Thursday, December 20, 2012

जाड़े की स्निग्द्ध धुप हो, एक कुर्सी पर बैठ मुंडेर पर पैर लम्बी किये रखे हों, कुछ खाने-चुभलाने का इंतज़ाम हो, एक हाथ में जाम हो और दुसरे में श्री पाठक सर जी का "इन्तकाम" हो तो कौन इसकी ठंढी शीतल छाँव से वंचित होना चाहेगा!
...पर यह सारा मज़ा तुरंत काफूर हो जाता है, आँखें भीग आती हैं, हाथों में तनाव और जबड़े भींचने लगते हैं, दांत किटकिटाने लगते है; फिर बेबसी के मारे आँसू ढलक आते हैं जब कल ही हुई दिल्ली गैंग रेप की घटना याद आती है !!