Thursday, December 27, 2012

पुरी यात्रा से लौट आये

27,दिसंबर,2012  "अभिनन्दन", कोकर, राँची     07:20 प्रात: 
   
               हम कल 26`दिसंबर को पुरी यात्रा से लौट आये। कल लड्डू का यूनिट-टेस्ट था जिसके वजह से हम हटिया स्टेशन जहाँ धीरू गाडी लेकर आ गया था, से ही लड्डू को साथ लेकर लोहरदगा भागे-भागे पहुंचे।लड्डू को उसके क्लास-रूम में पहुँचाने गए तो प्रिंसिपल सर से सीधे टकराय, ठंढ से हाथ मलते, मुंह से भाप छोड़ते बोले : " कहिये तिवारी जी ! आज ठंढ की वजह से आपको खुद बच्चे को लेकर आना पड़ा! बहुत ठंढ है आज, इसीलिये मैंने 1 घंटे के लिए क्लास रुकवा दी है, कुछ धुप आ जाय तो फिर बाकि क्लास शुरू होंगे। (लड्डू से) तुम अपनी क्लास में जाओ, तुम्हारा टेस्ट शुरू हो गया होगा, तुम जाओ। ...हाँ! तिवारी जी! और सब कुछ ठीक है न!" मैंने उनका शुक्रिया अदा किया और वापस स्कूल से बहार आ गया। हम घर पहुंचे। घर खोलते ही मलुवा हम पर झपटी और सभी को सूंघने-चाटने की कोशिश करने लगी और लोटकर, कूदकर अपना अनुराग जताने लगी। गाड़ी से सामन उतारने से पहले हम मलुवा के बच्चों को ढूँढने लगे, उसी से पूछने लगे : "अरे, बचवन कहाँ गे? मलुवा ने अपनी भाव-भंगिमा से उत्तर दिया होगा पर हम कभी उसके पीछे तो वो कभी हमारे पीछे, ...फिर मलुवा को पिछुवाते हम ऊपर छत पर पहुंचे। जाड़े की स्निग्ध धुप में बिछे एक बोरे पर पांचो बच्चे एक-पर-एक चिपके हुए एक-दुसरे से सटे हुए अपनी महीन आवाज़ में चूँ-चूँ  कर रहे थे। मन हर्षित हो गया। उनके साथ थोडा खेलकर वक़्त बिताकर झट से नहाया और पूरी जी से प्राप्त प्रसाद को स्थापित कर मैंने "माँ" की पूजा की और उनके आगे सबकुछ अर्पण कर अपनी झोली फैलाकर नतमस्तक हो गया। पूजा के बाद नाश्ता फिर वापस राँची भागा। मेरा अपना 'रेगुलर' चश्मा पूरी समुद्र के अर्पण हो गया था जिसके कारण राँची में मैं नया चश्मा बनवाने अशोक ऑप्टिकल्स गया और अपने चश्मे के नंबर का प्रोग्रेसिव लेंस में फोटो-क्रोमेटिक चश्मे के बारे में दरियाफ्त की। अभी मैं 2-चश्मे यूज़ करता हूँ। एक लौंग-डिस्टेंस के लिए दूसरा लिखने-पढने के लिए। ये थोडा मुश्किल लगता है, क्योंकि इस अदला-बदली में 3 चश्में गिरकर टूट गए थे अत: मेरा विचार था कि एक ही लेंस, एक ही चश्मे से मेरी समस्या का निदान हो जाय, ...लेकिन जो कीमत (बिना फ्रेम के, सिर्फ ग्लास का) बताई गई, मेरे छक्के छूट गए!! मुँह बनाय घर पहुँचा। किसी तरह दिन बीते। शाम में हमने "दबंग 2"  देखि। घर आकर कंप्यूटर चालु किया तो लिंक फेल पाया। तब नए कैमरे से ली गई यात्रा की तस्वीरें कंप्यूटर में डाला और देखा। अभी इस नये कैमरे को समझने में मुझे समय लगेगा।

              श्री जगन्नाथ पुरी जी की यात्रा में पूजा-आराधना-प्रार्थना-निवेदन-दर्शन-स्तुति एवं प्रसाद प्राप्ति से मिलने वाली अलौकिक संतुष्टि के सन्दर्भ में मैं कुछ कहे बिना नहीं रह सकता। इसे अभिव्यक्त करने में मुझसे हो सकता है कहीं धृष्टता का आभास हो अत: मैं मनोज कुमार की फिल्म :यादगार" से महेन्द्र कपूर का गाया और मनोज कुमार पर फिल्माया गीत/गाने का सहारा लेता हूँ, जो कम-से-कम मेरी कुछ भड़ास को शांत करते हुए काफी आर्त-भाव से मेरी अभिव्यक्ति को सटीक शब्द देती है:

" आए जहां भगवान् से पहले किसी धनवान का नाम,
उस मन्दिर के द्वार खड़े सब रोवें कृष्ण और राम !
धनवान को पहले मिले भगवान् के दर्शन,
दर्शन को तरसता रहे जो भक्त हो निर्धन !
ये दक्षिणा की रीत, ये पण्डों के छलावे,
दुकान में बिकते हुए मन्दिर के चढ़ावे !
ऐसे ही अगर ............................................................,
ऐसे ही अगर धर्म का व्यापार चलेगा,
भगवान् का दुनिया में कोई नाम न लेगा !
ऐसे जगह पे जा के तू कुछ भी न पायेगा,
भगवान् ऐसा मन्दिर खुद छोड़ जाएगा !
.......................................छोड़ जाएगा !!
.......................................छोड़ जाएगा !!!"

धनवान पूछता है : " भगवान् .... मंदिर में नहीं तो और कहाँ मिलेगा?"

"वो खेत में मिलेगा, खलिहान में मिलेगा,
भगवान् तो ऐ बंदे ....., इंसान में मिलेगा !"
...

हो सकता है मेरी निष्ठा में ही कोई खोट हो,
अभी भोर भये कमल के कंप्यूटर पर यहाँ लिख रहा हूँ। लोहरदगा जाकर समूचा वृत्तांत लिखूंगा।

 सादर प्रणाम।
_श्रीकांत .