Sunday, April 22, 2012

किताबें झांकती हैं ...

किताबें झांकती हैं बंद अलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से ताकती हैं, महीनो अब मुलाकातें नहीं होतीं
जो शामे इनकी सोहबत में कटा करती थीं 
अब अक्सर...
गुजर जाती है कंप्यूटर के पर्दों पर
बड़ी बेचैन रहतीं हैं किताबें...

इन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गयी है
बड़ी हसरत से ताकती हैं, महीनों अब मुलाकातें नहीं होतीं
जुबान पर जयका आता था जो सफहें पलटने का 
अब ऊँगली क्लिक करने से बस इक झपकी गुजरती है
बहुत कुछ तह - बा - तह खुलता चला जाता है परदे पर
किताबों से जो जाती 'राबता' था, कट गया है


कभी सीने पर रख कर लेट जाते थे 
कभी गोदी में लेते थे 
कभी घुटनों को अपने 'रिहल' की सूरत बना कर 
नीम सजदे में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं से 
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा बाद में भी
मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल और महके हुए रुक्के 
किताबें मांगने, गिरने, उठाने के बहाने 
रिश्ते बनते थे
उनका अब क्या होगा
वो शायद अब नहीं होंगे !! 
                                                                _____ गुलजार

कोई माने न समझे मगर मैं मेरे आंसू
पोंछता हूँ अब भी 
उन्ही किताबिं से जो
बड़ी हसरत से ताकती हैं, बंद अलमारी के शीशों से...
                                                                 _____मैं
श्रीकांत तिवारी