Saturday, May 26, 2012

रहीम _ सृजनात्मक V/S विनाशात्मक

"रहिमन चाक कुम्हार का,
 माँगे "दिया " न देय -
छेद में डंडा डारी के ,
चाहे नांद लेई लेय -''
रहीम की इन पंक्तियों के मुझे दो मायने समझ में आते हैं। एक सृजनकारक (सृजनात्मक), दूसरा विनाशकारक (विनाशात्मक)। व्यक्ति की जिस समय जैसी मानसिक अवस्था होती है वो उसका वो ही मतलब लगता है।

1.  इन पंक्तियों का सीधा मतलब, जो मेरे ख्याल से सृजनात्मक है, कि कुम्हार की चक्की से बिना प्रयास के एक "दीपक" (दिया) तक प्राप्त नहीं होता, जबतक कि कुम्हार अपनी डंडी से चाक को घुमाकर उसपर मिट्टी थोप कर अपने हाथों से दीपक नहीं बनाता। कुम्हार द्वारा दीपक बनाने का प्रयास पुरुषार्थ है, जिसके द्वारा वो दीपक क्या नाद भी बना लेता है। पुरुषार्थ, जिसके बिना जीवन में कोई सफलता नहीं मिल सकती। कुम्हार की चक्की हमारे जीवन के सामान है, जो पुरुषार्थ (प्रयास/मेहनत/कर्म) के बिना व्यर्थ है। जैसे कुम्हार की चक्की मांगने से एक "दिया" तक नहीं देती, यूँ ही मांगने मात्र से कल्पना करने मात्र से ही जीवन में कुछ भी, कोई भी सफलता नहीं मिल सकती। लेकिन अपनी लगन और मेहनत से दुनिया जीती जा सकती है। सफलता प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ तो करना ही पड़ेगा न! _यह इन पंक्तियों का सृजनात्मक अर्थ (मेरी समझ से) है।

2.  इन पंक्तियों का दूसरा मतलब, जो मेरे ख्याल से विनाशात्मक (उदंडता भरी अभद्र सोच) है, कि जब मांगने से कुछ न मिले तो छीन लो, स्वयं अपने लिए कुछ मेहनत मत करो। ...अगर फिल्म में येही पंक्तियाँ (डायलोग) जब हीरो विलेन से बोलेगा तो सोचिये हॉल में कितनी तालियाँ पड़ेंगी !! _बेशुमार !!! मतलब, इन
पंक्तियों से यह दूसरा मतलब भी निकाला जा सकता है, जिसे भरपूर सराहना मिलेगी। लोग बातें करेंगे : वाह!
क्या डायलोग मारा है! कहने का तात्पर्य यह है कि आज हताशा में हमारी सोच बदल गयी है।


गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा है :
"जाकि रही भावना जैसी, प्रभु मूरति तिन्ह देखि तैसी" 
 मुझे विभिन्न व्यक्तियों से बात करने पर दोनों अर्थ अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा सुनने को मिलीं। हर व्यक्ति
अपनी बात को कई प्रकार से बखान करता मिला। ज्यदा 'वोट' 2 नंबर को मिले!!

मेरा वोट नंबर 1 को है क्योंकि श्री रहीम ने इन पंक्तियों के द्वारा "डंडा" कर के अपना मतलब साधने की सलाह मनुष्य को नहीं दी है। बल्कि मेहनत कर सफलता पाने की सलाह दी है।

आपका क्या कहना है? constructive OR destructive?

- श्रीकांत तिवारी