Wednesday, September 26, 2012

पिआनो या फिल्मी जोक !?

पिआनो या फिल्मी जोक !? 
पाठक सर की जोकबुक से एक व्यंग्य लेख:
थोडा मुस्कुराने की रिहर्सल कर लीजिये, आने वाली खुशियों में अट्टहास पूरी तरह जेनुइन हो जाएगा!
(मूल लेखक श्री सुरेन्द्रमोहन पाठक; मैंने 'ज़रा-सी' तब्दीली के साथ निम्नलिखित को यहाँ अक्षरशः, सिर्फ टाइप भर किया है।)

        
(आज से चालीस साल पहले की फिल्मों में):

आजकल की आधुनिक समाज का चित्रण करने वाली भारतीय फिल्मो में किसी न किसी सन्दर्भ में एक पार्टी का दृश्य ज़रूर रखा जाता है। और फिल्म में अगर कोई पार्टी का दृश्य  होता है तो उसमे पिआनो ज़रूर होता है। पार्टी के दृश्य में पिआनो उतना ही अनिवार्य है जितनी चाय में चीनी। अगर पार्टी के दृश्य में आपको कहीं पिआनो पड़ा दिखाई देता है तो समझ लीजिये कि कोई न कोई हिरोइन से गाना गाने की फरमाइश ज़रूर करेगा। कई बार फरमाइश करने के स्थान पर पार्टी में मौजूद कोई ज़रुरत से ज्यादा उत्साही सज्जन हिरोइन से बिना पूछे ही इस बात की घोषणा कर देते हैं कि अब हिरोइन सबको गाना सुनाएगी। हिरोइन का विरोध यहीं तक सीमित होता है कि वह एक-दो बार "ओह ! नॉट मी !" जैसा कुछ कहेगी और फिर शर्माती सकुचाती या तो खुद पिआनो पर जा बैठेगी और या तो उसकी कुछ सहेलियां उसे पकड़ कर ज़बरदस्ती पिआनो तक छोड़ आएँगी, बिलकुल यूँ जैसे पिआनो न हो, सुहाग शैया हो और हिरोइन जिसकी कल्पना मात्र मरी जा रही हो।
          पिआनो पर पहुँच कर हिरोइन गाना शुरू करने से पहले कुछ क्षण पिआनो के सुर छेड़ेगी जैसे पिआनो के सुरों में कोई नुक्स होने पर दूसरा पिआनो मंगवाए जाने की फरमाइश का इरादा रखती हो। पिआनो से संतुष्ट हो जाने के बाद वह पार्टी में मौजूद हीरो पर एक अर्थपूर्ण मुस्कराहट डालेगी, फिर क्लोज-अप में हीरो और तीन-चार अन्य मुख्य पत्रों का प्रत्याशा में दमकता हुआ चेहरा दिखाया जायेगा और फिर हॉल में लता मंगेशकर की आवाज़ गूंजने लगेगी।गाने के साथ आपको दुनिया भर के साजों की कान फाड़ देनेवाली चीख पुकार सुनाई देगी, अगर नहीं सुनाई देगी तो केवल पिआनो की आवाज़।
          पार्टी में मौजूद एक्स्ट्राओं को अगर केवल मुस्कुराने और अपने स्थान पर स्थिर रहने का निर्देश नहीं दिया गया है तो और पार्टी में महिलाओं का आधिक्य है तो समझ लीजिये गीत का मुखड़ा समाप्त होते ही वे अपने सबसे करीब खड़े पार्टनर की बाहों में बाहें फंसायेंगे और चाबी लगे खिलोनों की तरह यूँ नाचने लगेंगे जैसे बिजली का स्विच ऑन करने पर कई रोशनियाँ एक साथ जल उठती हैं। ऐसी स्थिति में लता मगेश्कर का गीत में स्वरदान समाप्त होते ही हिरोइन भी उठ जाएगी और आतुरता से प्रतीक्षा करते हुए हीरो की बाहों में बाहें डाल कर नाचने लगेगी। ओर्केस्ट्रा बजता रहेगा लेकिन अब क्योंकि पिआनो बजानेवाली पिआनो पर मौजूद नहीं है इसीलिए ओर्केस्ट्रा के धीरे-धीरे फेड होते स्वरों पिआनो का स्वर भी सुनाई देने लगेगा।
          अगर गीत के साथ नृत्य का सिलसिला नहीं रखा गया है तो गीत समाप्त होते ही हॉल यूँ तालियों से गूँज उठेगा जैसे हॉल में मौजूद लोगों ने अपनी सारी ज़िन्दगी में उससे कर्णप्रिय गीत न सुना हो। हिरोइन पिआनो पर बैठी सिर झुका कर सबका अभिवादन करेगी , मुस्कुराएगी, शर्माएगी और फिर यूँ लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगेगी जैसे पिआनो बजा कर न हटी हो इंग्लिश चैनल तैरकर फिनिशिंग लाइन पर पहुंची हो।
          वास्तव में हिरोइन को गीत के फिल्मीकरण के दौरान पिआनो के पीछे बैठकर मुस्कुराने और खूबसूरत लगने के अतिरिक्त कुछ करना नहीं होता है। गाना तो लता मंगेशकर गा रही होती हैं और पिआनो के जिन सुरों पर हिरोइन की उंगलियाँ दौड़ती दिखाई जाती हैं, अगर उन्ही के स्वर को रिकार्ड कर लिया जाये तो हॉल में संगीत के स्थान पर हवाई हमले की चेतावनी के सायरन से मिलती जुलती आवाज़ गूँज उठे। इसीलिए अक्सर होता यह है कि आधे गाने या तो हिरोइन की उंगलियाँ पिआनो के किसी एक स्थान पर आकर स्थिर हो जाती हैं और या फिर किसी एक ही सुर के बखिये उधेड़ती दिखाई देती हैं। कभी-कभी यह संभव हो सकता है कि एक चैलेंज स्वीकार करने के नंदाज़ में हिरोइन के गाना समाप्त करते ही हीरो पिआनो पर आ बैठे और गाना शुरू कर दे और हिरोइन एक उपेक्षापूर्ण मुस्कराहट लिए उस गाने को यूँ सुने जैसे कह रही हो - " अरे जा जा, तू क्या गायेगा मेरे सामने, अर्थात मुहम्मद रफ़ी क्या गायेगा लता मंगेशकर के सामने!"
          पार्टी और पिआनो के इस सिलसिले में गम का गाना अक्सर हीरो के हिस्से में आता है। ऐसी स्थिति में खलनायक या प्रेमी नंबर दो - जो वक्तीतौर पर हिरोइन हासिल करने की दौड़ में आगे निकल गया है (और जिसके वजह से इस गाने की सिचुवेशन पैदा हुई है) - पार्टी में ज़रूर मौजूद होता है। गम के उस गीत के बोल बड़े ही निश्चित अर्थ का प्रतिपादन करने वाले होते हैं लेकिन प्रेमी नंबर दो पोज बनाने, मुस्कुराने और खुबसूरत लगने में इतना व्यस्त होता है कि वह गीत के माध्यम से क्या कहा जा रहा है, इस विषय में एकदम घोंघा बना रहता है। प्रेमी नंबर वन जब देवदासी पोज बना कर पिआनो पर गाता है की -" वक़्त करता जो वफ़ा आप हमारे होते"- तो हिरोइन तो फ़ौरन आकुल-व्याकुल होकर दिखाने लगेगी और गाने के आखिर तक ऐसे ही पोज मारती चली जाएगी लेकिन मजाल है कि प्रेमी नंबर दो के कान में जूँ  भी रेंग जाये ! वो तो महज़ गाना सुनेगा और मुस्कुराएगा, उसका भावार्थ समझने की मुकम्मल जिम्मेदारी तो हिरोइन को है!
          पिआनो मार्का दृश्यों को फिल्माने का एक कम प्रचलित तरीका यह भी होता है कि हिरोइन पिआनो पर कोहनियाँ टीकाकर और हीरो की आँखों में आँखें डाल कर गीत गाये इस इंतजाम में हीरो को अपना महत्त्व घटता दिखाई देने लगता है क्योंकि अधिकतर फिल्मे हीरो के दम पर ही बिकती हैं इसलिए हीरो को हरफनमौला दिखाना हमारी फिल्मों की परंपरा है, हीरो को गाना भी आता है, येही उन्हें काफी नहीं दिखाई देता, हीरो को गाने के साथ पिआनो खुद भी बजाना चाहिए चाहे अगले ही दृश्य में उसे हवाई जहाज उड़ाता दिखाया जाए! या फिर गंभीर ऑपरेशन करता दिखाया जाये!
          पार्टी के इन दृश्यों को देखकर ऐसा अनुभव होता है कि भारत में पिआनो जैसे नाजुक, पेचीदा, महंगे साज़ को सीखने की सुविधा हर किसी को सहज ही प्राप्त हो। हीरो चाहे कॉलेज का विद्यार्थी हो या पत्रकार हो या टैक्सी ड्राईवर हो या मिल वर्कर, कोई डॉक्टर, वकील, इंजिनियर या फौजी जवान हो, अगर फिल्म में पार्टी का द्रश्य है और पार्टी में पियानो मौजूद है तो गाना और पियानो बजाना उसे आना ही चाहिए।
          इस सिलसिले में यह कहने की ज़रुरत नहीं कि अगर पार्टी के सीन में पिआनो नहीं है, यह लगभग निश्चीत ही है कि गाना भी नहीं होगा। जिस प्रकार की वह नौकरी कर रहा होता है और जिस प्रकार की योग्यताओं का वह स्वामी दिखाया गया होता है उसे देखकर ऐसा नहीं मालूम होता कि कभी पिआनो की सूरत को करीब से देख पाने का भी अवसर मिला हो, उसे पूरी योग्यता से बजाना आना तो दूर की बात है।
पिआनो अगर यूँ ही फिल्म निर्माताओं का चहेता साज़ बना रहा तो वह दिन दूर नहीं जब फिल्म के क्रेडिट्स इस प्रकार दिखाया जाया करेंगे:
 मुहब्बत का नशा 
सितारे: 
सलमान खान
विवेक ओबेरॉय  
ऐश्वर्या राय 
और 
ग्रैंड पिआनो  
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विनीत,
_श्रीकांत तिवारी .

Sunday, September 23, 2012

डॉ बिशु बाबु का निधन ...

                                                    ता 23 सितम्बर 2012 संध्या 07:50 लोहरदग



अभी एक घंटे पहले लोहरदगा के एक मात्र नामोनिहाद 82 वर्षीय बुजुर्ग डॉक्टर श्री पूर्णेंदु भूषण रॉय : जिन्हें जनता डॉ बिसु बाबु के नाम से जानती है, का निधन हो गया। स्व. पूज्य बाबूजी  फिर शिव बाबु के बाद श्री बिशु बाबु का निधन मेरी व्यक्तिगत बहुत बड़ी क्षति है जिसका शब्दों में वर्णन मुश्किल है। परमपिता परमेश्वर दिवंगत आत्मा को शांति और सद्गति प्रदान करें।

- श्रीकांत
                           
                               25/09/2012
                                                            लोहरदगा 

             मैंने स्वर्गीय डॉ बिशु बाबु की अर्थी को कंधा दिया और नम आँखों से उन्हें अंतिम बिदाई दी ...



- श्रीकांत .तिवारी 
      लोहरदगा