Monday, December 31, 2012

अलविदा 2012

 लोहरदगा,  31, दिसंबर, सन 2012   दिन : सोमवार     अभी सुबह के 08:15 बजे हैं       
(दैनिक हिन्दुस्तान में छपे पूर्व राज्यपाल श्री गोपाल कृष्ण गांधी के लेख से ...)
यह साल अब चंद घंटों का मेहमान है। यह हमारे आपके लिए कुछ बेहतर हो सकता था, लेकिन इसीतरह यह कहीं बदतर भी हो सकता था। हमें इस साल किसी जंग से दो चार नहीं होना पड़ा और न ही हमें भयानक सूखे या बाढ़ का शिकार बनना पड़ा, जो लाखों की तादाद में लोगों को उजाड़ देती है। इस वर्ष हमारा साबका सुनामी जैसी कुदरती आपदा से भी नहीं पड़ा, जो सैकड़ों जिंदगियां ख़त्म कर देती है और अनगिनत लोगों को उनकी जड़ों से उखाड़ फेंकती है। इस साल हम किसी महामारी की चपेट में आने से भी बचे रहे। हम 1966 की 'कंचनजंगा' विमान दुर्घटना जैसे हादसों का शिकार बनने से भी इस वर्ष दूर रहे। उस दुर्घटना में होमी जहाँगीर भाभा समेत सौ से अधिक लोग मारे गए थे। यह साल 1985 जैसा दुखद वर्ष बनने से भी बच गया, जब एयर इंडिया का विमान-182 'कनिष्क' उड़ान के दौरान हवा में ही विस्फोट का शिकार हो गया था और उसमे मशहूर केमिकल इंजिनियर वाई नयुदम्मा समेत 329 जिंदगियां हमेशा के लिए हमसे बिछड़ गईं थीं।

2012 इस लिहाज़ से भी खुशकिस्मत रहा कि इसे 1981 में बिहार में बागमती नदी पर हुई भीषण रेल दुर्घटना जैसी त्रासदी या फिर 1991 के गैसल व 1995 के फिरोजाबाद रेल हादसे जैसे हालात का सामना नहीं करना पड़ा। इन दुर्घटनाओं में सैकड़ों मुसाफिर काल के ग्रास बन गए थे। उनमे से न जाने कितने अपने काम जाने के लिए निकले होंगे, कितने काम की तलाश में जा रहे होंगे और कितने ही तीर्थयात्रा पर रहे होंगे। इस साल हमें 2004 के कुंबकोणम अग्निकांड सरीखे दर्दनाक हादसे हादसे की पीड़ा नहीं भोगनी पड़ी, जिसमे 91 स्कूली बच्चे जिंदा जल गए थे या फिर पिछले साल की कोलकाता के एम्री हॉस्पिटल जैसी दुर्घटना से भी हम सुरक्षित रहे, जिसमे 73 मरीज़ व उनकी देखभाल करने वाले लोग जलकर या धुएं की घुटन से मारे गए थे। इस साल ने हमें राजनीतिक हत्याओं से दूर रखा, 26/11 जैसी त्रासदियाँ नहीं हुईं। और खुदा का शुक्र है कि देश के विभिन्न इलाकों में तनावों के बावजूद 2002 जैसे दंगों से हमारा सामना नहीं हुआ।

हम इन सबके लिए इस साल का शुक्रिया अदा कर सकते हैं। नकारात्मक राहत भी कम सुकूनदेह बात नहीं है। लेकिन क्या दर्द का न होना ख़ुशी की आमद है? नहीं ! सियासत ने हमें इस साल कोई तसल्ली नहीं पहुंचाई। वैसे राजनीति कभी खुशियाँ बाँट सकती है? यह कुछ अविश्वसनीय-सा भले महसूस हो, मगर इस प्रश्न का जबाब है - हाँ, सियासत ऐसा कर सकती है।

यदि राजनीतिक पार्टियाँ लोकपाल बिल पर एकराय बना पातीं तो देश के लोगों को खुशियाँ मिलतीं। सगर सियासी जमातें यह कहतीं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग हमारी पहली प्राथमिकता है और वे अपने-अपने संगठन के भीतर के भ्रष्ट लोगों के खिलाफ कोई पहल करती हुई दिखतीं, तो यकीनन देश को ख़ुशी होती। राजनीतिक दलों ने यदि यह भी बताया होता कि वे चुनाव खर्च के बारे में निर्वाचन आयोग के दिशा-निर्देशों का ईमानदारीपूर्वक, जिम्मेवारी व पारदर्शिता के साथ पालन करेंगे, तो उनका यह आचरण देश को प्रसन्न करता।

यदि हमारी संसद ने तीन तरह के अवैध गतिविधियों को रोकने के लिए कोई ठोस उपाय किया होता, यानी काल धन, अवैध खनन और गैरकानूनी हथियारों के खिलाफ वह कोई सार्थक कदम उठा पाती, तो देश को जरूर ख़ुशी मिलती। यदि हमारे सांसदों ने सदन की कार्यवाही को बाधित करने और उसका बहिष्कार करने की बजाय सत्ता पक्ष के आगे असुविधाजनक सवाल उछाले होते, तो देश को संतोष होता। लेकिन क्या हमारी संसद ने वैसा काम किया, जैसा उसे करना चाहिए था? यदि वह सचमुच नियमित बैठकें करतीं, मसलों पर गंभीर बहस करती, संजीदा क़ानून बनाती, तो देश जरूर खुश होता।

यदि नई पीढ़ी की राजनीति करने वाले युवा नेताओं ने चापलूसी की बजाय वफादारी के नए युग की शुरुआत की होती, घनिष्ठता की जगह बेबाकी व अवसरवादिता की बजाय सेवा की भावना दिखाई होती, तो देश को प्रसन्न होने का मौक़ा मिलता। राजनीति क्षेत्र ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। लेकिन सच्चाई यह भी है कि जिस तरह हम सभी नागरिकों को एक खाँचे में नहीं रख सकते, वैसे ही सभी राजनेताओं को अक ही ब्रश से पेंट नहीं कर सकते। हम और राजनीतिक वर्ग, दोनों ही एक-दुसरे को नीचे ले जा रहे हैं।

जहां राजनीति ने 2012 में हमें निराश किया, वहीं प्रतिस्पर्धाओं से भरे एक अन्य क्षेत्र ने देश को जश्न मनाने के पल दिए और वह क्षेत्र है - खेल। विश्वनाथन आनंद ने जहां विश्व चैम्पियन का ताश अपने नाम बरकरार रखकर हमारे आहात मन के लिए मरहम जुटाया, तो वहीं इस साल के ओलंपिक में मैरीकोम ने बॉक्सिंग, साइना नेहवाल ने बैडमिन्टन में कांस्य पदक जीतकर हमारी ज़िन्दगी में चमक बिखेरी।

खेलों का हमारी ज़िन्दगी पर कितना असर है, इसे हम अक्सर कम करके आंकते हैं। इस महीने की शुरुआत में नीलगिरी की पहाड़ियों के बीच बने एक खूबसूरत स्कूल विद्या वनम में जाने के विषय में पूर्व गवर्नर साहब ने लिखा है कि वे वहाँ गए थे, जिसके बारे में इन्होने बताया है कि :इसमें पढने वाले साठ फ़ीसदी बच्चे ईरुला जनजाति के हैं। उन्हें तमिल और अंग्रेजी में पढ़ाया जाता है और वे हिंदी भी काफी कुछ समझते-जानते हैं। गवर्नर साहब ने उनसे एपीजे अब्दुल कलाम की तरह सवाल किया, 'आप क्या बनना चाहते हैं?' कई हाथ ऊपर उठ आए। उन्हें लगा कि जिस तरह कलाम साहब को जवाब सुनने को मिलते थे, वैसे ही उत्तर उन्हें भी सुनने को मिलेंगे - डॉक्टर, इंजिनियर, आईटी एक्सपर्ट, वैज्ञानिक, कभी-कभी राजनेता। लेकिन नहीं। बेहद सधी हुई अंग्रेजी में एक बच्चे ने कहा - सर, फुटबॉल प्लेयर बनना चाहता हूँ। गवर्नर साहब ने पूछा, 'आपका पसंदीदा फुटबॉलर कौन है?' उसने कहा - 'मैसी।' एक और बच्चा गवर्नर साहब के करीब आया। उसने कहा कि वह वौलिबौल खिलाड़ी बनना चाहता है। तीसरे का जवाब सुनकर गवर्नर साहब चौंक-से गये। 'सर, मैं पक्षी विज्ञानी बनना चाहता हूँ। मुझे सालीम अली जैसा बनना है।' गवर्नर साहब को अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ - सालिम...? एक बच्ची ने कहा - मैं डांसर बनना चाहती हूँ। उस छोटी-सी लड़की के भीतर एक बालसरस्वती, एक रुकमिणी देवी थीं। शायद आगे चलकर उसके भीतर से कोई विश्वविख्यात संगीतकार निकले।

उस स्कूल में एक प्रदर्शनी लगी थी, उसमें हिंदी का भी एक स्टाल लगा था। एक हिंदी पोस्टर के पास खड़ी लड़की से गवर्नर साहब ने पूछा - 'व्हाट इज योर नेम?' उसने गवर्नर साहब की तरफ देखा और बगैर किसी हिचक के कहा - 'मेरा नाम दिव्या है।' एक तमिल लड़की के मुँह से खड़ी बोली हिंदी सुनकर गवर्नर साहब, बताते हैं की उन्हें लगा, - 'मुझे सामंजस्यवादी शक्ति का एहसास हुआ। लम्बे अंतराल के बाद उन्हें ऐसा अनुभव हुआ था। उन्होंने अपने-आप से कहा कि - ये बच्चे ही असली भारत हैं।'     - गोपालकृष्ण गांधी .


इस लेखमाला के लिए श्री गोपाल कृष्ण जी गांधी (पूर्व गवर्नर; पश्चिम बंगाल) एवं दैनिक हिन्दुस्तान का मैं ह्रदय से आभारी हूँ। इस लेखमाला से ही मुझे आज फिर से सीखने को मिला कि - "नकारात्मक राहत भी कम सुकूनदेह नहीं है। तथा "इस साल ने हमें कई खुशियाँ और नीराशायें दीं, लेकिन अगर आप इस देश के बच्चों से मिलें, तो आपको लगेगा कि उम्मीद पालने के लिए अभी बहुत कुछ है।

इस वर्ष हमने न जानें कितने ही रत्नों को हमेशा के लिए खो दिया, उनके प्रति अपनी हार्दिक संवेदना के प्रति यही कहना चाहूँगा कि हम इस देश और इसकी जनता के लिए किये गए उनके महान कर्मों एवं अभूतपूर्व अमर योगदान को और उनके द्वारा समर्पित असंख्य प्रसन्नता को सुखद यादगार बनाये रखें, जिससे हमारी हिम्मत, मेहनत, ताकत और एकता को बनाए रखने का बल मिलता रहे। यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

सादर नमस्कार।
नव वर्ष 2013 की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ,
आपका अपना भाई,
श्रीकांत तिवारी .

श्री जगन्नाथ पुरी जी की यात्रा - पांचवां दिन

25-12-12  मंगलवार, जगन्नाथ पुरी 

पुरी से भुवनेश्वर : वापसी का दिन :

आज सुबह जब मेरी नींद खुली, मैंने देखा अधिकाँश (बच्चों को छोड़कर) जगे हुए हैं। हालांकि हमने अपनी सारी पैकिंग रात में ही कर ली थी, फिर भी सभी को चौकस करने में कुछ वक़्त लगा। तभी पुजारी मामा, मामी के साथ आ गए। दरअसल पुजारी मामा ने ही हमारे लिए होटल में कमरा और घूमने के लिए गाडी का इंतज़ाम पहले ही करवा दिया था। उनके सानिध्य से हमें बहुत ही प्रसन्नता और सुखद अनुभूति हुई। चाय-नाश्ते के बाद मामा-मामी अपने होटल चले गए।

फिर हम सी-बीच पर चले गए। जहां हमने जलनिधि, सागर महान को नमस्कार कर आशीर्वाद लिया और होटल आकर चेकआउट फाइनल कर के हम भुवनेश्वर के लिए रवाना हो गए। अत्यधिक लगेज के कारण कुछ दिक्कत तो हुई पर हमने मैनेज कर लिया। भुवनेश्वर जाते रास्ते में हम श्री साक्षी-गोपाल के मंदिर में दर्शन को गए जहाँ पण्डों ने हमें घेर लिया और बिना हमारे आग्रह और इजाज़त के हमें इधर-उधर ले जाने लगे। हमें शंका हो गई कि हम ठगों के बीच फंस गए हैं। हमारी शंका निर्मूल नहीं थी। एक पण्डा जी हमें दर्शन करने से पहले "रजिस्ट्रेशन ऑफिस" में ले आये और वहाँ मौजूद पण्डा जी (क्लर्क) ने तुरंत अपने डेस्क में से खाता-बही निकाल कर हमें 'दर्शन करने देने के' अपने "रेट" को बतलाने लगे। डेढ़ लाख! दो लाख। फिर हज़ार, फिर सौ ...!! मैं उठ कर पण्डों के विरोध के बावजूद, कमल और बाकी लोगों की तरफ संकेत कर स्वयं मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश कर गया। वहाँ पहले से मौजूद दर्शनार्थियों में जा मिला, जहाँ, वहाँ मौजूद पण्डों ने मुझे उपस्थित भक्तों के परिवार का सदस्य समझा, इस प्रकार मैंने भगवान् के दर्शन किये और अपनी बुद्धि के बराबर भगवान की स्तुति-प्रार्थना और निवेदन किया मंदिर की परिक्रमा की और बाहर निकल आया। बाहर जहां हमने अपने जूते-चप्पल उतार कर रखे थे वहां बैठी खाखी वर्दी-सी ड्रेस पहने एक महिला बैठी थी, वो मुझसे प्रति जूते के 10 रुपये मांगने लगी। मेरा जी उचाट हो गया और मन वितृष्णा से भर गया। अफ़सोस से सिर हिलाते मैंने उस महिला से कहा कि अभी सेठ जी आ रहे हैं, उनसे माँगना थोडा ज्यादा ही मिलेगा, ...और मैं वापस आकर गाड़ी में बैठ गया। जिम्मी से मैंने कह दिया कि सभी को कह दे कि मैं बाहर गाडी में बैठा हूँ, वे भी शीघ्र वापस आ जाएँ। लेकिन उन्हें आने में वक़्त लग गया, जिससे मुझे चिंता होने लगी।। उनके आने पर मैंने देर की वजह पूछी तो उनके बताये पता चला कि पण्डों ने सभी को घेर लिया था, जिनसे इनकी काफी बकझक हुई थी। पण्डे अपनी मनोवांछित रकम की मांग पर अड़ गए थे और उनका कहना था कि पैसे चुकाए बिना वे किसी को नहीं जाने देंगे !! इस बात पर कमल को काफी कष्ट हुआ और महिलायें भी काफी त्रस्त हो गयीं थीं। आखिरकार 365/ रुपये दे कर कमल ने जान छुड़ाई!! तब हमने फैसला कर लिया कि अब हम इस यात्रा में किसी मंदिर में नहीं जायेंगे।

भारी मन से हम भुवनेश्वर के लिए चले। रास्ते में हमने धौलागिरी देखा। फिर भुवनेश्वर पहुँच कर एक रेस्टुरेंट में हमने लंच किया। फिर खण्डगिरी देखा। इतने में काफी शाम हो गई थी जिसके वजह से  हम अपनी महिलाओं को अपने वादे के मुताबिक शौपिंग नहीं करा सके। गाडी का समय हो गया था। अत: हम भुवनेश्वर रेलवे स्टेशन पहुंचे। और प्लेटफोर्म पर एक खाली स्थान देख कर गाड़ी से सभी सामान उतारकर उस स्थान पर रखकर वहीँ बैठ गए और गाडी की प्रतीक्षा करते समय बिताने के लिए प्लेटफोर्म पर घूमने लगे। भुवनेश्वर का रेलवे प्लेटफोर्म काफी स्वच्छ और सुन्दर लगा। यहाँ हमने चारु ड्राईवर को उसके गाडी का किराया और कुछ बख्शीश दे, उसका शुक्रिया अदा कर विदा कर दिया।

ठीक शाम के 7 बजे हमारी गाड़ी "गरीबरथ" प्लेटफोर्म नंबर-1 पर आकर खड़ी हो गयी। G7-बोगी पर पहुँच कर हम गाड़ी पर सवार होकर अपने सामानों को व्यवस्थित करके बैठ गए। गाड़ी अपने नियत समय पर राँची के लिए खुल गई।

अभी रात के 10:15 बज रहे हैं। मैं उपरले बर्थ पर बैठा इन पंक्तियों को अपनी नोटबुक में कलम से लिख रहा हूँ। गाड़ी अपनी पूरी रफ़्तार से राँची की ऑर भागी जा रही है। .......................!

गुड-नाईट,
जय जगन्नाथ।
_श्रीकांत तिवारी .
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26-12-2012 बुधवार, हटिया स्टेशन (रांची) प्रातः 06:15

हम सकुशल वापस आ गए। यहाँ धीरू हमारी गाड़ी लेकर आया है। मुझे लड्डू को ठीक 9 बजे स्कूल पहुंचाना है। क्योंकि उसकी परीक्षा है। मैं, माँ, वीणा, लड्डू और धीरू ने लोहरदगा के लिए प्रस्थान किया । रास्ते में कमल का फोन आया मैं अपना बैकपैक (बैग) ट्रेन में ही भूल आया था ("...मेरी चौंथी धक्क!!) जिसे वो संभाल कर राँची ले जा रहा है। आखिर थोड़ी ही देर बाद मुझे डॉक्टर से आँख दिखा कर नया चश्मा लेना था, सो वापस रांची आना ही था। लड्डू को स्कूल पहुंचा कर हम घर आ गये।

01 बजे दोपहर को मैं धीरू के साथ फिर रांची चला गया।

.....................................इति.......................................

श्रीकांत .