, अपना तो क्या!_बेगाना न हो,
किसी का प्यार क्या तू, बेरुखी को तरसे,...
मेरे दुश्मनन्न्न्न! तू मेरी दोस्ती को तरसे,
मुझे गम देने वाले, तू ख़ुशी को तरसे,.....
मेरे दुश्मनन्न्न्न ............................................'


टूटे दिल से निकली श्राप!
किसी का दिल इतना न दुखाओ उसकी ये हाय तुम्हें ख़ाक कर दे .....!

(हैट्स ऑफ टू 'धरम-पा जी)
_श्री .

देते हैं भगवान् को धोखा..., इंसां को क्या छोड़ेंगे

'कसमें वादे प्यार-वफ़ा सब बातें हैं, बातों का क्या,
कसमें वादे प्यार-वफ़ा सब बातें हैं, बातों का क्या!
कोई किसी का नहीं ये झूठे नातें हैं, नातों का क्या!!
कसमें वादे प्यार-वफ़ा सब बातें हैं, बातों का क्या!
.................!'
'होगा मसीहा.............................................आ,
होगा मसीहा सामने तेरे, फिर भी न तू बच पायेगा,
तेरा अपना. ..............................................आ,
तेरा अपना खून ही आखिर तुझको आग लगाएगा।
आसमान में................................................ए,
आसमान में उड़ने वाले, मिटटी में मिल जाएगा,
कसमें वादे प्यार-वफ़ा सब बातें हैं, बातों का क्या!
.................!'
'सुख में तेरे .................................................ए,
सुख में तेरे साथ चलेंगे, दुःख में सब मुंह फेरेंगे,
दुनिया वाले.................................................ए,
दुनिया वाले तेरे बनकर तेरा ही दिल तोड़ेंगे,
देते हैं ........................................................ए,
देते हैं भगवान् को धोखा..., इंसां को क्या छोड़ेंगे!!
'कसमें वादे प्यार-वफ़ा सब बातें हैं, बातों का क्या,
कोई किसी का नहीं ये झूठे नातें हैं, नातों का क्या!!
कसमें वादे प्यार-वफ़ा सब बातें हैं, बातों का क्या!'

"आप" आज के अर्जुन ही तो हैं!

हिन्दुस्तानी नौसैनिक हवाई-अड्डे के हैंगर में >

प्लेन मेन्टेनेंस मैन(जॉन)>'सर दिन में दो-दो बार आप लड़ाई पर जाता है। जब तक नहीं आता, हमको चैन ही नहीं आता सर!'
फाइटर पायलट>"हा हा हा। जॉन!जॉन!जॉन!"
प्लेन मेन्टेनेंस मैन(पूरन)>"अरे, जॉन भैया! लड़ाई में दुश्मनन के मार-मार के बड़ा मज़ा आता है। क्यूँ सर?'
फाइटर पायलट>'मज़े और नफरत को भूल जाओ। पूरन ! तुमने गीता पढ़ी है?'
पूरन>'नइ सर।"
फाइटर पायलट>अरे पढ़ी तो हमने भी नहीं! हा हा! लेकिन सुना है कि उसमे लिखा है कि ज़िन्दगी में सबसे बड़ी चीज़ है कर्म। यानि कि अमल। एक्शन! जॉन, एक्शन!!
जॉन>'यस सर।'
फाइटर पायलट>'यह बात हमने एक मुसलमान शायर की नज़्म से सीखी है। अच्छा देर हो रही है। चलूँ!'

पूरन जोर से चिल्लाकर>'सर, वो शायर क्या कहता है!? हमें भी सुनाइये न सर! प्लीज़ सर!'

हैंगर से निकर कर अपने फाइटर प्लेन की तरफ जाते थोडा ठिठक कर >
फाइटर पायलट>'अच्छा! एक मिनट है।:>>>

"साथियों! दोस्तों! हम आज के अर्जुन ही तो हैं! 
हमसे भी कृष्ण यही कहते हैं कि 
ज़िन्दगी सिर्फ अमल! सिर्फ अमल! सिर्फ अमल!
और ये बेदर्द अमल सुलह भी है जंग भी है!
'अमन' की महँगी तस्वीर में है जितने रंग,
उन्हीं रंगों में छुपा खून का एक रंग भी है।
जंग रहमत है के लानत?_ये सवाल अब न उठा!
जंग जब आ ही गई सर पे तो रहमत होगी,
दूर से देख न भड़के हुए शोलों का ज़लाल,
इसी दोज़ख के किसी कोने में ज़न्नत होगी।
दोस्तों! साथियों! हम आज के अर्जुन ही तो हैं!"


"हः हा ........!! ...तो ज़न्नत होगी!
ना झुकेगा, सर वतन का, ...हर उड़ान की कसम्म्म्म्म्म !!
हिन्दुस्तान की कसम!
हो! हो! हो!... "
जय हिन्द!
(किसी को कुछ याद आया!! ?)

इंडियन एयर फ़ोर्स के सम्मान में!
हर हिन्दुस्तानी नौसैनिक फाइटर-पायलट को मेरा सलाम!
वन्दे मातरम!


_श्रीकान्त तिवारी.
 

सिर-फुटौवल:

बॉस>"का हुआ जी, दाढ़ी-हजामत काहे बढ़ाय हुए हैं?
मैं>"जी गाँव में चाची की मृत्यु हो गई है..."
बॉस>".........................................................."
मैं>"बंटवारे के बाद से कोई नइ पूछता है, खबर भी हमें किसी तीसरे जन से मिला ..."
बॉस>"..........................................................."
मैं>".. किसी ने खुद खबर नहीं किया,....हम खुद ही सभी नियम-कर्म मानकर उसे निभा रहे हैं।"
बॉस>"............................................................"
मैं >" हम...!"
..........
...........

सीन`1.>
[ऑफिस कॉम्लेक्स में गुदबुदाहट, बातें और बातें] :
एक>"आएं जी, सुनलियई सिरकांत के हीयाँ कोई मर गेलई! ठिक्के?"
दूसरा>"का पता।"
एक>"हमर से तो नइ बोललउ! के जाने सच है कि झूठ, कोई देखे थोड़े न गेले हई!"
तीसरा>"नइ-नइ, ठीक बात हई। ओकर चाची मर गेले हई।"
दूसरा>" झुट्ठो बोलइत होतऊ तो हमिन के का पता।"
चौथा>"कोन्नो भरोसा हई! दस-बारा बरस से तो अलगे-हें न हो गेल्थिन हे, अब मान्थिन कि नइ मान्थिन, लेकिन एन्ने कए दिन से कहाँ हजामत बनईले हउ। मरलोहों होतई।
एक>"लेकिन सब बात हमरा पता रहा हई, सम्झेले रे बाबू! चचिया के मरे के बात कर के मालिक्वइन से पइसा आइन्ठे के बहाना नइ करतई तो माल कहाँ से अइतई! आएँ?"
दूसरा>"ठीक बोला हिन।"
तीसरा>"होइयो सका हाउ, भाए। लेकिन हमर से बात होले हलइ, हमरा तो सचे लगलइ।"
एक>"अरे, बे..त! सच रह्तालई तो हमारा सब पता चल गेले रह्तालऊ। आजकल केए ई सब माना हई जी? बात हई गाँव के। सच-झूठ के पता लगावे मलिकवन का अब ओकर गाँव जैबथिन!! बात करा हे। सब पइसा के चक्कर हऊ।
बाकी सभी>"ठीक बोला हे, चचा।"

सीन`2.>[दशकर्म के बाद]>>>
`एक.>"अरे रे बाऊ!"
चपरासी>"हाँ, चचा?"
एक>"अरे! तोरा पता हउ, सिरकंतवा बेल मुड़इले हई कि नइ?"
(चचा जान! सिरकंतवा कहने की भी क्या ज़रुरत? बिंदी हटा दें,_"सिरकटवा" बोलें!)
चपरासी>"नइ मालूम। बिहाने ओकर घरे गेले हलियाई, टोपी पेन्हले हलई। अब का मालूम जाड़ा चलते कि काहे!"
एक>"देखभीन तो, सच्चो मुडवैले हई कि अइसने टोपिया पेन्ह के फोकस आउर इस्टाइल मारात हउ।"
चपरासी>"हम का करियाई? टोपिया नोंच लियई? अपने सीधे पूछ काहे नइ लेवा हीयई?"
एक>"अच्छाह! सब्भे पता लग जैताई।" [ चचा को मेरी चिंता हो गई, फ़िक्र हो गई। क्या वाकई?]

सीन `3.>
[घर से आकर सोचा ठंढ है, थोड़ी देर धुप में बैठूं।] एक सहकर्मी का आगमन:

"का सिरकांत जी!"
"जी, भईया।"
का हाल हावा?"
"ठीक है, भईया।"
"का बात हई, टोपी पेन्हले ह!?"
"जी, यूँ ही .., सिर,...मुंडन करवाए हैं।"
"काहे का होलई, कोई...!"
"जी हाँ कुछ वैसी ही बात है।"
"ओ! ..हम सोचे कुछ 'गंभीर' बात हई का?...अछा ठीक है, मीलई थी बाद में, आएं!'
"जी, ठीक है।"

[थोड़ी देर बाद,अन्य लोग और 'साथी', सहकर्मियों आगमन हो गया]
सहकर्मी`1.>"टोपिया खोल तो।"
मैं>"काहे ला?"
सहकर्मी`1>"देखाव ना, बेलमुंडा हो के कइसन दीखा हे!?"
मैं चुप रहा।
किसी ने टोपी को हाथ लगाया, मैंने थोडा मुसकाकर उन्हें परे हटाया।
कोई खिलखिला कर हंसा>"आजकल बाल वालन से बेलमुंडवइन जाड़े हिट फिलिम देवत हथिन। बढ़िया बढ़िया हीरो लोग के देख ले सब तो बेल मुंडवा के रूपया-पर-रूपया पीट देलथिन।
सहकर्मी`2>"सिरकांत जी! अबकी थोडा हेयर एस्टाइल बदलियेगा।"
सहकर्मी`3>"हम बोलें!.. अबरी तो आप मोंछ भी बढ़ाइए। और कलम भी लम्बा रखिये। दबंग में सलमान और तलाश में आमिर भी मोंछ रखले हथुन, नया एस्टाइल हाउ, तोर पर बढ़िया फब्ताऊ।
सहकर्मी 4>"आखिर बेलवा मुड्वाइये लिए न तेवारी जी? अबरी फ्रेंच-कट दाढ़ी रखियेगा। अमितब्भा एस्ताइल!"
सहकर्मी`1>"हमर ए गो बात मानबे?"
मैं>"का?"
सहकर्मी`1>"रोज थोडा धूप देखावल कर, हरियर-हरियर (new green) बार (बाल) उगतऊ।"
सहकर्मी`2>"कच्चा अंडा फोड़ के बेल में लगावे से भी फायदा होवा हई।"
प्राकृतिक गंजे सहकर्मी>"कोई हमरा बताइले हई कि ऊँट के मूत से भी फायदा होवा हई। लास्ट ईयर हम गोवा गेले हलियाई न तो हुवें कोई बताइले हलई। तो हम बिहाने-बिहाने एक दिन समुन्दर किनारे गेले हलियाई। हुवां ढेरे ऊंट वालन हलथिन। हम पुछ्लियाई कि आयें भाए ऊंटावा का पेसाब मिलेगा? त उ पुछ्लाई काहे? हम बोलालियाई कि सुने हैं कि ऊंट के पेसाब से मूँडी में नया बार उगता है। तो उ बोला जे ठीक बात है। पेसाब मिल जाएगा। 50-रुपिया लगेगा। हम 30-रुपिया में पटाय। त ऊंटवा वाला बोला बैठिये। हम बालू पर बईठ गय। उ ऊंटवा को ला के हमरा उपरे खड़ा कर दिया और बोला बैठल रहिएगा। देरी होने से मिजाज़ा खिसिया गया। हम बोले पइसा वापस करो, तब्बे ऊंटवा मूतने लगा, ...ऊंटवा वाला बोला 'सर जल्दी ...', हम सिर आगे किये। और छारा-छारा हुवें ...मूत्रस्नान हो गया। ऊंटवा वाला बोला कि धुप में एक घंटा सुखाइये फिर नहा लेना। ऐसे ही एक हपता करना था।  उ त छुट्टी नइ था, से हे वास्ते ठीक से इलाज नइ हुआ।
[>>>सामूहिक हंसी-मुस्कान-ठहाके-खिलखिलाहट और गगनभेदी अट्टहास!!<<<]
सहकर्मी`2>"अजी गाय का पेसाब से भी फायदा होता है।"
सहकर्मी`1>"अरे, नहीं। गाय का पेसाब से नस-नाडी या गठिया में फायदा होवा हई' हमर बाउजी तो गोमूत्र सीसी में हमेशा रखा हलथिन।
सहकर्मी`1>"अं, सिरकांत जी, खाली आफे बेल मुडवाय हैं कि सब्भे भाई।
मैं>"पता नहीं।"
सभी>"काहे?"
मैं>"ये भी पता नहीं।"
सभी>"काहे?"
मैं>"...हमको सिर्फ अपने बारे में पता है।"
सहकर्मी`2>"ऊं..उं, ई तो आपना-आपना मानन वाला बात है, भाई।
सहकर्मी 1>"आयें भाए, तेंदुलकर के भी फादर वल्डकप खेले-हें घडी मर गेले हलाई, उ तो इंडिया वापस आके फिर वापस मैच खेले चल गेले हलई, ऊ (तेंदुलकर) कहाँ बेल मुन्डवैले हलई! फिलिम वालन के कोई मरा हई तो कहियो बेल मुन्ड्वावल देखले ह कोई। इंदरा गांधी मारले हलई तो राजिव गांधी भी तो बेल नइ छिलवैले हलई!
सहकर्मी`3>"एहनिये के चलते तो आज धरम-करम कोई मानत हई!?"
सहकर्मी`4>"ई सब इण्डिया के बरबादी के लच्छन हउ!"
सहकर्मी`"छोड़ न ईयार, हमिन के का लेना-देना ई एस्टार-फेस्टार से।"

सभी फिर मुझपर कृपालु हुवे:
1>"टोपी ऊनी हउ?
मैं >"हाँ।"
1>"पसीना हो जैतऊ, कौटन के खरीद। आराम-देह रह्तऊ।"
2>"ई शहर में बढियां टोपी कहाँ मिल्तऊ, बोस?"
3>"कमल के फोन कर रांची, ए गों बढियां टोपी भेजे ला। दिनभर अईसन टोपी हरजा करतऊ।"
4>"ठहर हम रांची अपन भतीजा कर के बोलत हियऊ'
उन्होंने फोन लगाया और बाज़ार में सस्ता-महंगा, चमड़े से लेकर हर तरह के कपडे की ब्रांडेड-अनब्रांडेड टोपियों को दरयाफ्त कर शाम तक फोन करने को कहा। शाम तक यह जानकारी भी आ गई। 3000-से-50 रूपए तक के टोपियों की...
................

मैं सोच में डूबा हूँ ... कितनी कृपालु, दयालु है ये दुनिया। कितनी फ़िक्र है इन्हें। मेरी हर बात का कितना ख्याल है इन्हें। कितना भाग्यशाली हूँ मैं! लेकिन ये लोग जो खून के रिश्ते में मेरे कुछ भी नहीं। मेरे लिए इतनी सोच भर सही, कुछ तो है इनके पास, जो ये मुझसे शेयर करते है। इनकी हर बात में मेरे लिए एक चिंतन है, एक लगाव है। यही मेरे अपने हैं। सच्चे। बेबाक। सबसे बड़ी बात : हर वक़्त मेरे अंगसंग। जिन्हें चाहो ढूंढो, वो हाज़िर! ये मुझे पहचानते तो हैं! उनकी तरह नहीं जिनके वरिष्ठ, मेरे बाबूजी के भी वरिष्ठ, की म्रत्यु की सूचना तक मुझे बाज़ार से मिली। इतनी चिंता तो उन्हें इस जीवन में तो मेरे लिए होने से रही। मेरे सहकर्मियों-साथियों के इस सिर-फुटौवल में स्नेहपूर्ण हास्य है। न कि कटाक्ष। बाबूजी के असली परिवार यही लोग हैं, जिनके पास मुझे छोड़कर वे विदा हो गए। और शायद यही वो होंगे जो मेरी अंतिम बरात के बाराती भी होंगे। इन्हें तो मैं सदा दिल से लगा कर रखूँगा।

मेरे साथियों को मेरा सेल्यूट!
_श्री .



Sunday, January 27, 2013

वे मुसलमान थे


शरद श्रीवास्तव shared Rajendra Yadav's status.
November 28, 2012/  

कविवर देवी प्रसाद जी कविता। 
बहुत दिनों के बाद किसी कविता ने इस कदर दिल को छुआ की आत्मा तक को झंझोड़ दिया . देवी प्रसाद जी को इस कविता के लिए बहुत साधुवाद और राजेंद्र यादव जी को आभार।
वे मुसलमान थे
 
वे मुसलमान थे
कहते हैं वे विपत्ति की तरह आए
कहते हैं वे प्रदूषण की तरह फैले
वे व्याधि थे
ब्राह्मण कहते थे वे मलेच्छ थे
वे मुसलमान थे

उन्होंने अपने घोड़े सिन्धु में उतारे
और पुकारते रहे हिन्दू! हिन्दू!! हिन्दू!!!
बड़ी जाति को उन्होंने बड़ा नाम दिया
नदी का नाम दिया
वे हर गहरी और अविरल नदी को
पार करना चाहते थे
वे मुसलमान थे लेकिन वे भी
यदि कबीर की समझदारी का सहारा लिया जाए तो
हिन्दुओं की तरह पैदा होते थे
उनके पास बड़ी-बड़ी कहानियाँ थीं
चलने की
ठहरने की
पिटने की
और मृत्यु की
प्रतिपक्षी के ख़ून में घुटनों तक
और अपने ख़ून में कन्धों तक
वे डूबे होते थे
उनकी मुट्ठियों में घोड़ों की लगामें
और म्यानों में सभ्यता के
नक्शे होते थे
न! मृत्यु के लिए नहीं
वे मृत्यु के लिए युद्ध नहीं लड़ते थे
वे मुसलमान थे
वे फ़ारस से आए
तूरान से आए
समरकन्द, फ़रग़ना, सीस्तान से आए
तुर्किस्तान से आए
वे बहुत दूर से आए
फिर भी वे पृथ्वी के ही कुछ हिस्सों से आए
वे आए क्योंकि वे आ सकते थे
वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे कि या ख़ुदा उनकी शक्लें
आदमियों से मिलती थीं हूबहू
हूबहू
वे महत्त्वपूर्ण अप्रवासी थे
क्योंकि उनके पास दुख की स्मृतियाँ थीं
वे घोड़ों के साथ सोते थे
और चट्टानों पर वीर्य बिख़ेर देते थे
निर्माण के लिए वे बेचैन थे
वे मुसलमान थे

यदि सच को सच की तरह कहा जा सकता है
तो सच को सच की तरह सुना जाना चाहिए
कि वे प्रायः इस तरह होते थे
कि प्रायः पता ही नहीं लगता था
कि वे मुसलमान थे या नहीं थे
वे मुसलमान थे

वे न होते तो लखनऊ न होता
आधा इलाहाबाद न होता
मेहराबें न होतीं, गुम्बद न होता
आदाब न होता
मीर मक़दूम मोमिन न होते
शबाना न होती
वे न होते तो उपमहाद्वीप के संगीत को सुननेवाला ख़ुसरो न होता
वे न होते तो पूरे देश के गुस्से से बेचैन होनेवाला कबीर न होता
वे न होते तो भारतीय उपमहाद्वीप के दुख को कहनेवाला ग़ालिब न होता
मुसलमान न होते तो अट्ठारह सौ सत्तावन न होता
वे थे तो चचा हसन थे
वे थे तो पतंगों से रंगीन होते आसमान थे
वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे और हिन्दुस्तान में थे
और उनके रिश्तेदार पाकिस्तान में थे
वे सोचते थे कि काश वे एक बार पाकिस्तान जा सकते
वे सोचते थे और सोचकर डरते थे
इमरान ख़ान को देखकर वे ख़ुश होते थे
वे ख़ुश होते थे और ख़ुश होकर डरते थे
वे जितना पी०ए०सी० के सिपाही से डरते थे
उतना ही राम से
वे मुरादाबाद से डरते थे
वे मेरठ से डरते थे
वे भागलपुर से डरते थे
वे अकड़ते थे लेकिन डरते थे
वे पवित्र रंगों से डरते थे
वे अपने मुसलमान होने से डरते थे
वे फ़िलीस्तीनी नहीं थे लेकिन अपने घर को लेकर घर में
देश को लेकर देश में
ख़ुद को लेकर आश्वस्त नहीं थे
वे उखड़ा-उखड़ा राग-द्वेष थे
वे मुसलमान थे

वे कपड़े बुनते थे
वे कपड़े सिलते थे
वे ताले बनाते थे
वे बक्से बनाते थे
उनके श्रम की आवाज़ें
पूरे शहर में गूँजती रहती थीं
वे शहर के बाहर रहते थे
वे मुसलमान थे लेकिन दमिश्क उनका शहर नहीं था
वे मुसलमान थे अरब का पैट्रोल उनका नहीं था
वे दज़ला का नहीं यमुना का पानी पीते थे
वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे इसलिए बचके निकलते थे
वे मुसलमान थे इसलिए कुछ कहते थे तो हिचकते थे
देश के ज़्यादातर अख़बार यह कहते थे
कि मुसलमान के कारण ही कर्फ़्यू लगते हैं
कर्फ़्यू लगते थे और एक के बाद दूसरे हादसे की
ख़बरें आती थीं
उनकी औरतें
बिना दहाड़ मारे पछाड़ें खाती थीं
बच्चे दीवारों से चिपके रहते थे
वे मुसलमान थे

वे मुसलमान थे इसलिए
जंग लगे तालों की तरह वे खुलते नहीं थे
वे अगर पाँच बार नमाज़ पढ़ते थे
तो उससे कई गुना ज़्यादा बार
सिर पटकते थे
वे मुसलमान थे

वे पूछना चाहते थे कि इस लालकिले का हम क्या करें
वे पूछना चाहते थे कि इस हुमायूं के मक़बरे का हम क्या करें
हम क्या करें इस मस्जिद का जिसका नाम
कुव्वत-उल-इस्लाम है
इस्लाम की ताक़त है
अदरक की तरह वे बहुत कड़वे थे
वे मुसलमान थे

वे सोचते थे कि कहीं और चले जाएँ
लेकिन नहीं जा सकते थे
वे सोचते थे यहीं रह जाएँ
तो नहीं रह सकते थे
वे आधा जिबह बकरे की तरह तकलीफ़ के झटके महसूस करते थे
वे मुसलमान थे इसलिए
तूफ़ान में फँसे जहाज़ के मुसाफ़िरों की तरह
एक दूसरे को भींचे रहते थे
कुछ लोगों ने यह बहस चलाई थी कि
उन्हें फेंका जाए तो
किस समुद्र में फेंका जाए
बहस यह थी
कि उन्हें धकेला जाए
तो किस पहाड़ से धकेला जाए
वे मुसलमान थे लेकिन वे चींटियाँ नहीं थे
वे मुसलमान थे वे चूजे नहीं थे
सावधान!
सिन्धु के दक्षिण में
सैंकड़ों सालों की नागरिकता के बाद
मिट्टी के ढेले नहीं थे वे
वे चट्टान और ऊन की तरह सच थे
वे सिन्धु और हिन्दुकुश की तरह सच थे
सच को जिस तरह भी समझा जा सकता हो
उस तरह वे सच थे
वे सभ्यता का अनिवार्य नियम थे
वे मुसलमान थे अफ़वाह नहीं थे
वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे
वे मुसलमान थे

-देवी प्रसाद

Friday, January 25, 2013

झूठे गैंग-रेप का आरोप. एक रवायत को आमंत्रण!?!?

पद्मभूषण सम्मान की झड़ियों में स्वर्गीय प्रिय राजेश खन्ना को मरणोपरांत पद्मभूषण सम्मान की घोषणा से जहां ख़ुशी हुई वहीँ दिल में एक डर घर कर गया है:_

एक ज़माने में दहेज़ का लिए बहुओं को जलाने और मार डालने की खतरनाक रवायत बन गई थी। जिससे पूरा देश आहात था। उस समय 'विजय-विकास' सीरिज़ के जासूसी उपन्यासों के रचयिता श्री वेद प्रकाश शर्मा ने एक सामाजिक-थ्रिलर उपन्यास की रचना की थी-"बहु मांगे इन्साफ"; जिस पर हिंदी फिल्म भी बनी थी। बाद में कुछ घटना क्रम ऐसे हुए जिसमे ये हौलनाक सच सामने आया कि दुर्भावना और पूर्वाग्रह से ग्रसित मानसिकता वाली लड़कियों-दुल्हनों ने झूठे दहेज़ प्रताड़ना का आरोप लगा कर कई निर्दोष लड़कों-युवाओं को जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया। धीरे-धीरे ऐसे झूठे आरोप आम होनें लगे। ऐसे ही भयावह झूठ पर श्री वेद प्रकाश शर्मा ने दहेज़ आधारित अपराध पर एक नए उपन्यास की रचना की जिसमे कैसे एक दुल्हन ने झूठे दहेज़ के आरोप में एक परिवार को बर्बाद कर दिया। वो उपन्यास था -'दुल्हन मांगे दहेज़'; जिसे पढ़कर अभी भी सिहरन होती है। आज इस उपन्यास की याद आने की एक वजह है।

हालिया दिल्ली गैंग-रेप कांड, जिसमे 'दामिनी' की जान गई; और जिससे अभी भी हम सभी देशवासी थर्राये हुए हैं, जिसके वजह से दिल्ली पुलिस काफी सक्रीय हो चुकी है; क़ानून की आखें भी इस जघन्य कांड से चुंधियाई हुई हैं; गणतंत्र दिवस की पूर्व सन्ध्या पर देश को संबोधित करते भारत के माननीय राष्ट्रपति श्रीमान प्रणब मुखर्जी महोदय ने भी अपनी संवेदना प्रकट की और कई हिदायतें दीं; ऐसे हालात में  _आज एक लड़की ने दिल्ली में कुछ युवकों को झूठे गैंग-रेप के आरोप में फंसा दिया। फिर बाद में मुकर गई। उसने बताया कि उन युवकों में से एक ने उससे शादी का वादा करने बाद भी शादी नहीं की इसी से कुढ़कर उसने ये 'झूठा' आरोप उन पर मढ़ दिया था! 

लगता है अब झूठे गैंग-रेप का आरोप एक रवायत बनने जा रहा है।

कितने फंसेंगे,कितने मरेंगे? गंभीर सवाल है।

ज़रा सोचिये।

_श्री . 25-01-2013/Ldga.


Thursday, January 24, 2013

सुरेन्द्रमोहन पाठक के अमर बोल

निम्नलिखित बातें वो बातें हैं जिन्हें पाठक सर ने रचा है, और जो अक्सर मेरी जुबान से भी अब निकलने लगा है। जिनमे से कुछ चुनिन्दा लाइनें मैं सभी मित्रों के साथ शेयर करना चाहता हूँ। जिन्होंने पाठक सर के उपन्यास पढ़े हैं उन्हें इनसे जरूर इत्तेफाक होगा। हो सकता है मेरे किसी मित्र ने पहले भी इसका जिक्र कर शेयर किया होगा, फिर भी मैं चाहूँगा कि इसे आप पढ़ें। ये वो लाइनें हैं जिसने अपनी बात को अभिव्यक्त करने में मुझे सक्षम बनाया, जो मेरी अभिव्यक्ति को शब्द प्रदान करते है। इन्हें किसी उपन्यास में यदि आपने पढ़ा है या अभी पढ़ रहे हैं तो निश्चित ही वह श्री सुरेन्द्रमोहन पाठक सर की रचना है। पाठक सर के ये शब्द और वाक्य अब एक अमर बोल बन चुके हैं। मेरे किसी मित्र को ये पढ़ कर कुछ और याद आये जिसे इसमें जुड़ा होना चाहिए, तो प्लीज़ मेरी जानकारी में लायें।1985 में जब मैं दिल्ली के एक कोचिंग इंस्टिट्यूट में पढ़ता था। उस समय हमारा इंस्टिट्यूट करोल बाग़ के सामने 5-B पूसा रोड पर स्थित था। तब होस्टल में मेरे रूम मेट हरमिंदर सिंह कालरा (जो सिक्ख हैं, काफी वक़्त से संपर्क में नहीं हैं, MBBS डॉक्टर हैं) बिजनौर के रहने वाले थे। उनसे उस वक़्त की मेरी घनिष्ठता मुझे याद है, वे मुझे पंजाबी सिखाते थे और मैं उन्हें भोजपुरी। तक़रीबन उसी समय मेरी रूचि पाठक सर के उपन्यासों से हो चुकी थी। पंजाबी बातचीत, सवाल-जबाब को हिंदी में पढने पर जो आनंद आता है उसे शब्दों से व्यक्त नहीं कर सकता। खैर इन्हें पढ़िए: सुरेन्द्रमोहन पाठक के अमर बोल:

1. जेनेरल एक्सप्रेशंस :>>> पढने में सिर्क एक वाक्य हैं, पर कहानी (अगर आप पढ़ रहे हैं तो) के सन्दर्भ में इनके बहुत बड़े मायने होते हैं। इससे साफ़ ये अंदाजा हो जाता है कि 'लेखक' को हयूमन साइकोलोजी की कितनी तगड़ी पहचान, और औए पेश कने के ये कितने बेमिसाल अंदाज़ हैं!!>>>
>वह सन्न रह गया।
>वो हिचकिचाया।
>वो सकपकाया।
>वह हकबकाया।
>वह भौंचक्का रह गया।
>उसने बेचैनी से पहलु बदला।
>उसने आहात भाव से देखा।
>उसका चेहरा कानों तक लाल हो गया।
>वह मूछों में मुस्कुराया।
>प्रत्याशा से उसका दिल उछला।
>वो जैसे आसमान से गिरा।
>कोई हौले से हंसा।
>उसने नाक से धुंवे की दोनाली छोड़ी।

2. रमाकांत की उक्तियाँ :>>>
>"आओ जी।जी आया नूं। रक्खो" ...क्या? .."ओ, तशरीफ़!"
>"चल भई, तेरी रोटी शोटी करिए।"
>"ओए, की नां ए तेरा। एद्दर आ।"
>"सोचन ते दयो मालको।"
>"तो हो जाय एक-एक पैग अमरीकसिंह काले बिल्ले नूं!"
>"खुश कित्ता ई मित्रा।"
>"ओ! गोल्ली किद्दि ते गैनें (गहनें) किद्दे, बादशाहों!"
>"यारां नाल बहारां मेले मित्रां दे।"
>"लो जी, हौर सुनो।"
>"माइंयवा, अन्ने कुत्ते हिरणा दे शिकारी।"
>"जुलाहे दियां मस्खारियाँ माँ-भैन नाल।"
(ऐसे मौकों पर सुनील की हंसी छूटती है तब रमाकांत कहता है):
सुनील हंसा।
>"हस्स्या ई कंजर।"
सुनील और जोर से हंसा।

3. इंस्पेक्टर प्रभुदयाल का कथन (सुनील को):>>>
>"मुझे मेरा धंधा सिखाने की कोशिश मत करो।"

4. विमल के उद्गार:(गुरुवाणी):>>> [ ये यादाश्त से लिखा है, त्रुटियों की संभावना है। कृपया सही स्पेलिंग हिंदी की लिपि में बताएं।]
>"वाहे गुरु सच्चे पातसाह, तू मेरा राखा सबनि थानी।"
>"दीनदयाल दयानिध दोखन, देखत है पर देत न हारे।"
>"सुरा सोई पहिचानिए जो लड़े दीन के हेत। कबहूँ न छाड़े खेत सुरा सो ही।"
>"बांह जिना दी पकड़िये, सिर दीजै बांह ना छडिये।"
>"भय काहू को देत नहीं नहीं, नहीं भय मानत आहीं।"_'खालसा न किसी को डराता है, न ही किसी से डरता है।'
>"कुछ न कहने से भी छिन जाता है ऐजाज़े सुखन। ज़ुल्म सहने से भी ज़ालिम की मदद होती है।।"
>''सिर दीने सिर रहत है, सिर राखे सिर जाए।''
 >"देहु शिवा वर मोहि ईहै शुभ कर्मन तें कबहूँ न टरौं, न डरों अरिसो जब जाई लरौं निसिचै करि अपनी जीत करौं। जब आऊ की अउध निदान बनै अथि ही रण में तब जूझि मरौं!!''

...अभी और भी कई ऐसी ही ओजस्वी वाणी हैं, जो अभी याद नहीं आ रही।
फिलहाल, नमस्ते।
_श्री .
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ps : इस लेखन में जिन पंक्तियों को लाल किया है। उसने आज मुझसे बिछड़े मेरे मित्र, मेरे भाई डॉक्टर हरमिंदर सिंह कालरा मिल गए। सोशल मीडिया के माध्यम से इस लेख को facebook पर शेयर किया, fb-Friend श्री हरमिंदर छाबरा जी डॉक्टर एच एस कालरा मेरे मित्र के जीजाजी निकले; जिनसे मुझे डॉक्टर कालरा का पता मिला; यूँ भगवती भवानी ने बिछड़े मेल कराये। सभी का शत-शत-नमन।

Wednesday, January 23, 2013

मैंने निश्चय कर लिया है

मैंने निश्चय कर लिया है कि अब अपने कुछ मित्रों के पठान-पाठन से सबक लेकर कुछ कालजयी रचनाओं को पढने और कुछ सीखने का। इसलिए शायद अब इस ब्लॉग पर मैं कम ही पोस्ट रखूँगा। आत्मविश्लेषण के लिए स्वयं को पहचानने की आवश्यकता है। मुझे मेरी भूलों का अंदाजा हो रहा है। मेरा सोचना ठीक निकला। दुनिया प्यार- मोहाब्बत और दिलवालों से भरी पड़ी है। उनमे से जो भी चुनोगे हीरे-मोती ही मिलेंगे। फिर अपनी हांकने से पहले सामने फैले विशाल ज्ञान के भण्डार जो अनमोल रचनाएं हैं उन्हें पढ़े बिना कुछ कहना करना नादानी होगी। संभल कर चलने में ही गति है। और यही संभलने का सही वक़्त है।
........
_श्रीकांत तिवारी .

Baadsha Said :


थैंक्स डिअर! तुम्हे क्या लगता है, मुझे अपने लेखन में जारी रहना चाहिए?

Baadsha Said : Baadsha Said : > bilkul... 100% jari rehna chahiye. mujhe aapki lekhani bahut achchi lagti hai. bhasha pe aapki jo pakad hai woh bahut hi majboot hai. aur aap jo beech-beech mein apni lekhani mein ek akkhadpan/tethpan dalte hain to aur bhi achcha lagta hai. mujhe yakeen hai ki dhire-dhire aur log aapki lekhani se wakif hoyenge aur pasand bhi karenge.

 मुझे कुछ ऐसे ही उत्तर की अपेक्षा थी। तुम्हारे इस सहयोग और भरोसे का शुक्रिया।
_________________________23`FEB`13
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  • Niloy Ranjan Chakraborty Kya kahoon??? Main pahle hi kah chuka hoon ki apki lekhani aur hindi bhasha per apki pakad bahut achchi hai. Aapke ka likha hua padhna achcha lagta hai. Yeh bi achcha laga halanki main kuch baaton se ittefaq nahi rakhta lekin aap is lekh mein pehle hi bataa chuke hain ki yeh aapke mann ki hai aur main is baat ki izzat karta hoon.
  • श्रीकांत तिवारी पुत्तर जी ! प्लीज, एक्सप्लेन! अच्छी कमेंट प्रोत्साहित कर मार्गदर्शन कराती है। निष्पक्ष बेबाक कमेंट रास्ते पर लाती है। मैं भटकना नहीं चाहता इसलिए जिन बातों से तुम इत्तेफाक नहीं रखते उन्हें मेरे साथ यदि ओपन्ली नहीं तो -(मेसेज बॉक्स)- के थ्रू या और माध्यम...See More
  • Niloy Ranjan Chakraborty Mama, main jaldi bataoonga. Woh kya hai ki mujhe likh kar apni baat bataane me waqt lagega. Mujhe likhne ki aadat jo nahi hai. Lekin kuch aisa serious nahi hai. Aapke lekh ki mool baat se main jaroor ittefaq rakhta hoon.
  • श्रीकांत तिवारी जल्दी बताना पुत्तर जी, सस्पेंस से जान निकली जा रही है।


  • 05:57PM Ldga/Jh/India.23`01`2013
    बादशा..........!  इसे पढो। क्या यही बात है, जो तुम कहना चाहते हो :>
    ...कोई जब तरक्की उन्नति कर ऊंचे पायदान पर कदम रखता है तो वहाँ के नए और पहले से ही फले-फूले उन्नत समाज से उसका सामना होता है। अब चूंकि वही उसकी दुनिया है तो जाने-अनजाने या विवशता से उसे वहाँ के कल्चर, ट्रेडिशन और तौर-तरीके को अपनाना ही पड़ता है, क्योंकि इसके बिना उसकी गति नहीं। कोई छोटे से शहर से बड़े शहर जाता है तो अपनी इच्छा के खिलाफ जाकर भी उसे वहाँ के शहरी जीवन को अपनाना ही पड़ता है, क्योंकि इसके बिना वहाँ उसकी गति नहीं। इसी तरह कोई छोटा कलाकार अपनी कला के दम पर बड़े और पहले से ही बुलंदी के मंचों पर आसीन, पूर्वस्थापित और बुलंद कलाकारों की जामात में जाकर मिलता है तो उसे अपनी कलात्मक रूचि के कारण उनके साथ स्वाभाविक तारतम्य स्थापित करना ही पड़ता है, या हो ही जाता है। और आज के आधुनिक युग में भाषा के आधार पर यूँ छटनी-करण ठीक नहीं जैसा की मैंने भोजपुरी कलाकारों के इंग्लिश ज्ञान पर कटाक्ष कर दिया है। अमिताभ बच्चन के पिताजी तो हिंदी भाषा के साहित्यकार होने के बावजूद विदेश से पी.एच.डी. करते हैं  However from 1941 to 1952 he taught in the English Department at the Allahabad University and after that he spent the next two years at St Catharine's College, Cambridge, Cambridge University doing his doctoral thesis on W.B. Yeats. Harivanshrai’s thesis got him his PhD at Cambridge. तो ऐसे पारिवारिक वातावरण में साहित्य की उपासना तो होगी ही। चाहे वो किसी भी भाषा में हो। भाषा का बैरियर लगाकर किसी की खिल्ली उड़ाना ठीक नहीं। आज का भोजपुरी कलाकार अगर भोजपुरी गाते हुए कभी इंग्लिश बोलता है तो इसमें क्या बुराई है। ऐसा करके उसने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया जो मैंने उनके बारे में तल्ख़ बातें लिख दीं जो मुझे उच्च विचार का नहीं बल्कि संकीर्ण विचार का व्यक्ति साबित करती है। अमित जी और बॉलीवुड के सितारे इंग्लिश बोलें तो ठीक; भोजपुरी वाले बोल दिए तो गलत!?_ये ठीक नहीं। और चूँकि तुम मुझसे प्यार करते हो सो तुम्हें मुझसे ऐसे कमेंट्स की उम्मीद नहीं थी। तुम चाहते हो कि मैं अपने विचारों को भले हिंदी में लिखता हूँ, लेकिन इसके साथ ही मुझे अपनी सोच को व्यापक करना होगा। सबके लिए, सभी भाषा के लिए सम्मान का नजरिया रखना होगा तभी कोई बात बन पाएगी, अन्यथा मेरी दुसरे लोग ऐसी आलोचना करेंगे कि मुझे वापसी का दरवाज़ा ही देखना पड़ेगा। क्योंकि लेखन क्षेत्र में ऐसे संकीर्ण विचारों के लिए कोई जगह नहीं। और यही बात कांटे की तरह मेरे अपने अजीजों को भी चुभेगी कि आज दौर में भी मैं इतना पढ़-लिखकर अपनी सोच इतनी छोटी रखता हूँ। ___यही बात थोडा दर्द दे गई। है न पुत्तर जी?
    अब देखो उपरोक्त भी तो मैंने ही लिखा है ना! मेरी अपनी ही बातों में कितना विरोधाभास है। पर यह बात तुम्हारे ज़रा सा हिंट देते ही मेरे लिए चुनौती बन गई; फलतः मैंने अपने "...मन की" को सुधारा तो नहीं; उसके बदले एक नई पोस्ट की रचना की ताकि ये रिकार्ड रहे। मुझे तुरंत ही पूरा अहसास हो गया कि कहाँ चूक हुई है!! अभी तो मैंने ऊँगली पकड़कर चलना शुरू किया है, इसलिए मुझे चाहिए कि मैं अभी और अध्ययन कर लूं।
    मैंने पहले ही कहा है जिस मन से प्रशंशा सुनते हैं, उसी मन से आलोचना भी सुननी चाहिए। इसीलिए तो आपको दोस्त माना है, प्यारेलाल।
    _श्री . 


    Thursday, January 24, 2013

    Srikant Mama,

    जिन से तुम इत्तेफाक नहीं रखते वो बतलाने वाले थे, मैं प्रतीक्षा में हूँ।


    Srikant Mama,
    Main aapke mool baat, jispe aapne yeh lekh likha hai, se puri tarah sahmat hoon. Hindi bolne aur likhne walon ko nichi nazar se dekhne waale log khud apne mansik diwaliyepan ka parichay dete hain. ismein koi do raiy nahi ki aise log padhe likhe ganwar hote hain jo khud ko intellectual samajhte hain, lekin asal mein agyani hote hain.
    khair yahan ye jawab likhne ka karan yeh hai ke main aapke do baaton se asahmat hoon.
    1. angreji aksharawali ke akshar ko hindi likhne ke liye istemal karna kahin se bhi hindi ka apman nahi hai balki yeh to samman ki baat hai ki apke paas angreji akshar rahne ke bawjood aap unka istemal hindi likhne mein kar rahein hain. Aaj kal ke bhag daud ke is daur mein hamesha hindi aksharawali mein likh pana mumkin nahi ho sakta, khas kar aap jab electronic samaan istemal karte hon. yeh baat to aap bhi manenge ke hindi mein type karna angreji mein type karne se jyada mushkil hai aur waqt bachane ke liye bahut baar aisa karna padta hai. main to hamesha hi yeh karta hoon kyonki pehli baat to mere computer pe hindi fonts nahin hai, jo ki main asani se rakh sakta hoon, aur doosri baat hindi type karne mein thoda samay to lagta hai kyunki uski practice nahi hai. ab aap kah sakte hain ki yeh kaunsi badi baat hai, practice karlo. lekin mera kaam aisa hai ki mujhe angreji mein hi hamesha type karna padta hai aur agar main hindi practice karron to mere liye apne ungliyon mein samanjasya baithana mushkil ho jaige. duniya mein shayad bahuit kam typist honge jo alag alag bhashaon mein utni hi asaani se type kar lete hain. Main bas yahi kahna chahta hoon ki bahut log aisa hindi ka apmaan karne ke liye nahi balki majboori mein karte hain.

    2. Doosri baat jisse main sahmat nahi hoon, woh apka yeh kehna ki ab aap angreji sikh nahin sakte. mujhe maloom hai ki aap angreji samajh bol lete hain, phir bhi main yeh kahoonga ki sikhne ke liye to koi umar nahin hoti. hindi ka man samman apni jagah hai aur rahega lekin angreji sikhne se hindi ka man samman nahi chala jayega. jaise hindi hamari rashtrabhasha hai aur hamein yeh aana chahiye waise hi is yug mein tarraki ke liye angreji aanaa bahut jaroori hai. yeh globalization ka zamana hai aur aap apne aapko ek jagah baandh ke nahin rakh sakte hain. aapko aage bdhna hai to yeh bhashaa to sikhni padegi. apni bhashaa jante hue kuch aur bhashayein sikhne mein koi burai to nahi hai. aur sikhne ki koi umar nahi hoti. main isliye bhi yeh kah raha hoon ki agar kisiko angreji ka gyan nahin hai to use higher studies karne mein bahut pareshani hogi kyunki aage ki padhai ke liye jaroori kitabein shayad hi aapko hindi mein milengi. kahin bahar jakar naukri karne mein bahut pareshani hogi. duniya ke alag alag hisson ko samajhne mein bahut pareshani hogi.
    bas wahi lik raha tha
    main bas yehi kehna chah raha tha ki koi bhi cheez agar sikhne mile to sikhna chahiye aur uski koi umar to hoti nahi hai. isliye aapka yeh kehna ki aap sikh nahi sakte se main sahmat nahi hoon.

    kuch amitji ki ke baare me kahi baaton se bhi main sahmat nahi hoon per woh baatein discuss karna jaroori nahi hai.
    Chat Conversation End.
    थैंक्स डियर! 100% agreed !! एक बात साफ़ कर दूं जो कि असलियत है :_"मुझे हिंदी टाइपिंग बिलकुल नहीं आती। हिंदी मैंने सीखा ही नहीं है, न ही इसकी ट्रेनिंग ली है।_"  "ये सब मेरे ब्लागस्पाट पर कम्पोजिंग करते समय खुद हो जाता है, वर्ना मेरे सामने भी वही मजबूरी है जो तुम्हारे सामने है। मैंने बताया हुआ है कि पहले इसकी उपलब्धता न रहने के कारण मुझे भी बातें इंग्लिश keyboard पर ही ठोकनी पड़ती थी। जबसे google  पर अपना ब्लॉग मैंने बनाया है तो उसमे ये सुविधा है कि  '-जब इंग्लिश कीज़ पर हिंदी के शब्दों को टाइप किया जाता है तो वो ऑटोमेटिकली "देवनागरी" में प्रकट हो जाता है। ऐसा होता पाकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई कि अब ऐसे softwares उबलब्ध हो गए हैं। जिसे प्रयोग में लाने से अपनी मातृभाषा के शब्द देवनागरी लिपी में आसानी से लिखे जा सकते हैं। बस जरूरत है स्पेलिंग के लिए सही कीज़ पंच करना। बाकी अपने-आप हो जाता है। पर अफ़सोस  है कि इसे DOWNLOSAD करके INSTALL नहीं किया जा सकता।"
    और ये सच्ची बात है प्यारे, कि मैं स्पोकन इंग्लिश नहीं सीख पाऊंगा। मैं थोडा कमज़ोर स्टूडेंट रहा हूँ। स्कूल में मुझे इंग्लिश में 100 में 80 नबर आते थे वो और बात है पर प्रैक्टिकल लाइफ में इसे बोलना पड़ा तो मैं असक्षम सिद्ध हुआ। """खफा होकर मैंने अब अंग्रेजी को गरियाना शुरू किया ऐसी बात नहीं है। वो दूसरे ज़ज्बे की बात है जो राष्ट्रभाषा के समर्थन में मैंने अपनी आवाज़ लगाईं है।""" इंग्लिश बोलना सीखने की तमना मेरी तभी पूरी हो पाएगी जब मैं इंग्लिश वातावरण में इंग्लिश बोलने वालों की संगत में 1-2 साल समय बिताऊं। ऐसा हो नहीं पायेगा। यही मेरी मजबूरी है। इसीलिए मैंने कहा की अब मैं अंग्रेजी सीख नहीं सकता।

    मैंने अपने बच्चों को खुद इंग्लिश सिखाया ताकि वो आगे बढ़ सकें। मैंने लोहरदगा में स्पोकन इंग्लिश कोचिंग इंस्टिट्यूट की स्थापना की थी ताकि अपने शहर में इसे बढ़ावा दूं; लेकिन एक वाहियात गद्दार ने मुझे ऐसा धोखा दिया जिसके ज़ख्म अभी भी ताज़ा हैं, जिसके कारण मेरे पुत्र सामान कमल को ताजिंदगी शर्मिंदगी का भागी बनना पड़ा। मैंने अपने इंस्टिट्यूट में खुद गद्दी की नौकरी करते हुए 6-महीने विद्यार्थियों को इंग्लिश-ग्रामर की शिक्षा दी जिसे जारी रखने का प्रयास किया (जिद्द किया) जो खेद है, मुझसे पूरा न हो सका। अंततः मुझे इंस्टिट्यूट बंदकर लाखों रुपयों का नुक्सान झेलना पड़ा। मैंने पहले ही कहा मैं तुम्हारी बात से 100% सहमत हूँ। मैं बच्चों को हमेशा हरदम ये कहता हूँ कि अपने सपने सच करने हैं तो इंग्लिश, गणित और साइंस(विज्ञान) पर अपनी मज़बूत पकड़ बनानी ही होगी, एक समय कम खाओ पर अपनी जिद्द मत छोडो। इंग्लिश ग्लोबल लैंग्वेज है इसे अपनाए बगैर तरक्की मुमकिन नहीं। मुझे ख़ुशी है कि जिम्मी, सन्नी ने ऐसा कर दिखाया लेकिन लड्डू (बेचारा) भाइयों के बाहर चले जाने के कारण अकेला पड गया। थोडा नहीं बहुत कमज़ोर है। और इंग्लिश इसकी सबसे बड़ी समस्या है। अब 1-महीने के बाद इसकी 10वीं बोर्ड की परीक्षा है। 
     उम्मीद करता हूँ आगे भी तुम्हारा समर्थन और प्यार मेरे प्रति बना रहेगा। सुप्रिया ने लेख पसंद किया, उसका कमेंट उत्साहवर्धक है, ठीक उसी तरह जैसे तुम्हारा। थैंक्स अगेन!