Thursday, December 13, 2012

अदभुद अनुभव !

एक फिलोसोफिकल बात; (काल्पनिक नहीं, हकीक़त !) :
सुरेन्द्र मोहन पाठक शाम के ऑफिस आवर में ही अपने एक घनिष्ठ मित्र के दफ्तर पहुँच कर बोले :"चलो कहीं सेलेब्रेशन हो जाय!"
मित्र हकबकाय :"अभी?"
पाठक जी :"हाँ ! उठो जल्दी।"
मित्र :"पर किस बात का सेलेब्रेशन है? कुछ तो पता चले!"
पाठक जी :"तुम चलो तो, वो भी पता चल जाएगा।"
मंत्रमुग्ध मित्र उठे और पाठक जी के साथ हो लिए। दोनों मित्र एक बार में पहुंचे और ड्रिंक्स का आर्डर दिया। मित्र से रहा न गया, उन्होंने फिर पूछा :"यार ! कुछ तो हिंट दो आखिर किस बात का सेलेब्रेशन है?"
पाठक जी :"ड्रिंक्स आने तक सब्र करो।"
आखिर ड्रिंक्स सर्व हुई। दोनों ने चियर्ज़ बोला। मित्र ने फिर आग्रह किया :"अब तो बताओ!"
पाठक जी ने बड़े इत्मीनान से उत्तर दिया:"आज मेरी बची हुई ज़िन्दगी का पहला दिन है।"

..........ये मेरे लिए एक नया अनुभव था !!


जबतक जिओ हर दिन को एक नई उर्जा और उमंग के साथ जिओ।
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अदभुद अनुभव !
बात 05,दिसंबर,2012 की है:
 
वीणा का जिस नर्सिंग होम में ईलाज हुआ उसके बाहर एक फ्रूट जूस कोर्नर है। नर्सिंग होम से निकल कर हमलोग वहाँ गए और अपनी-अपनी पसंद के जूस का आर्डर दिया। मैं थोडा थका सा था और मुझे गर्मी भी लग रही थी इसलिए मैं जूस वाले की दुकान के अन्दर जाकर ठंडी छाँव में एक छोटे से बेंच के सीमित स्थान पर बैठ गया। जूस वाला पहले से खड़े ग्राहकों को निपटा रहा था। वीणा, माँ और धीरू को मैंने अन्दर आने का ईशारा किया, पर उन्होंने मना कर दिया। मैं अभी ठीक से रिलैक्स हो भी न पाया था कि देखा एक 65-70 वर्षीय कृषकाय बुजुर्ग थोडा लड़खड़ाते छड़ी टेकते हुए अन्दर आने की कोशिश कर रहे थे। मैंने उनके बैठने के जगह के वास्ते अगल-बगल देखा। एक और नवजवान बेंच पर बैठा था। मैंने बुजुर्गवार के बैठने के लिए अपनी जगह छोड़ दी और उठ खड़ा हुआ। बैठा हुआ नवजवान खाली हुई जगह पर और पसर गया। तब बुजुर्गवार थोड़े गडबडाए कि कहाँ बैठें। ये देखकर मैंने नवजवान की पीठ पर हाथ रखा और उसकी बांह पकड़ कर बुजुर्गवार की ओर इशारा कर उससे निवेदन किया कि :"प्लीज इनको बैठने दीजिये। नवजवान तुरंत उठ गया। बुजुर्गवार खाली हुई बेंच पर बैठ गए, उन्होंने काफी सुकून पाया। मैं जूस कोर्नर से बाहर निकल कर माँ और वीणा के पास धूप में खड़ा हो गया। हमारी जूस आई और हम जूस का आनंद लेने लगे। तभी जूस वाले ने मुझे पुकारा :"भईया ! आपको ई बुला रहे हैं।" मैंने पूछा कौन, तो उसने बुजुर्गवार की तरफ इशारा किया और अपने काम में मशगूल हो गया। मैं बैठे हुए वृद्ध सज्जन के पास पहुंचा तो उन्होंने हाथ के ईशारे से मुझे अपनी ओर झुकने के संकेत दिया। में झुका :"जी!?"

वृद्ध बोले :"हम आपको कुछ नुस्खा बता रहे हैं कर के देखिएगा बहुत फायदा होगा।" और उन्होंने मुझे स्वास्थ्य सम्बब्धी कुछ नुस्खे बताय, बोले :"आजमा के देखिएगा।" और अंत में अपने दोनों हाथों से उन्होंने मेरी पीठ थपथपाई, मेरे सिर को सहलाया और बोले :"जाइए मेरा आशीर्वाद है।"


......अभिभूत, ......मंत्रमुग्ध !!!.......... मैं अभी भी रोमांचित हूँ। 

झुलसे हुए कान

एक आदमी अपने दोनों झुलसे हुए कानों के साथ कराहता हुआ डॉक्टर के पास पहुंचा। डॉक्टर उसकी उस दशा पर बहुत हैरान हुआ। उसने बड़ी सहनुभूति से उसे पास बिठाया और पूछा : " ये कैसे हुआ!?"
मरीज़ ने दयनीय स्वर में अपना दुखड़ा सुनाया : " सर, शाम को जब मैं ऑफिस से लौटा तो देखा मेरी बीबी बच्चों के कपड़े प्रेस कर रही थी। मैंने उससे चाय बना कर लाने को कहा और वहीं पास में रखे टेलीफोन के बगल की कुर्सी पर बैठ गया। देर होते देख मैंने बीबी से फिर कहा :"अरे, जल्दी चाय कहे नहीं देती है?"  बीबी झुंझलाती हुई गर्म आइरन को टेलीफोन के बगल में रखकर किचन में चली गई। थोड़ी देर में ही टेलीफोन की घंटी बजी और बेध्यानी में गलती से गर्म आइरन के हैंडल को टेलीफोन का रिसीवर समझ कर मैंने उठाया और दाहिने कान से सटा लिया, जिसके कारन मेरा दाहिना कान झुलस गया! मेरी चीख सुनकर बीबी भागती हुई किचन से आई और मेरी हालत देखकर उल्टा मुझी को फटकारने लगी कि मुझे बिकुल अकल नहीं है। उसने टेलीफोन को आयरन के दुसरे बगल में रख दिया फिर मेरे कान पर बरनौल लगाया और मेरी कुर्सी को घुमाकर मुझे बिठाया और वापस किचन में चली गई।"

डॉक्टर :"च! च!! च!!! लेकिन दूसरा कान कैसे जला??"
मरीज़ :"उसी कमीने ने दुबारा फोन कर दिया !!!"

 लेखक : श्री सुरेन्द्रमोहन पाठक.